Friday, August 13, 2010

बिहार के बाहुबलियों को जानिए...

अब कहने को तो बिहार में ज्यादातर नेता अपने अपने इलाके में बाहुबली ही कहे जाते हैं। लेकिन उन बाहुबलियों के बारे में चर्चा करना ज्यादा जरूरी है जिनका प्रभाव अपने इलाके से बाहर भी है। ज्यादा दिन पहले नहीं पंद्रह साल पहले चलते हैं।
बिहार में उस वक्त गिने चुने बाहुबली हुआ करते थे। ये वो दौर था जब बिहार की राजनीति में बाहुबलियों का प्रभाव ज्यादा बढ़ा। और उनकी महत्वकांक्षाएं राजनेताओं की सियासत को हिलाने लगी थी। उस वक्त आनंद मोहन विधायक हुआ करते थे। पप्पू यादव भी विधायक थे। दोनों का खास इलाके, खास जाति पर अपना प्रभाव था। हालांकि 1995 से पहले ही आनंद मोहन
ने जनता दल का साथ छोड़ बिहार पीपुल्स पार्टी नाम का दल बनाया था। इस समय आनंद मोहन की पत्नी लवली वैशाली से उपचुनाव जीतकर सांसद बनी थीं। ये वो दौर था जब अशोक सम्राट, रामा सिंह, छोटन शुक्ला, देवेंद्र दुबे, सुनील पांडे, सतीश पांडे, अखिलेश सिंह, अवधेश मंडल, अशोक महतो, बृजबिहारी, शहाबुद्दीन अपराध के रास्ते सियासत में घुसने का रास्ता तलाश रहे थे। आनंद मोहन की पार्टी ने इनमें से कई लोगों को अपनी पार्टी के जरिये प्लेटफॉर्म भी मुहैय्या कराने का काम किया। हालांकि चुनाव से पहले छोटन शुक्ला की हत्या हो गई। अशोक सम्राट भी मारे गए। और भी कुछ नाम थे जो अभी याद नहीं आ रहा। लेकिन जो बचे उन्होंने वर्तमान हालात को देखते हुए सियासत में सीधे घुसना ही बेहतर समझा। देवेंद्र दुबे और सुनील पांडे ने नीतीश का साथ दिया..तो शुक्ला परिवार उस समय आनंद मोहन के करीब चला गया। ब़ृजबिहारी लालू के साथ थे। बाद में मंत्री रहते हुए हत्या हो गई। कुछ लोग निर्दलीय किस्मत आजमाने के लिए मैदान में उतरे। शहाबुद्दीन इसी दौर की उपज है। 95 में शहाबुद्दीन जीरादेई से पहली बार निर्दलीय जीतकर आए थे। बाद में उन्होंने लालू का साथ दिया और फिर कहां तक गए देश देख चुका है। ये हम उस दौर की चर्चा कर रहे हैं जब बिहार की सियासत में अपराधिकरण की शुरुआत हुई थी। 1995 से लेकर साल 2000 तक बिहार की सियासत में कई उलटफेर हुए। कई बाहुबली 'शहीद' हो गए तो कई लोगों ने सत्ता के साथ अपनी सियासी जमीन मजबूत बना ली। इस दौर में प्रभुनाथ सिंह, साधु यादव, तस्लीमुद्दीन, बूटन सिंह, प्रदीप महतो जैसे लोग भी परिस्थितियों के साथ ज्यादा मजबूत होते चले गए। जहां तक जनमत का मामला था तो इन बाहुबलिय़ों में ज्यादातर का अपने इलाके से बाहर प्रभाव उतना ज्यादा नहीं था। आनंद मोहन जरूर उस दौर में राजपूतों के सबसे बड़े नेता बनकर बिहार में उभर चुके थे। चूंकी लालू खुद यादवों का नेतृत्व कर रहे थे लिहाजा पप्पू यादव को वो कुर्सी नहीं मिली, लेकिन कोसी के इलाके में पप्पू यादव ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली। शुक्ला खानदान की सियासत को आगे बढ़ाने का काम किया मुन्ना शुक्ला ने। साल दो हजार आते आते बिहार की राजनीति में नेता कम बाहुबली ज्यादा थे जो सीधे सक्रिय हो गये। इस दौर में सूरजभान, अनंत सिंह, राजन तिवारी, सुनील पांडे, कौशल यादव, बबलू देव, धूमल सिंह, अखिलेश सिंह, दीलिप यादव सरीखे नेता सीधे सीधे खुद के लिए जनता से वोट मांगने जा पहुंचने वालों में शामिल हो गये। ज्यादातर लोग इनमें से जीतकर विधानसभा पहुंचे और बिहार विधानसभा की तस्वीर बदल दी थी। आपको अगर याद न हो तो बता दूं.. कि जब इनमें से ज्यादातर लोग निर्दलीय जीतकर आए तो सात दिन की सरकार में इन बाहुबलियों ने नीतीश कुमार का साथ दिया था। बाद में कई लोग जहां तहां अपनी सेटिंग करने में कामयाब हो गए।
अब अगर वर्तमान सूरत में इन बाहुबलियों की जगह के बारे में बता दूं तो... खुद आनंद मोहन जेल में हैं, और उनकी पत्नी कांग्रेस में। आश्चर्य न हो अगर कुछ दिनों बाद आनंद मोहन पत्नी के साथ फिर से जेडीयू में लौट आएं।
पप्पू यादव तो चुनाव नहीं लड़ सकते, लेकिन कागजी तौर पर पत्नी के साथ कांग्रेस में हैं। अभी कोई भी सांसद या विधायक नहीं हैं। सूरजभान लोजपा में हैं। लेकिन वो भी सांसद या विधायक नहीं हैं। राजन तिवारी भी हारे हुए हैं और जेल में हैं। प्रभुनाथ सिंह आरजेडी में गये हैं, हारे हुए हैं, न विधायक और ना ही सांसद हैं लेकिन सारण में अच्छा खासा प्रभाव है। तस्लीमुद्दीन अभी जेडीयू में हैं, हारे हुए हैं न सांसद हैं और ना ही विधायक कोसी (सीमांचल)के इलाके में अच्छा दबदबा है। साधु यादव कांग्रेस में हैं, हारे हुए हैं न सांसद हैं और ना विधायक, इनका कहां प्रभाव है नहीं मालूम। शहाबुद्दीन भी जेल में हैं। सजा पा चुके हैं लिहाजा चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, पत्नी को जरूर विधानसभा लड़ा सकते हैं। वैसे लोकसभा लड़कर हार चुकी हैं। इनका सीवान में प्रभाव है।
