Friday, December 9, 2011

'फिलहाल' छुट्टी वाले दिन की हकीकत!


ये जो हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मिलती है उसके फायदे कम घाटा ज्यादा है। आपके लिए तो मैं बिल्कुल ही नहीं कह रहा ये सिर्फ मैं अपने बारे में कह रहा हूं। महीने में 4-5 साप्ताहिक छुट्टियां मिलती हैं। पहला हफ्ता वाला तो मान लीजिए कभी बैंक तो कभी बिजली बिल या दिस दैट करके बारह एक बजे तक का टाइम निकल जाता है। यहां के बाद अब शुरू होती है समय बीताने के रास्ते खोजने की परीक्षा। अभी फिलहाल तीन-चार दोस्त हैं जिनके साथ होने पर छुट्टी का मतलब छुट्टी हो पाता है। लेकिन ये भी कब महीने की पहली छुट्टी के दिन । वो भी दोपहर बाद। किसी तरह से खा-पीकर, कुछ खरीदारी करके, सिनेमा देखकर टाइम निकाल लिया। लेकिन फिर छे दिन बाद सब कुछ ठीक रहने पर छुट्टी का दिन आ धमकता है। अब क्या... न बिजली बिल बचा...न किराया का...राशन और सब्जी तो समझिए रोज टाइप आइटम है । उसका तो साप्ताहिक मामलों से कोई लेना देना ही नहीं । अब ऐसा भी नहीं कि छुट्टी का दिन है तो ज्यादा देर तक सोते रहिए। नींद तो अपने टाइम पर ही खुलेगी । दफ्तर के दिन हड़बड़ी में सब कुछ करके निकल जाना पड़ता है लेकिन छुट्टी है तो इत्मीनान से करते रहिए...टाइम भी धीरे धीरे बीतता है।
 अब आइए बुनियादी मुद्दे पर। चूंकी दिल्ली में दोस्त हो गए हैं कम। जो थे पुराने साथी-सहपाठी सबकी अपनी टाइमिंग है। सबकी अपनी गृहस्थी है। सो उधर से हाथ निकल गया। बचे अब तीन-चार करीबी वाले। अब छुट्टी असल में यही खलती है । अब चूंकि ज्यादा लोगों के साथ तो उठना-बैठना है नहीं.. जो लोग होते हैं साथ में उनकी भी अपनी दुनिया है। अपनी जान पहचान है तो उसमें दखल देना किसी सूरत में मुनासिब नहीं है। क्योंकि उसके पास भी वही महीने में 4-5 छुट्टी है। उसी में सबको अपनी अपनी प्लानिंग करनी होती है। किसी को शादी में जाना तो किसी को पुराने दोस्त के पास तो किसी को कहीं. किसी को कहीं...कहने का मतलब सीधा और साफ शब्दों में ये है कि आपकी दुनिया छोटी है इसलिए आपको दिक्कत होती है और होती रहेगी। फिलहाल...!!! बहुत कम लोग जानते हैं कि कई बार तो कमरे में अकेले बोर हो जाने पर मार्केट जाकर पान खाकर टाइम बीताना पड़ता है ताकि पान खाने के दौरान उसी में कुछ देर उलझा रहूं...