Wednesday, May 22, 2013

लौट के ललन घर को आए...


                                ललन सिंह लौट के नीतीश के करीब आ गये हैं । 2010 के जनवरी महीने में उन्होंने जेडीयू के बिहार प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद से वो बहुत दिनों तक पार्टी के खिलाफ काम करते रहे । बिहार नवनिर्माण मंच बनाकर राज्य भर में नीतीश विरोधियों को एकजुट करने की कोशिश तो की ही 2010 में जब बिहार विधानसभा का चुनाव हो रहा था तब ललन सिंह कांग्रेस के लिए प्रचार कर रहे थे । जिस गाड़ी में ललन सिंह प्रचार के लिए बेगूसराय, मुंगेर के इलाके में निकलते थे उस गाड़ी में कांग्रेस का झंडा लगा रहता था। लेकिन अब वही ललन सिंह फिर से नीतीश के खेमे में लौट आए हैं।
ललन और नीतीश एक साथ-पुरानी तस्वीर
                          आज लखीसराय में सेवा यात्रा के लिए दोनों एक ही हेलिकॉप्टर में गए थे। मंच पर दोनों के बीच सिर्फ विजय चौधरी थे। कल ललन सिंह ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि गलतफहमी की वजह से दूरी बनी थी । अब दूर हो गई है और सब ठीक हो गया है। इंटरव्यू में ललन सिंह अलगाव के लिए खुद को दोषी मान रहे थे। जबकि लखीसराय में मंच पर नीतीश ने खुद को इसके लिए जिम्मेदार बताया। अब कौन कितना कम या ज्यादा जिम्मेदार है ये तो नहीं पता लेकिन दोनों जिम्मेदार हैं इसमें कोई शक नहीं है।
                           ललन सिंह आज नीतीश के साथ आ गये हैं तो इसके पीछे जरूर राजनीतिक सोच है। ऐसे ही नीतीश ललन को अपने पाले में नहीं लाए होंगे। जिस तरीके से बीजेपी और नीतीश के बीच दूरी बढ़ने की खबरें लगातार चर्चा में है उससे नीतीश जरूर परेशान चल रहे होंगे। हो सकता है भूमिहार वोटरों को संदेश देने की कोशिश के मद्देनजर उन्होंने ललन सिंह से हाथ मिलाया हो। माना जाता है कि बिहार की आबादी में करीब तीन साढ़े तीन फीसदी जो भूमिहार वोट है वो बीजेपी का आधार वोट है । बीजेपी से अलग होने की स्थिति में भूमिहार वोटर नीतीश से दूर जा सकते हैं । बहुत मुमकिन है कि नीतीश ऐसी किसी आशंका को हकीकत में बदलने से रोकने के लिए ललन को मना लाएं हों।
                           ललन सिंह की छवि वैसे तो मास भूमिहार नेता की नहीं रही है लेकिन नीतीश ने उन्हें अपने शुरुआती शासनकाल में स्थापित करने की जरूर कोशिश की थी। ललन सिंह भी चकबंदी कानून के खिलाफ खुलकर नीतीश के विरोध में खड़े हो गये थे। रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद आरा जाकर उन्होंने पिछले साल नीतीश को काफी भला बुरा भी कहा था। कुछ खास इलाकों में वोटरों में भले न सही लेकिन भूमिहार वोट को प्रभावित करने वाले नेताओं में उनकी पकड़ जरूर हो गई थी। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए प्रचार करने के बाद भले ही किसी को जीता न पाएं हो लेकिन अपने पसंदीदा कांग्रेसी उम्मीदवारों को वोट जरूर दिलवा दिया था।
नीतीश-ललन सिंह
 वैसे नीतीश सवर्ण वोटरों को लेकर चिंतित जरूर हैं। लखीसराय की सभा में आज भी ललन सिंह, विजय चौधरी, नरेंद्र सिंह, वशिष्ठ नरायाण सिंह जैसे सवर्ण भूमिहार-राजपूत नेताओं को ही उन्होंने खासी तवज्जो दी। बिहार में सवर्ण वोटरों की संख्या करीब 15 फीसदी है। लेकिन करीब तीस से चालीस फीसदी वोटरों को प्रभावित करने की क्षमता इसके नेता करते हैं। वैसे भी ललन अगर नीतीश के पास गए हैं तो जरूर कुछ न कुछ समझौता तो हुआ ही होगा।
        ये बात रही नीतीश को ललन सिंह के अपने करीब लाने की लेकिन ललन सिंह के भी नीतीश के करीब जाने की अपनी मजबूरियां हैं। ललन सिंह की बिहार में पहचान ही नीतीश की बदौलत थी। नीतीश से दोस्ती की वजह से ही उन्हें पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी मिली। समता पार्टी जब बनी थी तब वो पार्टी के लिए फंड का इंतजाम किया करते थे। बाद में 2005 में इन्हीं के नेतृत्व में बिहार में पार्टी को जीत मिली। सरकार बनने के बाद ताकत इतनी हो गई कि सुपर सीएम कहे जाने लगे थे। 2010 में नीतीश से दूर होने तक पार्टी के बिहार के अध्यक्ष हुआ करते थे। पहली बार 2004 में बेगूसराय फिर 2009 में मुंगेर से सांसद बने। लेकिन अगले चुनाव में जीत के लिए उन्हें नीतीश के पास आने के अलावा कोई और चारा नहीं था। वो खुद मान रहे हैं कि कांग्रेस की हालत देश भर में खराब है। ऐसे में राजनीतिक हालत को भांपकर उन्होंने नीतीश से हाथ मिलाने में ही भलाई समझी। (ललन सिंह ने चारा घोटाले में लालू के खिलाफ केस किया था)
                   नीतीश खुद राजनीति के चणक्य कहे जाते हैं । लेकिन राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को नीतीश का चाणक्य कहा जाता है। 1986 से ही ललन सिंह और नीतीश कुमार की दोस्ती है। इस दौरान नीतीश कई बार सांसद रहे, केंद्र में मंत्री रहे, दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन नीतीश से खटपट नहीं हुई । नीतीश पटना में ललन सिंह के घर पर ही रहा करते थे।  2009 में जब राबड़ी देवी ने प्रचार के दौरान नीतीश-ललन पर विवादास्पद टिप्पणी की थी तब भी दोनों ने मजबूती से एक दूसरे का साथ देकर राबड़ी पर हल्ला बोला था। 
राबड़ी देवी
लेकिन 2009 में लोकसभा चुनाव के बाद जब नीतीश ने अपने पुराने राजनीतिक करीबी उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में वापस लिया तो ललन नाराज हो गये। 2005 से लकेर 2009 तक बिहार में नीतीश कहने के लिए मुख्यमंत्री थे लेकिन बिना ललन सिंह की सलाह के कुछ नहीं होता था। न तो किसी ट्रांसफर और ना ही किसी की पोस्टिंग। लेकिन ललन के अध्यक्ष रहते उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश बिना उनकी सहमति के ही जेडीयू में ले आए। ललन ने इसे तानाशाही फैसला और पार्टी में लोकतंत्र की कमी तक कहके अपना विरोध जताया था। हालांकि अब उपेंद्र कुशवाहा नीतीश का साथ छोड़ चुके हैं और बिहार में नीतीश के खिलाफ नई पार्टी बनाकर काम कर रहे हैं।                                         
उपेंद्र कुशवाहा
 कहा जा रहा है कि पिछले साल पटना में एक होटल के उद्घाटन के वक्त ललन और नीतीश की मुलाकात हुई थी। दोनों ने साथ में खाना भी खाया था। इसके बाद सुलह के संकेत मिलने लगे थे। हालांकि सुलह का रास्ता शर्तों के पूरा होने के बाद खुला। कहा जाता है कि पीके शाही जो कि नीतीश सरकार में मंत्री हैं उन्हें महाराजगंज से लोकसभा का टिकट देकर नीतीश ने ललन के कहने पर ही मुख्य धारा से साइड किया है। ललन सिंह के समर्थकों का कहना है कि पीके शाही ने नीतीश और ललन की दूरी को बढ़ाने में अहम रोल निभाने का काम किया था।
          ललन सिंह चुनाव मैनेज करने के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। सोनिया गांधी के दरबार तक ललन सिंह की पहुंच है। अब देखना होगा कि ललन और नीतीश का ये मिलन देश और खासकर बिहार की राजनीति में क्या गुल खिलाता है। ललन के नीतीश के करीब आने से कई बड़े नेताओं का पत्ता साफ होना तय है। देखिये कब क्या होता है और अब कौन पुराना नेता नीतीश खेमे में आता है...