मुन्ना शुक्ला विधायक हैं और जेडीयू में हैं मुजफ्फरपुर और वैशाली में इनका दबदबा है। अनंत सिंह, सुनील पांडे, धूमल सिंह भी जेडीयू में हैं और विधायक हैं। ये वो बाहुबली हैं जो अपने क्षेत्र के साथ ही आसपास के क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं। वैसे और बाहुबलियों की बात करे तो बबलू देव अभी आरजेडी में हैं और विधायक हैं। अखिलेश सिंह, नवादा वाले अभी जेल में हैं शायद, पत्नी को चुनाव लड़वाया था एक बार विधायक भी बनीं थी लेकिन अभी कुछ नहीं हैं। कौशल यादव नवादा के गोविंदपुर से और उनकी पत्नी पूर्णिमा अभी नवादा से निर्दलीय विधायक हैं दोनों। और दिलीप यादव अभी आरजेडी से विधायक हैं। दिलीप यादव ने लेसी सिंह को हराया था, लेसी सिंह बूटन सिंह की पत्नी है। बूटन सिंह जो कि बाहुबली माने जाते थे उनकी 2000 के चुनाव से पहले हत्या हो गई थी। प्रदीप यादव की भी हत्या हो चुकी है, उनकी पत्नी अश्वमेघ देवी पहले विधायक बनीं अभी जेडीयू से सांसद हैं। जहानाबाद में जगदीश शर्मा बड़े नेता हैं और बाहुबली भी, कांग्रेसी थे पहले अभी जेडीयू के टिकट पर जीते थे लेकिम पार्टी से निलंबित हैं। पत्नी इनकी निर्दलीय विधायक हैं घोसी सीट से। जहानाबाद में अच्छा प्रभाव हैं। जहानाबाद में ही प्रभाव वाले नेता सुरेंद्र यादव भी हैं जो लोकसभा हार गये थे। लेकिन इलाके में प्रभाव है। इसके अलावा भी और कई नाम है। जैसा की शुरुआत में ही बताया हर इलाके में कोई न कोई लोकल बाहुबली है जो एक विधानसभा क्षेत्र की सियासत तो करता ही है। सीतामढ़ी में राजेश चौधरी, अनवारुल हक, श्रीनारायण सिंह का प्रभाव। मोतिहारी में बबलू देव, रमा देवी, सीताराम सिंह, राजन तिवारी, गप्पू राय, का प्रभाव तो बेतिया में सत्तन यादव, बीरबल यादव, पूर्णमासी राम का प्रभाव। पूर्णमासी राम अभी गोपालगंज से सांसद हैं, लेकिन बगहा में इनकी राजनीति अच्छी खासी पकड़ वाली है। जेडीयू से निलंबित चल रहे हैं। गोपालगंज में सतीश पांडे, साधु-सुभाष यादव का प्रभाव है। आरा, बक्सर में आइए तो यहां की राजनीति अलग तरीके से होती है। यहां लाल झंडे की सियासत भी है सो समीकरण समय के हिसाब से बनते बिगड़ते हैं। सुनील पांडे और भगवान सिंह सरीखे नेता अभी नीतीश की पार्टी से विधायक हैं। बेगूसराय में तो कई सूरमा है। बेगूसराय, नवादा और पटना के ग्रामीण इलाकों में तो बिहार के बाहुबलियों का हिसाब किताब चलता है। सूरजभान, अनंत सिंह, ललन सिंह(सूरजभान खेमा), नागा सिंह, नाटा सिंह का गिरोह(दोनों राजनीति में सीधे सक्रिय नहीं, शायद एक कोई अब नहीं है याद नहीं आ रहा)। नवादा के एक कोने में बाहुबली अखिलेश सिंह(वारसलीगंज),आदित्य सिंह, अशोक महतो, कौशल यादव जैसे लोग प्रभावी रूप से सक्रिय हैं। बिहारशरीफ में पप्पू खां। पूर्णिया और कोसी के इलाके में तो पप्पू यादव, तस्लीमु्ददीन, आनंद मोहन के अलावा अब शंकर सिंह, अवधेश मंडल, दिलीप यादव, किशोर कुमार मुन्ना भी प्रभावित करने वाले लोगों में शामिल हो गये हैं। ये रहा बिहार की सियासत के अपराधिकरण की कहानी का पूरा डाटा। वैसे अब भी कई दबंग टाइप के लोग हैं जिनका खास खास इलाके में खासा प्रभाव है। कुछ लोगों के नाम छूट गये होंगे, ऐसा मुझे पूरा भरोसा है। लेकिन मोटा मोटी डाटा जो है बिहार की सियासत का वो यही है। कुछ लोग जाति के नाम पर नेता बने हुए हैं तो कुछ लोगों की इलाके से बाहर सिर्फ बाहुबली नेता की पहचान है इसके अलग ढेला भर का कोई प्रभाव वो नहीं छोड़ सकते। रही बात किस पार्टी में कितने बाहुबली है वो अंदाज लग गया होगा। वैसे कुछ और बाहुबली हैं ,जो अपना जुगाड़ या अपनी पत्नी के लिए टिकट का जुगाड़ लगा रहे हैं पहली पसंद उनकी अभी जनता दल यूनाइटेड हैं, दूसरी कांग्रेस। ताजा खबर ये है कि कुछ लोग जो आरजेडी के टिकट पर जीतकर पिछली बार आए थे.. और उनका रिश्ता, रिश्तेदार किसी न किसी रूप में अपराध जगत से जुड़ा है वो लोग जेडीयू में जा रहे हैं। पक्की खबर है। वैसे एक बात बता देना जरूरी होगा कि नीतीश ने अपने राज में बाहुबलियों को फड़फड़ाने का मौका नहीं दिया। ज्यादातर बाहुबली नीतीश के राज में ही जेल गये। अब देखिये इस चुनाव में क्या होता है।