और फिर उसके बाद उसके असर में कुछ देर। कई बार यूं ही गाड़ी लेकर निकल जाना पड़ता है ताकि शरीर में थोड़ा बहुत धूप वगैरह भी लग जाए और कुछ समय भी...वैसे टीवी पर साउथ इंडियन फिल्में देखना और किताब पढ़ना भी रूटीन में शामिल होता है लेकिन कुछ देर बाद इससे भी मन उचट जाता है। चार-पांच छुट्टियों में से एक-दो तो ऐसी भी होती है जब पुराने पंद्रह बीस अखबारों को पलट पलट कर कुछ खास लेख, खबरें खोजने और फिर उसको पढ़ने का भी सहारा लेना पड़ता है। लेकिन इसमें भी उतना समय नहीं लगता। जिस वक्त ये लिख रहा हूं उस वक्त मैं घर में गैस सिलेंडर वाले का इंतजार कर रहा हूं। पान खाने के लिए बाहर जाने का मन था लेकिन गैस सिलेंडर वाले को फोन किया तो बोला कि मैं आ रहा हूं। तो इसी दौरान इसे छाप रहा हूं।
एक दिन की छुट्टी होने की वजह से भी शायद ऐसा है अगर दफ्तर में दो दिन की छुट्टी होती.. तो कहीं घूमने-फिरने भी निकल जाया जाता तो उसमें भी मन लगता...हो सकता है दो दिन की छुट्रटी का कुछ ज्यादा ही घाटा होता। वैसे परिचित लोग तो छुट्टी लेकर घूम फिर भी आते हैं यहां कहां मौका मिलता है। छे साल के दौरान इसी साल दो दो दिन के लिए शिमला और नैनीताल जाने का मौका मिला। वो भी तब जब साल में एक बार सिर्फ घर जाने की छुट्टी ली। इस महीने तो पार्टनर भी घर गया है। उसका भी टाइम टेबल अपना है। दूसरे मूड का है सो उसका समय ज्यादातर तो निकल जाता है। कभी कभी उसको भी उलझन होती है। जब 2006-2007 के दौरान दो दिन की छुट्टी मिलती थी उस वक्त मेरे बड़े भाई भी नॉर्थ में रहते थे... उस दौरान हर छुट्टियों में वहीं चला जाया करता था। लेकिन अब वो बिहार में ही हैं सो नॉर्थ कनेक्शन भी कट गया । एक रायजी मित्र हैं तो वो बिहार में ही हैं । बालक भी परिवार वाला आदमी है। धीरे-धीरे लोग कम होते गए न...जैसे जैसे नए लोग जुड़ना शुरू होते हैं तो पुराने अपने आप कम होने लगते हैं...लेकिन यहां नया पुराना सब माइनस में ही है। अब आज का रूटीन पता ही नहीं है करना क्या है....गैस वाला अब भी नहीं आया । आता तो इसको रोकता...अब कल तो ठीक रहा...मैच भी था... सब थे भी...लेकिन कल तो छुट्टी नहीं थी न... छुट्टी तो आज है...चलिए देखिए....क्या कर सकते हैं....कोई बात नहीं !!!  थोड़ा यूपी चुनाव पर टाइम देना है। अब वही देखने जा रहा हूं। चलिए। आपको छुट्टी मिले तो फोन कीजिएगा। मैसेज कीजिएगा। हो सके तो बताकर मिलने भी आ सकते हैं। बुला भी सकते हैं। 