Monday, August 9, 2010

बिहार में सियासी पारी के 10 साल

1994 में कॉलेज में आ गया था। 1995 में बिहार में विधानसभा के चुनाव होने थे। जनवरी का महीना था। मुजफ्फरपुर में उस वक्त मैं सतपुरा में रहता था। पास में ही आनंद मोहन का कार्यक्रम चल रहा था। शाम के वक्त टहलते फिरते वहां पहुंच गया। किसी से कोई जान पहचान नहीं थी, गायघाट से आनंद मोहन नामांकन भरके लौटे थे। कुछ लोगों ने उन्हें शिवहर से चुनाव लड़ने को कहा। उन लोगों में मैं भी शामिल था। आनंद मोहन राजी हो गये और शिवहर से नामांकन भरने की हामी भर दी। उसी समय मेरा राजनीति से रिश्ता जुड़ गया। धीरे-धीरे मैं राजनीति के करीब होता चला गया। प्लेटफॉर्म की तलाश हो रही थी। आनंद मोहन चुनाव हार गये सो संपर्क गहरा नहीं हो पाया। अब सतपुरा से मैं दामूचक में रहने आ गया था। जिस घर में रहता था उसी के बगल के घर में आलोक भारती रहते थे। आलोक भैया उस समय समता पार्टी की छात्र इकाई के विश्वविद्यालय संयोजक थे। कैंपस में उनकी चलती थी। नेता से लेकर अपराधी और ठेकेदार सब उनके संपर्क में थे। विश्वविद्यालय कैंपस में उनका राज था। नवंबर दिसंबर 1995 का महीना था। विश्विद्यालय में छात्र समता का प्रांतीय सम्मेलन था, प्रदेश अध्यक्ष राघवेन्द्र सिंह तैयारियों का जायजा ले रहे थे, पहली बार मैं किसी पार्टी की बैठक में शामिल हो रहा था। परिचय का दौर चला तो मैंने अपना नाम मनोज कुमार मुक्ला बताया। (बाद में मैं राजनीति में इसी नाम से मशहूर हो गया।) टाइटल सुनने के बाद लोगों को आश्चर्य हुआ। खैर उसके बाद राज्यस्तरीय सम्मेलन खत्म हुआ। आलोक भारती अध्यक्ष हो गए। मैं उनकी कमेटी में कोषाध्यक्ष बना। (मेरे पास कोई कोष नहीं था)। राजनीति में सक्रिय होने का एक तमगा मिल गया था। धीरे धीरे राजनीति से रिश्ता गहरा होता गया। पढ़ाई-लिखाई से संपर्क कम होता चला गया। लेकिन छूटा नहीं था।
1996 में लोकसभा का चुनाव हुआ। जॉर्ज को चुनाव लड़ना था, लेकिन जॉर्ज को नीतीश मुजफ्फरपुर से नालंदा ले गए। मुजफ्फरपुर नेतृत्वविहीन हो गया था। जॉर्ज को मनाने के लिए पार्टी के नेता, कार्यकर्ता पटना गए। मैं पहली बार बस की छत पर बैठकर पटना गया था। शकुनी चौधरी के घर पर जॉर्ज को आना था। उस दिन नालंदा से नामांकन भरके वो लौटे थे। रात में शकुनी चौधरी के घर पर हमलोगों ने खूब हंगामा किया। एक सज्जन ने मुझे पेट्रोल का गैलन पकड़ा दिया।( तय ये हुआ था कि जॉर्ज मुजफ्फरपुर से लड़ने को राजी नहीं होंगे तो हमलोग विद्रोह करके पार्टी दफ्तर फूंक देंगे)हालांकि राजनीति में इतना कच्चा था कि पेट्रोल का गैलन थाम लिया.. थोड़ी देर बाद एहसास हुआ कि ये मैं क्या कर रहा हूं.. तो एक जगह मौके देखकर रोड पर ही गैलन छोड़ दिया। खैर....जॉर्ज तैयार नहीं हुए... कहा मुजफ्फरपुर अपना नेता चुन लें। बाद में हरेंद्र जी को टिकट मिला। हरेंद्र जी को हमलोग सर कहके बुलाते थे। हमलोग(नौजवानों की टोली) मुजफ्फरपुर की राजनीति में हरेंद्र जी
के लोग कहलाते थे। हरेंद्र जी मुजफ्फरपुर से और आनंद मोहन(जेल से) शिवहर से लोकसभा चुनाव लड़े। हरेंद्र जी हार गए। आनंद मोहन की जीत हुई। तब तक मुजफ्फरपुर की राजनीति में नेता, कार्यकर्ता, मीडिया की बीच पहचान बनने लगी थी...
आनंद मोहन से जेल में मुलाकात हुई और फिर संपर्क बहाल हुआ। तब तक मैं विश्वविद्यालय की राजनीति का फायदा उठाते हुए शिवहर जिला छात्र समता का स्वयंभू अध्यक्ष बन गया था। प्रदेश कमेटी ने मंजूरी भी दे दी। लेकिन आनंद मोहन ने भूमिहार कैसे अध्यक्ष हो सकता है शिवहर जिले का मेरा मनोनयन रद्द करवा दिया। इस वक्त मुझे राजनीति में जाति की अहमियत का एहसास हुआ। खैर कुछ दिन तक मामला चलता था। मैंने खुद को मुजफ्फरपुर की राजनीति पर केंद्रित कर दिया।
तब तक 1998 का चुनाव आ गया। हरेंद्र जी को इस बार डायरेक्ट उम्मीदवारी मिली। हमलोगों ने पूरी ताकत लगा दी। लेकिन परिणाम पक्ष में नहीं रहा। तब तक आनंद मोहन समता पार्टी से बाहर हो गये थे। आलोक भारती छात्र राजनीति से अलग हो गए। ठाकुर आलोक अब अध्यक्ष बनाये गए। ठाकुर आलोक की कमेटी में मैं प्रवक्ता बना। मीडिया के लोगों से रिश्ते बेहतर हुए।
ठाकुर आलोक ने संगठन की पूरी जिम्मेदारी मुझे सौंप दी थी। उनके हिस्से का सारा काम मैं देखने लगा था। अब मैं संगठन का उपाध्यक्ष हो गया। तब तक एक बार फिर से चुनाव की घोषणा हो गई। 1999 के लोकसभा चुनाव में हरेंद्र जी को टिकट नहीं मिला। इस वक्त समता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड का विलय हो गया था। हम लोग बिना पद के हो गये थे। कैप्टन निषाद को टिकट मिला और वो जीत गए। इस समय हमलोगों ने एक निर्दलीय उम्मीदवार का साथ दिया था। चुनाव बाद फिर जनता दल यूनाईटेड और समता पार्टी का बंटवारा हो गया। हमलोग समता पार्टी के साथ में ही थे। 2000 में बिहार विधानसभा का चुनाव होने वाला था। संगठन ने मुझे पहले कार्यकारी अध्यक्ष बनाया और एक महीने बाद विश्वविद्यालय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी। पांच साल में कोषाध्यक्ष से अध्यक्ष तक की कुर्सी तक पहुंचने में बड़ा कठिन संघर्ष करना पड़ा। तब तक पढ़ाई लिखाई भी हो रही थी। कांटी से हरेंद्र जी को विधानसभा का टिकट मिला लेकिन फिर से हमलोग हार गए। संगठन को मजबूत करने का कार्यक्रम चलता रहा। नए-नए साथी जुड़ते रहे। बहुत लोगों को सक्रिय राजनीति से जोड़ा। विश्वविद्यालय के साथ ही जिले की राजनीति में भी दिलचस्पी बढ़ती गई। चूंकी जिले के सबसे बड़े नेता का करीबी था सो जिम्मेदारी ज्यादा मिलने लगी थी। धीरे धीरे राजनीति का दायरा फैलने लगा। इस बीच कई साथी राजनीति और अपराध के गठजोड़ का शिकार हो गए। संघर्ष का दौर चलता रहा। इसी दौरान पटना में एक बड़ा कार्यक्रम था। तब भूमिपाल (विधान पार्षद है अभी) अध्यक्ष हुआ करते थे हमारे संगठन के। मेरा एक सहयोगी था.. उसने कुछ घालमेल कर दिया। उसकी महत्वकांक्षाएं हिलोरी मार रही थी। पटना वाला कार्यक्रम संपन्न हो गया। लेकिन छात्र राजनीति से मेरी दिलचस्पी कम होने लगी। एक दिन मैंने बिना किसी को बताए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।( हमारे संगठन में तब अध्यक्ष के लिए मारपीट और ताकत का प्रदर्शन होता था) अखबारों में खबर नहीं छपी। क्योंकि इस्तीफा मैंने गोपनीय तरीके से दिया था। एक महीने बाद फिर संगठन में वही शख्स मेरा उत्तराधिकारी बना, जिसने घालमेल किया था। मैंने छात्र राजनीति से खुद को अलग कर लिया। इस दौरान मैं यूथ विंग की राजनीति में सक्रिय हो गया। हरिओम कुशवाहा उस वक्त मुजफ्फरपुर के अध्यक्ष थे। उनकी कमेटी में मैं प्रधान महासतचिव बना। जो की अध्यक्ष के बाद सबसे ताकतवर पद होता है। जिले की राजनीति में दखल बढ़ती गई। बड़े बड़े कार्यक्रम होने लगे। उस वक्त भगवान सिंह कुशवाहा बिहार युवा समता के अध्यक्ष थे।(अभी ग्रामीण विकास मंत्री हैं) भगवान सिंह से भी ट्यूनिंग ठीक हो गई। सीढ़ी दर सीढी चढ़ते चढ़ते यहां तक पहुंचा.. इस बीच कई लोगों की आंखों की किरकिरी भी बन गया था। अखबारों में विवादित खबरें छपने लगी। मुझे घरवालों ने दिल्ली भेज दिया पढ़ने के लिए, साल 2002 था। एक महीना रहने के बाद फिर मैं चला गया। छे महीने बाद फिर आया। मई 2003 में। 4 महीने रहने के बाद फिर लौट गया। इस बीच मैंने दिल्ली में बिहारी छात्रों का एक संगठन बनाया। बिहारी छात्र युवा संघर्ष मोर्चा। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव में एबीवीपी के उम्मीदवार अनुभव सप्रा(उपाध्य़क्ष) को समर्थन दिया। हालांकि सप्रा की हार हुई, लेकिन मेरी और संगठन की पहचान कैंपस में स्थापित हो गई। उस साल रोहित शर्मा अध्यक्ष बना था और नरेंद्र टोकस उपाध्यक्ष। रागिनी सचिव बनीं थी। सिर्फ उपाध्यक्ष के लिए मेरे संगठन ने वोट मांगे थे। बाकी पदों के लिए टोकस और रागिनी को समर्थन दिया था।
इसी बीच असम में बिहारी छात्रों पर हमला हुआ था। मैं मुजफ्फरपुर गया और पप्पू यादव के संगठन के साथ मिलकर बिहार बंद का एलान किया। एक बार फिर से नए मंच के साथ बिहार की राजनीति में वापसी हो गई थी। तब तक कुछ दिनों बाद लोकसभा का चुनाव होने वाला था 2004 का। मैं अपने संगठन के साथ जनता दल यूनाईटेड में शामिल हो गया। इस बार गणेश भारती (अभी एमएलसी )को पार्टी ने मुजफ्फरपुर जिला पार्टी का अध्यक्ष बनाया। गणेश भारती की कमेटी में मुझे महासचिव बनाया गया। मतलब पार्टी की जिला स्तर की सबसे बड़ी इकाई में महासचिव का पद दिया गया। हालांकि गणेश भारती पहले हमलोगों के खेमे में ही थे... नीतीश कुमार के करीबी हैं गणेश भारती कुछ स्थनीय राजनीति को लेकर हमलोग उनके साथ नहीं थे। विवाद हुआ मैंने इस्तीफा दिया। बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके। हमारे खेमे की यही मंशा थी। तब तक चुनाव में टिकट बंटवारे का मसला सामने आया। नीतीश नालंदा से लड़ना चाहते थे। बाढ़ से उन्हें हारने का डर था। बाद में हुआ भी ऐसा ही। नीतीश नालंदा से लड़े, जॉर्ज मुजफ्फरपुर से।(नीतीश बाढ़ से हार गए)। जॉर्ज मुजफ्फरपुर से लड़ने आए तो
हरेंद्र जी को वैशाली से टिकट दे दिया।(2004 के चुनाव से पहले फिर समता पार्टी और जेडीयू का विलय हो गया था) नीतीश, शरद यादव, पासवान राजी नहीं थे। हरेंद्र जी के प्रचार में कोई नेता नहीं गया। चुनाव हरेंद्र जी हार गए। मैं अभी मुजफ्फरपुर में ही था। संगठन के फेरबदल में चंद्रभूषण राय बिहार छात्र जेडीयू के अध्यक्ष बने और मुझे उन्होंने अपनी कमेटी में तिरहुत प्रमंडल से इकलौता महासचिव बनाया। पद बड़ा था, जिम्मेदारी ज्यादा दी गई। लेकिन मैं कमेटी की पहली बैठक में जा पाता उससे पहले ही मैं इस लाइन में आ गया। लेकिन यहां आने के बाद भी राजनीति का सिलसिला थमा नहीं। अब जेडीयू की राजनीति दिल्ली से होने लगी। मुजफ्फरपुर की छात्र राजनीति में मैंने जो जगह खाली की थी उसकी जगह मैंने अपने करीबियों को स्थापित करवाया। और दिल्ली से संगठन को कंट्रोल करने लगा। मुजफ्फरपुर के अखबारों में ये बात छपने लगी कि उत्तर बिहार की छात्र राजनीति इन दिनों जेएनयू कैंपस से डील हो रही है। साल-डेढ़ साल ये डीलिंग जारी रही। दिल्ली से मैं मुंबई चला गया.. लेकिन राजनीति का सिलसिला जारी रहा। बिहार में सरकार बन चुकी थी... लोग कुर्सी हथियाने में लगे थे। सत्ताधारी दल के संगठन में पद के लिए लोग खून के प्यासे हो जाते हैं। लेकिन मुंबई से ही मैंने अपने संबंधों और प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने करीबियों को एक बार फिर संगठन में अच्छे ओहदे पर स्थापित किया। लेकिन दिन, महीने गुजरते गए..मैंने दिलचस्पी कम कर दी... नतीजा हुआ मेरे कई साथी अकेले हो गए तो कई मंत्री, विधायक और सांसद तक। पढ़कर आश्चर्य मत कीजिएगा। लेकिन कुछ गायब भी हो गए... इनमें से आज कौन कहां है... पता भी नहीं चलता। कई लोगों का तो फोन नंबर तक नहीं है। बात कहां से होगी और मुलाकात की बात छोड़ दीजिए। जिनका नाम है वो बड़े आदमी हो गए...सोचता हूं मैं भी एक बार फिर से शुरू कर दूं क्या????? लेकिन डर है कि शुरू से न शुरू करना पड़ा।