Thursday, September 29, 2011

यात्राओं के दौर में देश


एक बार फिर से देश में यात्राओं का दौर शुरू हो गया है। बाबा रामदेव स्वाभिमान यात्रा पर निकल चुके हैं। अगले महीने से आडवाणी अपने राजनीतिक जीवन की एक और यात्रा शुरू कर रहे हैं। उसके बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सेवा यात्रा शुरू करने वाले हैं। इन यात्राओं से फायदा लेने की होड़ में हर नेता लगा हुआ है। बाबा रामदेव का मुद्दा काला धन है तो आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा करने वाले हैं। नीतीश की यात्रा सुशासन का सच जानने के लिए हो रही है। सवाल ये है कि क्या इन यात्राओं से देश की जनता का भी कोई भला होने वाला है?
जो भी शख्स राजनीतिक रूप से थोड़ा भी जागरूक है उनको इन यात्राओं के फायदे और नुकसान की समझ है। लेकिन इसमें समझने वाली बात ये है कि आखिर कांग्रेस नेतृत्व के गठबंधन वाली सरकार को इसका कोई नुकसान भी होगा। लोकसभा चुनाव वैसे तो दो हजार चौदह में होने हैं। लेकिन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ देश में जो माहौल बना है उसने कहीं न कहीं मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की सूरत को बिगाड़ जरूर दिया है। कुछ लोग आज के हालात की तुलना चौहत्तर-पचहत्तर के हालात से कर रहे हैं। उस वक्त इंदिरा गांधी के नेतृत्व की सत्ता को जेपी के आंदोलन ने चुनौती दी थी। नतीजा दुनिया ने देखा था जब कांग्रेस का देश से सफाया हो गया था। सच्चाई के चश्मे से आज के हालात को देखे तो कमोबेश सूरत तो वैसी नहीं है लेकिन हालात उसी ओर के इशारे जरूर कर रहे हैं।
इन दिनों देश में अनायास ही जेपी चर्चा के विषय बन चुके हैं। जेपी की चर्चा हर ओर हो रही है। चाहे बाबा रामदेव के समर्थकों की पिटाई का मुद्दा हो या फिर अन्ना के आंदोलन का। किसी ने रामदेव पर लाठीचार्ज की तुलना जेपी मूवमेंट के वक्त के हालात से की है तो कोई अन्ना के आंदोलन में जेपी की तस्वीर देखता है। शायद इसी का फायदा उठाने के लिए आडवाणी भी जेपी जयंती के मौके पर रथयात्रा की शुरुआत कर रहे हैं। 11 अक्टूबर को जेपी की जयंती है और जेपी की जन्मस्थली बिहार के सिताब दियारा से आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा शुरू कर रहे हैं। कहीं न कहीं जेपी एक बार फिर से नेताओं के लिए प्रेरणा बन गये हैं। बीच के दिनों को याद करें तो जेपी के शिष्य कहे जाने वाले नेता जेपी के अरमानों को अपने हाथों से कुचल चुके हैं। लेकिन जेपी इन सबके बीच जीवंत हैं।
बिहार से यात्रा को लेकर आडवाणी की सोच चाहे जो कुछ भी हो लेकिन एक सच ये भी है कि आडवाणी ने उस बिहार को अपनी यात्रा के लिए चुना है जिस बिहार में कभी लालू ने उनकी रथयात्रा रोक दी थी। 1990 का वो साल था जब समस्तीपुर में आडवाणी की यात्रा को लालू ने ये कहकर रोक दिया था कि देश में इस यात्रा से माहौल बिगड़ रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि आडवाणी उस टीस को भूल नहीं पाए हैं। और उसी को पाटने के लिए बिहार के छपरा से यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं। जेपी छपरा से निकलकर बिहार के कुछ जिलों का सफर तय करने के बाद झारखंड और फिर यूपी में दाखिल होंगे। उस यूपी में जहां अगले साल चुनाव होने हैं। और यूपी की लड़ाई में दम दिखाने के लिए बीजेपी को पसीना बहाना ही पड़ेगा क्योंकि बीजेपी आज यूपी में प्रासंगिक नहीं है। आडवाणी इस चीज को समझते हैं और इसिलिए मौके की नजाकत का फायदा उठाने की फिराक में हैं। इस बीच एक नया विवाद उठा है कि नरेंद्र मोदी को मोदी की ये यात्रा पसंद नहीं है। कारण जो भी हो लेकिन पीएम पद की दावेदारी को लेकर बीजेपी में उठे विवाद को जानकार इसकी वजह मान रहे हैं। 11 अक्टूबर को शायद ये भी साफ हो जाए। संघ के सूत्रों ने संकेत दिये हैं कि आडवाणी उस दिन शायद पीएम पद की दावेदारी छोड़ने का एलान कर दें। यहां ये बताना जरूरी है कि आडवाणी पहले गुजरात के सोमनाथ से यात्रा शुरू करने वाले थे लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें बिहार से शुरू करने का फैसला करना पड़ा। अब ये कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के विरोध के चलते उन्हें बिहार जाना पड़ा है। वैसे एक बात और दिलचस्प है कि मोदी की काट के लिए आडवाणी ने उस बिहार की धरती से यात्रा शुरू करने का फैसला किया जहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी का सार्वजनिक मंचों पर साथ दिखने का विरोधी माना जाता है। 18 राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की यात्रा करने के बाद आडवाणी 20 नवंबर को दिल्ली पहुंचेंगे जहां एक रैली होगी। अब इस रैली में मोदी रहेंगे या नहीं ये नहीं मालूम। नीतीश रहेंगे या नहीं ये भी नहीं मालूम। इंतजार बीस नवंबर का करना होगा जब आडवाणी अपनी यात्रा खत्म करेंगे तो उस दिन दिल्ली के मंच की क्या तस्वीर होगी। क्या नीतीश और मोदी आडवाणी के इस समापन समारोह के साक्षी बनेंगे या फिर कोई एक आएगा और दूसरा दूर से ही ताली बजाएगा?
यात्रा पर इन दिनों यूपी में मायावती भी ही हैं जो नए जिले बनाने में जुटी हैं। समाजवादी पार्टी के युवराज अखिलेश यादव भी यूपी में क्रांति का अलख जगाते फिर रहे हैं। गुजरात में कांग्रेस के वाघेला भी चुनावी यात्रा पर मोदी के खिलाफ मोर्चा बनाकर निकल चुके हैं। कुल मिलाकर सच्चाई ये है कि सब कोई अपने फायदे की यात्रा में जुटा है।