Tuesday, April 6, 2010

फिर टूटेगा जनता दल!

समाजवादी जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, लोकदल, राष्ट्रीय लोकदल, समता पार्टी, आरजेडी, एलजेपी, जेडीयू, जेडीएस और न जाने क्या.. क्या.. आज की पीढ़ी को याद भी नहीं... पुराने लोग भी भूल गये...इन दलों के नेता कभी एक दल में हुआ करते थे... और वो था जनता दल। जनता दल की चर्चा जनता पार्टी के बगैर नहीं हो सकती। जेपी के मार्गदर्शन में जनता पार्टी को 77 में पहली बार कांग्रेस राज खत्म करने का अवसर मिला। जनता पार्टी के नेतृत्व में साझा सरकार भी बनी लेकिन ढाई साल बाद सरकार जाती रही। कांग्रेस का राज आया। इधर जनता पार्टी और सहयोगियों के बीच मनमुटाव बढ़ने लगा था। इसके बाद बहुत कोशिश हुई परिस्थितियां ऐसी बनती चली गई कि चाह के भी जनता परिवार देश में कोई माहौल नहीं बना सका। मौका मिला 1989 में एक बार फिर जनता दल और बीजेपी(जनसंघ बदल चुका था 80 में)ने मिलकर चुनाव लड़ा और दोनों को फायदा हुआ। देश ने वी पी सिंह को सत्ता सौंप दी। कांग्रेस की सियासत से समाजवादियों की धारा में शामिल होने वाले वीपी सिंह इंदिरा गांधी के बेहद करीबी हुआ करते थे। चंद्रशेखर उनसे सीनियर थे। वी पी सिंह को लोग राजा साहब के नाम से पुकारते थे। इंदिरा गांधी ने ही पहली बार इन्हें अपनी कैबिनेट में जगह दी। आपातकाल के दौरान जब जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता गांधी का साथ छोड़कर चले गए थे तब उस समय वी पी सिंह इंदिरा गांधी के साथ डटकर खड़े रहे। इसका फायदा भी मिला। इंदिरा जब सत्ता में लौटी तो वीपी सिंह यूपी के सीएम बने। एक दुखद घटना हुई वीपी सिंह के कार्यकाल में ही उनके भाई जो कि जज थे डाकुओं ने हत्या कर दी। कानून व्यवस्थी की जिम्मेदारी लेकर वीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया. बाद में फिर दिल्ली की राजनीति में पहुंचे। इंदिरा जी की हत्या के बाद राजीव गांधी कैबिनेट में पहले वित्त मंत्री बने, बाद में राजीव गांधी ने वित्त मंत्री का पद ले लिया और रक्षा मंत्री बना दिया। इसी वक्त बोफोर्स घोटाला उजागर हुआ और वीपी सिंह ने मंत्री, सांसद और कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। राजीव गांधी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने में उस समय वीपी सिंह का साथ दिया मुफ्ती मोहम्मद सईद, अरुण नेहरु व आरिंफ मोहम्मद खान जैसे बड़े कांग्रेसियों ने। इन लोगों के साथ मिलकर 1988 में वीपी सिंह ने जनमोर्चा का गठन किया।

देश की राजनीति के लिए 1988 का साल एक ऐतिहासिक साल था। इस वक्त चंद्रशेखर जनता पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे।
चंद्रशेखर भी कांग्रेस की राजनीति करके लौटे थे। चंद्रशेखर के बारे में कहा जाता है कि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की सियासत करने के बाद जब चंद्रशेखर कांग्रेस में आए और पहली बार इनका इंदिरा गांधी से सामना हुआ तो बड़ा ही दिलचस्प नजारा था। उस वक्त इंदिरा गांधी से सवाल-जवाब करने की कोई हिम्मत क्या कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन चंद्रशेखर कांग्रेस को समाजवादी विचारधारा से जोड़ने की मुहिम में लगे थे। इंदिरा जी ने पूछा चंद्रशेखर अगर कांग्रेस का समाजवादीकरण नहीं हुआ तो क्या करोगे.... चंद्रशेखर जी ने बेबाक तरीके से जवाब दिया पार्टी को तोड़ने की कोशिश करूंगा। सवाल पूछा क्यूं... चंद्रशेखर जी ने उत्तर दिया कि कांग्रेस आज की तारीख में ऐसा बरगद बन गया है जिसके नीचे कोई पौधा उग नहीं पा रहा.. लिहाजा इसकी टहनियों को काटने की जरूरत पड़ेगी। सोचिये. चंद्रशेखर की हिम्मत। यही बेबाक अंदाज था कि कांग्रेस में चंद्रशेखर को युवा तुर्क के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन उनका यहां मन कहां लगने वाला था। जेपी और इंदिरा की राजनीति में चुनने की बारी आई तो चंद्रशेखर ने जेपी का साथ दिया। नतीजा हुआ जेल गये। 77 में सरकार बनी तो मंत्री पद का ऑफर मिला जिसे ठुकरा दिया इसलिए कि मोरारजी देसाई से इनके विचार मेल नहीं खाते थे। बाद में परिस्थितियां बदली और जनता पार्टी के मुखिया बने। पार्टी को सजाने संवारने का काम शुरू किया। देश भर में पैदल यात्रा शुरू की। समापन समारोह के दिन रामलीला मैदान में अब तक कगी सबसे बड़ी रैली हुई। कहा जाता है कि चंद्रशेखर इस रैली का फायदा नहीं उठा पाया। ये वक्त था 86-87 का।

( 1987 की एक घटना का जिक्र करते चलूं , ये वो दौर था जब राजीव गांधी और वीपी सिंह में मतभेद बढ़ चुके थे। वित्त मंत्री रहते अंबानी परिवार और अमिताभ के खिलाफ आयकर के छापे मारे जा चुके थे। वीपी सिंह से वित्त मंत्रालय ले लिया गया था। अब वो रक्षा मंत्री थे। भ्रष्ट्राचार के खिलाफ मुहिंम शुरू हो चुकी थी। चंद्रशेखर जी जैसे अनुभवी नेता ने वीपी सिंह की प्रतिभा को भांप लिया था। अपने एक करीबी से उन्होंने कहा था कि इसी के आसपास आने वाले दिनों में देश की राजनीति घूमने वाली है।चंद्रशेखर जी ने वीपी सिंह को संदेशा भिजवाया.. वीपी सिंह को जैसे ही ये बात बताई गई। वो मारुति कार में बैठकर हरियाणा के सोहाना पहुंचे, जहां चंद्रशेखर जी का भारत यात्रा केंद्र चल रहा था। दोनों एक दूसरे के गले मिले और करीब दो घंटे तक बातचीत हुई, देश की स्थिति और परिस्थिति के बारे में। वीपी सिंह के बड़े भाई चंद्रशेखर मित्र थे, इसलिए वीपी सिंह को वो छोटे भाई की तरह समझते थे)


11 अक्टूबर 1988 की वो तारीख थी। कांग्रेस से नाराज नेताओं ने जो कि समाजवादी सियासत की उपज थे और समाजवादी सोच से वास्ता रखते थे। जनता पार्टी, जनमोर्चा, लोकदल (अजीत सिंह)का विलय हुआ। और फिर बना जनता दल। वीपी सिंह अध्यक्ष बने। इतनी बड़ी पार्टी और इतने बड़े बड़े लोग थे की 150 सदस्यों की कार्यकारिणी बनाई गई। 1977 की जनता पार्टी और 1988 के जनता दल में बड़ा फर्क आ चुका था। और वो फर्क था पीढ़ी का। नेतृ्त बुजुर्ग के हाथ में नहीं रह गया था। सोच की दिशा बदल चुकी थी। जेपी से शिष्य भरे-पड़े थे। एक बार फिर से संपूर्ण क्रांति के नारे को सतह पर लाने की कोशिश शुरू हुई। चुनाव का वक्त आया। 1989 में जनता दल के टिकट पर दिग्गज लोग मैदान में उतरे। बीजेपी के साथ लड़ने का फायदा दोनों को हुआ। लेकिन समाजवादियों के बारे में जो कहावत है उसे गलत साबित करने का माद्दा किसी में नहीं था। वीपी सिंह को संसदीय दल का नेता बनने में पापड़ बेलने पड़े। चंद्रशेखर खुद दावेदार थे। लेकिन देवीलाल को आगे कर वीपी सिंह ने चाल चली। देवीलाल को संसदीय दल के नेता का प्रस्ताव खुद वीपी सिंह ने रखा। लेकिन देवीलाल ने पलटी मार दी और वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित कर दिया। नाराज होकर चंद्रशेखर बैठक से चले गये। नतीजा हुआ कि सरकार ज्यादा दिन तक नहीं चली। बीजेपी के सहयोग से राष्टीय मोर्चे की सरकार में वीपी सिंह पीएम बने थे। लेकिन आडवाणी गिरफ्तारी प्रकरण ने बीजेपी को नाराज कर दिया। इसी दौरान देवीलाल से भी सरकार के अच्छे संबंध नहीं रहे। वीपी सिंह के बाद जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने एसआर बोम्मई ने देवीलाल को 1 अगस्त 1990 को जनता दल से निकाल दिया। चंद दिनों बाद सरकार ही गिर गई। 1990 के अंत में चंद्रशेखर और देवीलाल 54 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गये। 5 नवंबर 1990 को नई पार्टी बनी समाजवादी जनता पार्टी। (देवेगौड़ा भी सजपा में आए थे)कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर देश के पीएम बने और देवीलाल डिप्टी पीएम। लेकिन चालीस सला बनाम चार महीने वाला नारा यहां मुसीबत का कारण बन गया। कांग्रेस ने कहा कि राजीव गांधी के पीछे सरकार जासूस लगा रही है। क्या था, समर्थन वापस और सरकार साफ।
4 अक्टूबर 1992 को चंद्रशेखर की पार्टी में भी सेंध लग गई। उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता और तब के जमाने में धरतीपुत्र के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली।
21 जून 1994 को फिर एक बार जनता दल में विभाजन हुआ। पार्टी के 14 सांसद जॉर्ज फर्नांडींस के नेतृत्व में जनता दल से अलग हो गये। नाम पड़ा जनता दल (ज),31 अक्टूबर 1994 को जनता दल (ज) का नाम समता पार्टी रख दिया गया।

इस बीच पार्टी को एक बार फिर सत्ता में आने का मौका मिला। कांग्रेस के सहयोग से 1996 में पहले देवेगौंड़ा और फिर गुजराल देश के पीएम बने। पार्टी के नेता वीपी सिंह के पास पीएम बनने का प्रस्ताव ले के गये थे.. लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। कहा जाता है कि वीपी सिंह के घर पार्टी के नेता मिलने पहुंचे थे और सिंह उस दिन दिन भर कार में बैठ कर रिंग रोड पर घूमते रहे। वीपी सिंह के कहने पर ही देवेगौड़ा को पीएम बनाया गया।
(जबकि उस समय भी शरद यादव, लालू यादव और मुलायम सिंह उसी जनता परिवार के देवेगौड़ा और गुजराल से कहीं ज्यादा कद्दावर नेता थे। लेकिन उनके आपसी अहं के टकराव ने एक बार फिर जनता सरकार अपनी मियाद पूरी किए बिना सिधार गई। )

सत्ता में रहते ही 5 जुलाई 1997 को जनता दल में एक और विभाजन हुआ, 3 जुलाई 97 को हुए अध्यक्ष के चुनाव को लेकर लालू यादव खेमा नाराज हो गया, और 5 जुलाई में लालू की अध्यक्षता में आरजेडी अस्तित्व में आया।

1997 में बीजेपी से तालमेल को लेकर पार्टी उड़ीसा में भी टूट गई। उड़ीसा के नेता बीजेपी से तालमेल के पक्ष में थे, लेकिन शरद यादव खेमा राजी नहीं था. नतीजा बीजू जनता दल अस्तित्व में आया और उड़ीसा से पार्टी खत्म हो गई।
1997 में ही कर्नाटक में भी पार्टी को झटका लगा। पार्टी के सबसे पुराने नेताओं में से एक रामकृष्ण हेगडे ने लोक शक्ति के नाम से नई पार्टी बना ली। 1998 में लोक शक्ति ने बीजेपी से मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा।
पार्टी को सबसे बड़ा घाटा हुआ 1999 में। जब बीजेपी से तालमेल को लेकर पार्टी दो खेमे में बंट गया। नतीजा हुआ कि बीजेपी के साथ नहीं जाने वाले नेताओं ने देवगौड़ा के साथ मिलकर जनता दल सेक्यूलर नाम से नई पार्टी बना ली। हालांकि विभाजन के बाद देवगौड़ा असली जनता दल का दावा करते रहे। मामला चुनाव आयोग में गया और फिर आयोग ने चुनाव चिन्ह चक्र को जब्त कर लिया। इसी विवाद के साथ जनता दल का अंत हो गया। न नाम रहा और न पार्टी। शरद यादव की पार्टी का नाम जनता दल यूनाइटेड पड़ा और देवगौड़ा की पार्टी का जनता दल सेक्यूलर।

1999 में जनता दल यू और समता पार्टी का विलय हो गया। दोनों दल के नेताओं ने तीर चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा। लेकिन नतीजों के बाद एकता नहीं रही। अध्यक्ष के सवाल पर पार्टी फिर से जनता दल यू और समता पार्टी में बंट गई।
हालांकि वाजपेयी सरकार में दोनों दलों के नेता मंत्री बने रहे। 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए में बीजेपी, समता पार्टी, जेडीयू और बीपीपा नाम के चार दल थे। चुनाव नतीजों के बाद नीतीश कुमार 7 दिनों के लिए सीएम बने। लेकिन मामला जमा नहीं। इसी साल जनता दल यू में एक और विभाजन हो गया। राम विलास पासवान चार सांसदों के साथ अलग हो गये। नई पार्टी बनी लोक जनशक्ति पार्टी।
2004 के चुनाव से पहले एक बार फिर जनता दल यू और समता पार्टी का विलय हो गया। जॉर्ज अध्यक्ष बने। शरद संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष, पार्टी का झंडा समता पार्टी के रंग का। लेकिन निशान जेडीयू का तीर। 2004 में लोकसभा चुनाव साथ लड़ा गया। नवंबर 2005 में पार्टी बिहार में सत्ता में आ गई। इस बीच जॉर्ज को साइड लाइन किया जाने लगा। अध्यक्ष पद के चुनाव में शरद यादव ने जॉर्ज को हरा दिया। जॉर्ज दरकिनार हो गये। 2009 के लोकसभा चुनाव में जॉर्ज को टिकट तक नहीं दिया गया। पार्टी संगठन पर शरद यादव की पकड़ मजबूत होती चली गई, नीतीश सरकार में मशरूफ रहे. संगठन का फायदा
शरद यादव को हुआ 2009 के संसदीय चुनाव में शरद यादव ने अपने समर्थकों को टिकट दिया और वो जीतकर आए। 22 सांसदों वाली इस पार्टी में 15-16 सांसद शरद यादव खेमे के हैं।
लेकिन अहं का टकराव एक बार फिर शुरू हो चुका है। महिला आरक्षण विधेयक का मतभेद तो लोगों ने देख लिया। ललन सिंह जो कभी नीतीश की परछाई माने जाते थे. नीतीश के खिलाफ बोल रहे हैं। नए चेहरे (विजय चौधरी) को नीतीश के कहने पर बिहार का अध्यक्ष बनाया गया है। ललन सिंह, प्रभुनाथ सिंह खुलकर खिलाफ में हैं। पार्टी के सांसद जगदीश शर्मा, पूर्णमासी राम पहले से निलंबित चल रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा की वापसी, लालू के पुराने दरबारियों की नीतीश के दरबार में बढती इज्जत से पार्टी का एक बड़ा तबका नाराज है। अभी तो कोई बोल नहीं रहा लेकिन कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर दो-तीन महीने बाद लोग जोर जोर से बोलने लगे। पार्टी के भीतर के लक्षणों को देखे तो नीतीश की कार्यशैली से कार्यकर्ता खुश नहीं हैं। उसमें भी टिकट को लेकर खेल तो शुरू हो गया है। नीतीश और शरद यादव के बीच अब सीधी लड़ाई होने वाली है। वैसे समाजवादियों के चरित्र और इतिहास को देखे तो बंटवारा हमेशा अहं को लेकर हुआ है.... और संगठन पर कब्जा इसकी एक बड़ी वजह है।