Monday, August 22, 2011

अन्ना की 'शांतिपूर्ण क्रांति'



अन्ना एक आंदोलन
 हिन्दुस्तान में हवा का रुख इस वक्त रामलीला मैदान से शुरू होकर देश भर में फैल रहा है। इस वक्त मैं जब लिख रहा हूं मेरे पीछे जिन्दाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं। रोड पर छोटे छोटे बच्चों से लेकर बड़े तक सब हाथों में मोमबत्ती लिए भारत माता की जय के नारे बुलंद कर रहे हैं। देश भर की गलियों में पिछले पांच-छे दिनों से ये आवाज गूंज रही है। आज की इस पीढ़ी ने इतना बड़ा जनआंदोलन जो बिना किसी बवाल के सात दिनों से हिन्दुस्तान की सड़कों पर चल रहा है नहीं देखा। अतीत के पन्ने को पलटे तो इस पीढ़ी को याद है तो मंदिर आंदोलन और वीपी सिंह की लगाई आरक्षण की आग वाला हिंसक आंदोलन। बीते पच्चीस तीस सालों में कई तरह के आंदोलन भले ही देश में हुए लेकिन आज का ये आंदोलन कई मामलों में अलग है। पुराने आंदलोनों में मीडिया का ये हुजूम नहीं था। आज देश के कोने कोने की तस्वीरें इस कोने से लेकर उस कोने तक जा रही है। देश का एक बड़ा तबका जो देश की तकदीर और तस्वीर को बदलने में अहम भूमिका निभाता है वो आज सड़कों पर है। अपनी आगे की पीढ़ी को संस्कार और शिक्षा देने के लिए। जिन लोगों ने बदलते हिन्दुस्कान की तस्वीरें नहीं देखी वो एक बार रामलीला मैदान जरूर हो आएं। क्योंकि आंदोलन जब अतीत बन जाएगा तो खुद को गुनहगार मानने के अलावा कुछ न कर सकेंगे। आज के इस आंदोलन में हर वो रंग है हर वो तस्वीर है हर वो लोग है जिसे देखना सुनना और समझना चाहता है सवा सौ करोड़ का हिन्दुस्तान। मंच से जब अन्ना हजारे की आवाज नहीं सुनाई देती तो लगता है देश में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है। 74 साल का नौजवान तीस साल के नौजवानों के लिए प्रेरण बनकर सात दिनों से भूखा है। सात घंटे में इन लोगों को पसीना आ जाए। आखिर रामलीला मैदान के मंच पर बैठा शख्स भी आपके और हमारे बीच का इंसान ही है। उसे भी खाना पसंद है शौक से कोई सात दिनों तक भूखा नहीं रहता। आप और हम सात घंटे भूखे रह जाएं तो पूरे खानदान को पता चल जाता है। लेकिन सात दिनों से एक शख्स भूखा है और आपके लिए लड़ रहा है। सिर्फ आपके लिए। सब कुछ ठीक भी रहा तो पांच साल से दस साल और इससे ज्यादा उनकी उम्र नहीं होगी। लेकिन आज हिन्दुस्तान उनके दीर्घायु होने की कामना कर रहा है। देश भर में जन्माष्टमी का उत्सव आज इस आंदोलन के आगे फीका पड़ गया। मुंबई में दही हांडी फोड़ने की तस्वीरें आज के दिन स्कीन से हटती नहीं थी लेकिन शायद ही आज देश ने मुंबई के उत्सव को देखा होगा। सिर्फ इसलिए कि आंदोलन के रंग के आगे उत्सव का रंग फीका पड़ गया, सेना का सिपाही जनता का जनरल बनकर दिलों पर राज कर रहा है।
मैं भी अन्ना हजारे
आज भी इस देश में मध्यमवर्गीय परिवार राजनीति को गंदी नजरों से देखता है। परिवार का कोई बच्चा राजनीति में चला जाए। झंडा बैनर और भाषण की बात करने लगे तो घरवालों से उसे न जाने क्या क्या सुनना पड़ता है। लेकिन आज तस्वीर बदली हुई है। रामलीला मैदान में एक साथ तीन तीन पीढ़ी के लोग पहुंच रहे हैं। ताकत को बढ़ाने के लिए। मुझे नहीं लगता कि जिसे लोग गली मोहल्ले में नेता कहते हैं, या फिर जो राजनीतिक दलों का कार्यकर्ता है वो किसी आंदोलन, धरना, प्रदर्शन, बंदी में अपने बच्चों, बीवी और बेटा-बेटियों को लेकर सड़क पर जिन्दाबाद मुर्दाबाद के नारे लगाने के लिए उतरता है। लेकिन इस आंदोलन में नेता नहीं हर कोई नायक बनकर सड़क पर उतरा है। तीन महीने की बच्ची से लेकर तिहत्तर साल के बुर्जग तक में वही जोश है जो मंच से दिखता है।

एक आदमी की आवाज के पीछे लोग भाग रहे हैं। फिर भी अंधे और बहरे लोगों को न तो दिखाई दे रहा है और ना ही कुछ सुनाई दे रहा है। वक्त हमेशा एक जैसा नहीं होता। लीबिया, सीरिया, ट्यूनिशिया और मिस्र जैसा आइटम गवाह है जहां तीस साल-चालीस साल तक पके पकाए जमींदारों को जमीन में लिटा दिया गया। यहां तो फिर भी सब कुछ सामान्य है। खामोश है हिन्दुस्तान। मन में चिंगारी है लेकिन दबी हुई। लोग उसे हवा नहीं दे रहे। लेकिन सन्नाटा तो कभी भी मजबूर कर सकता है।
19 अगस्त, दिल्ली की सड़कों पर जनसैलाब

चालीस साल
बाद टीम इंडिया की ऐसी शर्मनाक हार हुई है । वो भी उस कप्तान की कप्तानी में जिसने इस टीम को नंबर वन बनाया था। उसी कप्तान की कप्तानी में टीम की नैया डूब गई। टीवी पर कुछ देर के लिए माहौल बनाने की कोशिश भी हुई लेकिन रामलीला मैदान के मंच पर छाए सन्नाटे ने इन्हें आज बख्श दिया। जिस कप्तान की तारीफ में कसीदे पढ़ पढ़ करके थकते नहीं थे उसे भी हार का सामना करना पड़ा है। संयोग है कि आज कल में वापस नहीं लौटना है नहीं तो उनको भी माफी मांगने के लिए रामलीला मैदान जाना होता। कहने के मतलब ये कि आज हिन्दुस्तान रामलीला मैदान की ओर देख रहा है। आज की ये पीढ़ी पहली बार दिल्ली की सड़कों पर लाखों की भीड़ देख रही है। छुट्टी लेकर लोग रामलीला मैदान का रुख कर रहे हैं। लड़ाई है। जो लड़ी जा रही है। अन्ना इस लड़ाई में जनता के जनरल हैं और सड़क पर उतरी ये सेना इस लड़ाई में उनका साथ दे रही है। और इतिहास गवाह है कि शासन को झुकना ही पड़ा है। शांति अहिंसा और सदाचार के नारे के साथ जो शांतिपूर्ण क्रांति की शुरुआत हुई है उसका असर सिर्फ इस पीढ़ी को नहीं कई पीढ़ियों पर पड़ने वाला है। बात सिर्फ अब कानून बनने और न बनने को लेकर नहीं हो रही । बात अब सच और झूठ की है। धोखे में रखने की है। सच को छिपाने की है। 