कभी बिहार, यूपी, कर्नाटक, उड़ीसा, गुजरात, हरियाणा जैसे प्रदेशों में सबसे ताकतवर रही इस पार्टी का बंटवारे के बाद क्या हाल है देख लीजिए। आने वाले दिनों में अगर अपने अहं को छोड़कर ये पुराने समाजवादी एक झेडे और एक निशान के साथ आ जाए तो देश की राजनीति की दिशा क्या होगी आकलन लगाने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

Saturday, January 30, 2010

खबर का असर....!

13 जनवरी को मैने एक खबर दी थी... शीषर्क था... खबर पक्की है? अब प्रश्नवाचक चिन्ह का मतलब नहीं रह गया..
हालांकि हटा नहीं रहा हूं...शरद यादव ने आज ललन सिंह के इस्तीफे की खबर की पुष्टि कर दी.. खुद ललन सिंह भी
सामने आ गए। सच्चाई से पर्दा उठा दिया। राहुल गांधी का बिहार दौरा 1 फरवरी से शुरू हो रहा है... चर्चा तो होगी, लेकिन
अभी कोई फैसला होगा साफ-साफ कह नहीं सकते। नीतीश कुमार और ललन सिंह के बीच बातचीत की गुंजाइश नहीं बची है। ललन विरोधी खेमा लगातार इस प्रयास में है कि ललन सिंह को राहुल गांधी का आदमी घोषित कर दिया जाए। कमोबेश मामला मुकाम तक पहुंचता दिख रहा है... वैसे समाज के लोग भी मानते हैं कि ललन सिंह के जाने से फायदा होगा.... अऱुण कुमार सिंह पब्लिक के नेता हैं। ललन सिंह हाल की राजनीति के उपज है... मैं जब 1995 में पार्टी में आया था तब ललन जी पार्टी के प्रदेश के कोषाध्यक्ष हुआ करते थे... हालांकि नीतीश कुमार का फाइल वही डील करते थे.. हाल तक करते रहे हैं...अब कांग्रेस में जाएंगे अगर तो.. कैसे एडजस्टमेंट होगा कह नहीं सकते। वैसे नीतीश कुमार की राजनीति क्लियर नहीं है...पार्टी का एक बड़ा तबका... कार्यकर्ताओं का खुद को बड़ा ही असहाय महसूस कर रहा है... राज्य में काम हुआ है हर कोई मान रहा है लेकिन कार्यकर्ता खुश नहीं हैं... इस साल चुनाव है... और चुनाव तो कार्यकर्ताओं को ही लड़ना है...अभी कई मोर्चों पर मारामारी होगी...पार्टी में एक बड़ा वर्ग बीजेपी से अलग चुनाव लड़ने का पक्षधर है.. नीतीश कुमार वोट के हिसाब से समाज को बांट भी रहे हैं...नीतीश कुमार को फायदा भी है तो नुकसान भी....अब भरपाई के लिए क्या रणनीति है उनके पास नहीं बता सकता...

Monday, January 25, 2010

फिल्म सिटी के नजदीक न होता तो ?