Friday, June 24, 2011

तलाश कीजिए... शायद मिल जाए।

जिंदगी में खुशियां जो हैं वो तो खोजने से मिलती है लेकिन परेशानी जो है वो तो कदम कदम पर है। आदमी रोज खुशियों की तलाश करता है। बहाने खोजता है खुश रहने के। लेकिन खुशियां इंतजार कराती हैं। बहुत कम लोग होते हैं जिनपे आप भरोसा करते हैं या फिर बहुत कम लोग होते हैं जो आप पर भरोसा करते हैं। लोग कहते हैं कि भरोसा बहुत बड़ी चीज है, मुझे भी ऐसा लगता है। खुशियां बांटने के वक्त बहुत से लोग आपके करीबी हो जाते हैं। लेकिन परेशानी में शायद ही कोई साथ देने वाला मिलता है। मेरे कहने का ये मतलब ये नहीं है कि अपकी हर खुशी में हर कोई आपके जितना ही खुश होता है। इस संदर्भ में कुछ खुशी दिखाने की होती है तो कुछ लोगों की खुशी मजबूरी में। लेकिन जो आपके साथ वाकई में खुश होता है या फिर आपकी खुशी में आपसे ज्यादा उसे खुशी मिलती है तो वो आपका परिवार होता है। परिवार का मतलब सिर्फ मां-बाप, भाई-बहन ही नहीं है।

करोगे याद....

परिवार का मतलब वो साथी जो आपके साथ हर वक्त खड़ा है, आपके दुख-सुख में, सपनों में, हकीकत में, खाने में, पीने में। असल में आपके जीने का असली साथी, असली दोस्त, असली भाई, असली परिवार यही है। जो लोग इस मौके पर आपके साथ हैं वो लोग आपकी परेशानी में भी आपके सहभागी बनने के काबिल हैं। घर से कोसों दूर भागमभाग भरी जिंदगी में रोज लड़ाई होती है, कभी अपने से कभी अपने काम से तो कभी अपनों से। लेकिन इस भागमभाग में आपको अपनों की कमी खलती है। घर से कोसों दूर घरवाले यानी मम्मी-पापा, भाई-भाभी आपकी रोज रोज की परेशानियों को बांट नहीं सकते। खुशियां तो बांट लेते हैं। लेकिन परेशानी आप घरवालों को नहीं बताना चाहते इसलिए कि आप अपने घरवालों से प्यार करते हैं। उनको आपकी परेशानियों के बारे में पता चलेगा तो वो आपसे ज्यादा परेशान हो जाएंगे। यही सोचकर हम में से ज्यादा लोग घरवालों से हर परेशानी पर परिचर्चा नहीं करते। ऐसी ही परेशानियों पर चर्चा के लिए आपको करीबी दोस्त, साथी, सहपाठी, सहयोगी की कमी महसूस होती है या जिनके पास इतने करीबी मौजूद हैं तो वो इनसे चर्चा कर लेते हैं। लेकिन जिनके पास इनमें से कोई नहीं है, उनको और ज्यादा परेशानी होती है। इसलिए ही परेशानी से बचने के लिए हमें बेहद करीबी की जरूरत महसूस होती है। यहां ये साफ करना जरूरी है कि बेहद करीबी का मतलब केवल आपकी प्रेमिका, प्रेमी या पत्नी, पति से ही नहीं है। कुछ दोस्त ऐसे भी होने चाहिए जिनकी अहमियत प्रेमी, प्रेमिका, पार्टनर, पति, पत्नी से ज्यादा हो। वैसे सच्चाई ये है कि बहुत कम लोग ऐसे किस्मत वाले हैं। कोशिश कीजिए शायद मेरी तरह कमी महसूस नहीं करेंगे। मैं भी बहाने खोज रहा हूं। धन्यवाद। बहुत दिन हो गये थे कुछ लिखा नहीं था। मेरे लिए भी ये कहानी पुरानी है लेकिन आज सोचा इसी से शुरुआत करूं।

Monday, February 21, 2011

सदी के 'सबसे बड़े कांड' पर फैसला


अब लोग गोधरा कांड के लिए जानते है...
 वैसे तो 9 साल पूरे होने में तकनीकी तौर पर पांच दिन कम है। लेकिन गिनती के जोड़-घटाव को छोड़ दें तो 9 साल पूरे मानिए। तो पूरे नौ साल बाद आ रहा है कल फैसला। वैसे तो हाल के दिनों में कई बड़े फैसले आए, लेकिन कल के फैसले का मतलब अलग है। कल जिस केस में फैसला आ रहा है उस घटना से पहले इस देश में एक अलग हिन्दुस्तान था और उस घटना के बाद अब इस देश में एक अलग हिन्दुस्तान है। 27 फरवरी 2002 बहुत लोगों को याद नहीं होगा, लेकिन लोग भूले भी नहीं होंगे। एक ट्रेन में कुछ उपद्रवी टाइप के लोग आग लगा देते हैं। आग लगना महज एक संयोग भी हो सकता है या फिर साजिश भी। तर्क और बहस अपनी जगह पर है। कुछ तो हुआ ही था तभी तो 58 लोग जिंदा जल गए। कई स्टिंग ऑपरेशन भी हो चुके, कई गवाह और कई तरह के लोग घटना के आगे और पीछे की कहानी कबूल चुके हैं। वैसे कोर्ट का फैसला कल आएगा, डिटेल में जानकारी मिल जाएगी।