रात के बारह बजे थे, कटवारिया सराय से घर लौटना था, हां-ना करते करते साढ़े बारह का वक्त भी बीत गया...इधर लौटने वाले तीन लोग थे. मैं, निप्पू और विवेक। ऑटो से लौटने की तैयारी थी, फिर हुआ कि देर हो गई है ऑटो मिले न मिले.. नवीन सर ने अपनी बाइक दे दी. चेक चाक करके। निप्पू पीछे बैठा, मैं बीच में और विवेक चलाने लगा.. करीब एक बज गए होंगे.. चल दिये तीनों...एक किलोमीटर बाद ही गाड़ी बीच सड़क पर बंद.. तीनों उतरे.. दायां-बांया करके फिर से गाड़ी को निप्पू ने स्टार्ट कर दिया.. विवेक ने चलाना शुरू किया.. वाया एम्स, साउथ एक्स होते हुए डीएनडी की ओर चल पड़े। डीएनडी से पहले भारी कोहरा... हाथ को हाथ न सूझे..विवेक चलाए जा रहा था...कभी आगे चल रहे ट्रक की रोशनी में तो कभी ऐसे ही... रोड समझकर चले जा रहे थे..डीएनडी पर टोकन लेने-देने के बाद आगे बढ़े.. आगे ऑटो, पीछे बाइक... निप्पू ने कहा कि देखना रास्ता न गड़बड़ा जाए.. दिखाई तो दे नहीं रहा था.. अचानक ऑटो ने ब्रेक लिया.. हो गया कन्फ्यूजन..जाना था जिस रास्ते उस रास्ते न जाके फिल्म सिटी के सामने वाले रोड पर आ गए... सामने स्पीड ब्रेकर था...फिल्म सिटी के गेट पर...बाइक की रफ्तार कम क्या हुई.. बीच रोड पर स्टार्ट बाइक न आगे जा रही है न पीछे.. अभी दो बजने वाले थे रात के। कोहरा बढ़ते ही जा रहा था...बाइक का इलाज शुरू किया गया.. बीमारी समझ में नहीं आ रहा था... न आगे जाए न पीछे...पंद्रह मिनट बाद नवीन जी को फोन किये..." sir..bike bich road per kharab ho gai...kya baat kar rahe ho...ji sir..ligiye nippu se baat kijiye"
nippu- bhaiya, samjh me aa gaya, chain tut gai... gadi ko wahi sadak pe chhod k tum log chale jao.." लास्ट वाला बयान नवीन सर का था। तभी जिस रास्ते से हम लोग आए थे उसी रास्ते से एक मारुति ओमनी (टैक्सी) वाला आया... दोनों के हाथ देने पर बेचारा रूक गया... उस बेचारे ड्राइवर को दिल्ली जाना था, रास्ता भूल गया था, उसकी जरूरत ये थी ये लोग मुझे रास्ता बता देंगे...बेचारे का एक हाथ नहीं था..लेकिन यहां तो तीन-तीन लोग थे.. साथ में मोटरसाइकिल जो न आगे जाने का नाम ले.. न पीछे, ठेलने पर भी। निप्पू और विवेक टैक्सी में बैठ गये.. और बाइक लादने की जिद करने लगे... बेचारा टैक्सी वाला रात के दो बजे अकेले छटपटा रहा था... हमलोगों की जिद भी जायज थी... परेशान थे भाई.. बहुत देर से... ऊपर से कोई आशंका दिख नहीं रही थी कि यहां से कटे कैसे।
मैंने पहले मुकेश पराशर जी को फोन लगाया.. ये पता करने के लिए कि क्या अमित गुप्ता जी दफ्तर में है..पराशर जी ने फोन नहीं उठाया... मेरा एक दोस्त है प्रभात, न्यूज 24 में.. फिर उसको मिस कॉल दिया..जगा है कि सोया है.. कौन सी शिफ्ट है.. नहीं मालूम था...इसलिए मिस कॉल देकर छोड़ दिया... उसका कॉल तुरंत आ गया... लेकिन रिसीव करने के बजाए मेरे हाथ से कट गया.. मैंने कॉल बैक किया.. बात की मालूम हुआ उसकी नाइट शिफ्ट है और वो दफ्तर में है...तब तक इधर निप्पू और विवेक टैक्सी वाले को छोड़ने को तैयार नहीं है... दोनों उसी टैक्सी में जाकर बैठे हैं... बाइक के लिए जगह बना रहे थे दोनों... प्रभात से बात करने के बाद फिर मैंने दोनों को कहा कि टैक्सी वाले को जाने दो.. और गाड़ी को किसी तरह से ठेल-ठाल के न्यूज 24 के दफ्तर के पास ले चलो। (निप्पू और विवेक को नहीं मालूम चल पा रहा था कि हम लोग फंसे कहां हैं... ये बात मैं नहीं जान रहा था... मुझे मालूम था कि हमलोग फिल्म सिटी के मेन गेट पर फंसे हुए हैं...)टैक्सी वाला चला गया.. जाना था दिल्ली बेचारा कहां गया पता नहीं... निप्पू और विवेक के जान में जान आई कि वो लोग फिल्म सिटी के पास फंसे हैं.. खैर दोनों ठेल-ठाल के बाइक को फिल्म सिटी ले गये...चेन अंदर फंसने के चलते आवाज... कल्पना कर लीजिए... बताएंगे तो बोर हो जाइएगा... दफ्तर से प्रभात नीचे आया... बाइक पार्क की गई...सुबह वापस ले जाने का आश्वासन देकर... अंदर-अंदर हमलोग आईबीएन की तरफ पहुंच गये... यहां और कन्फ्यूजन.. कोहरे के चलते जाना किधर है... पते न चले... पास में एक ड्रॉपिंग की गाड़ी थी... विवेक ने जाकर बात की...बुजुर्ग आदमी थे...अपना दुखड़ा सुनाने लगे... लेकिन फिर बोले कि मेन रोड पर छोड़ देता हूं... हमलोग बैठे और
फिल्म सिटी के दूसरे वाले गेट पर पहुंच गये... यहां से हमलोगों को अट्टा पहुंचना था... चलने लगे...रास्ते में लिफ्ट मांगने की कोशिश करते रहे... निप्पू और विवेक...बीच पुल पर जो फिल्म सिटी और अट्टा के बीच है, फ्लाइओवर से पहले, एक कार रुकी, चौबीस-पच्चीस साल का लड़का चला रहा था. पिकअप-ड्रॉपिंग का मामला था...तीनों बैठ गये.. इससे पहले कि वो कहे जा रहा था कि मैं तो रजनीगंधा जाऊंगा... फाइनली वो रजनीगंधा के रास्ते नहीं मुड़ा... अट्टा की तरफ बढ़ते- बढ़ते नीचे से होते हुए बढ़ने लगा... सेक्टर 27 के सामने पूछा कि, कहां जाओगे...57 के थाने... हमलोगों ने बताया नहीं-58 के थाने...कार के ड्राइवर से बातचीत में मालूम चला कि वो पास के गांव का ही रहने वाला है... अभी तीन नहीं बजे थे...जैसे जैसे कार बढ़ रही थी रफ्तार कम होती जा रही थी... कोहरा इतना बढ गया था कि कुछ नहीं दिख रहा था...शॉप्रिक्स के कट से हमलोगों को मुड़ना था... ड्राइवर को समझ में नहीं आ रहा था... उसका वश चलता तो चार कट पहले ही मुड़ जाता.... जैसे तैसे शॉप्रिक्स के कट के पास पहुंचे तो उसने कार रोक दी...कहा रिक्शे वाले को जैकेट दूंगा अपना... हम तीनों में से किसी ने रिक्शे वाले को देखा नहीं था... कार से ड्राइवर उतर गया... बगल में खड़ा हो गया... हम तीनों कार में...भाई ये क्या माजरा है.. समझ में किसी को नहीं आ रहा था...तभी पीछे एक रिक्शावाला दिखा... पास आने पर ड्राइवर ने अपनी जैकेट उसे दे दी...न रिक्शेवाले को समझ में आया और ना ही हम लोगों को। फाइनली हमलोग अगले तीन-चार मिनट में सेक्टर 58 के थाने पहुंच गये...कार वाले को धन्यवाद किया... निप्पू ने कुछ पैसे दिए...लेने के बाद उसने कहा... दोस्त ये अच्छा नहीं किया...खैर फिर किसी तरह उसे समझाकर वापस भेज दिया।
हम तीनों वहीं कॉफी वाले के पास उतरे, सुबह के तीन बजने वाले थे। पिछले दो तीन घंटों को याद कर करके भगवान का शुक्रिया जता रहे थे। निप्पू ने कहा कि ये कार वाला वहां हमलोगों के लिए भगवान बनकर आया था... नहीं तो इस कोहरे में कहां टपला खा रहे होते पता भी नहीं चलता....निप्पू की बात में सच्चाई थी...वैसे एक बात और अगर फिल्म सिटी की जगह डीएनडी या फिर बीच में कहीं और बाइक का माचो हुआ होता तो क्या होता?
उस रात की ये तो एक कहानी है जिसमें हम तीनों किरदार थे.. एक और कहानी ठीक उसी रात और उसी वक्त की है... उसमें अभिनित और रश्मि के साथ साथ नवीन सर और रवींद्र जी भी भूमिका निभा रहे थे...इस कहानी को जानने के लिए
ब्लॉग बदलना पड़ेगा...दूसरी वाली कहानी भी पहली वाली कहानी से कम नहीं है।