गोधरा कांड के बाद का गुजरात

 9 साल पहले इस घटना के बाद जो घटना हुई उसने देश के एक बड़े प्रदेश की चरित्र का अलग चित्रण संपूर्ण ब्रह्मांड के सामने पेश किया। खैर, कारण जो भी रहा... कोशिश सब ने की। कहीं कोई. तो कहीं कोई... राजनीति करने वाले अपनी राजनीति करते रहे...सत्ता ने सत्ता का फायदा उठाया, तो विपक्ष उस फायदे पर अपना राग गाकर अपने फायदे की सियासत में जुटा रहा। देश में जब भी कोई चुनाव आता है “गोधरा और गोधरा के बाद” मुद्दा जरूर बनता है... वोट के लिए। बिहार हो तब चाहे यूपी हो तब।
सियासी फायदे के लिए मजबूरी का इस्तेमाल
ताया जाता है कि 27 फरवरी 2002 अयोध्या से लौट रहे कार सेवकों के जत्थे पर उपद्रवियों ने हमला किया था.. हमला इस शक्ल में था कि साबरमती एक्सप्रेस जब गोधरा में रुकी तो बोगी नंबर एस-6 में आग लगा दी गई। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप लिया.. और उस बोगी में मौजूद 58 लोग मारे गये। बाद में इस घटना ने सांप्रदायिक रूप लिया और फिर गोधरा सिर्फ गोधरा नहीं.. गोधरा कांड के रूप में देश में जाना जाने लगा। बाद में नरोडा पाटिया, गुलबर्गा सोसायटी और न जाने क्या क्या नाम देश को सुनने को मिले...बाद में कई जांच कमेटियां बनीं... रिपोर्ट भी तरह तरह के। किसी ने कहा बाहर से किसी ने कहा अंदर से। किसी ने साजिश किसी ने संयोग। सत्य क्या है...सामने आएगा...वैसे रेल चलाने वाले नेताओं ने भी अपने अपने हिसाब से इन नौ सालों में मन भर सियासत की। वोट बैंक से जुड़ा मामला तो था ही। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाने पर रोक लगा दी थी...हालांकि फिर 26 अक्टूबर 2010 को  हरी झंडी दे दी थी । 94 आरोपी 2002 से ही जेल में बंद हैं। अब गोधरा कांड की हकीकत से कल पर्दा उठने वाला है। साबरमती सेंट्रल जेल में विशेष जज पी.आर. पटेल कल फैसला सुनाएंगे। मामला ज्यादा न बिगड़े इसके लिए गोधरा के ये  ट्रेन वाले वीडियो... नहीं दिखाने का आदेश जारी हो चुका है, सो वो तस्वीरें फिर से नहीं दिखेगी। 
यही है वो तस्वीर... जिसने....
बीते कुछ सालों में कई बड़े फैसले देश ने देखे और सुने हैं। चाहे मुंबई का 93 बम ब्लास्ट का मामला हो। या फिर अयोध्या की विवादित जमीन का मामला। देश अब दस साल पुरानी तस्वीरों से ऊपर उठ चुका है। अयोध्या के विवाद ने ही देश में कई ‘कांड’ कराए थे। लेकिन जब पिछले साल फैसला आया तो देश ने धैर्य और हिम्मत के साथ उसे स्वीकार किया... किसी ने भी कल्पना नहीं की थी। फैसले की नहीं, इस तरह स्वीकार करने की। अब कल भी इसी टाइप से जुड़े मामले में फैसला आ रहा है। न्यूज चैनलों पर कवरेज सुबह से ही लाइव रहने के आसार है...क्योंकि 21वीं सदी के ‘सबसे बड़े कांड’ पर फैसला जो आना है।