Wednesday, April 17, 2013

नीतीश और बीजेपी की दोस्ती की कहानी


                    बिहार में नीतीश और बीजेपी का साथ 17 साल पुराना है। 1996 में जब लोकसभा का चुनाव हो रहा था चुनाव से ठीक पहले जॉर्ज और नीतीश ने बीजेपी से हाथ मिलाया था। जॉर्ज और नीतीश उस वक्त समता पार्टी में हुआ करते थे। तब शरद यादव इन लोगों के साथ नहीं थे। 1994 में जॉर्ज और नीतीश ने जनता दल का साथ छोड़कर समता पार्टी बनाई थी। 1996 के चुनाव में बीजेपी और जेडीयू ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 1996 के चुनाव में 54 सीटों में से बीजेपी को 18 और जेडीयू को 6 सीटें मिली थी। केंद्र में देवेगौड़ा के नेतृत्व में सरकार बनी। और फिर 1998 तक संयुक्त मोर्चे की सरकार रही। बीच में देवेगौड़ा के बाद गुजराल प्रधानमंत्री भी बने। इसी बीच 1997 में अध्यक्ष पद को लेकर विवाद में जनता दल टूट गया और लालू के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल बना।            
 1998 में फिर से बिहार में चुनाव हुआ। 54 में से 
समता पार्टी को 10 और बीजेपी को 20 सीटें मिली।

1999 के चुनाव से पहले जनता दल टूटा और फिर शरद यादव के नेतृत्व वाले जनता दल यू, समता पार्टी का आपस में विलय हो गया। पार्टी का नाम जनता दल यू हुआ और जॉर्ज अध्यक्ष ।  1999 के चुनाव में फिर से बीजेपी के साथ मिलकर जेडीयू ने चुनाव लड़ा।  1999 के चुनाव में एनडीए को बिहार में 54 में से 41 सीटों पर जीत मिली थी। तब झारखंड साथ था। अकेले बिहार की 40 में से 30 सीटों पर दोनों दलों को जीत मिली थी। जेडीयू को 18 और बीजेपी को 12 सीटें ।
                                 लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद अध्यक्ष पद को लेकर हुए विवाद में जनता दल यू और समता पार्टी को फिर से अलग कर दिया। समता पार्टी के 12 और जेडीयू के पास 6 सांसद बचे। हालांकि 2000 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी, जेडीयू, समता पार्टी और बिहार पीपुल्स पार्टी ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा। नतीजों के बाद नीतीश सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने। इसी साल झारखंड बिहार से अलग हुआ और जेडीयू-बीजेपी के बीच पहला विवाद हुआ बिहार में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी को लेकर। तब तक सुशील मोदी बिहार में विपक्ष के नेता थे लेकिन झारखंड बंटने के बाद जब बीजेपी की सीटें घटी और फिर नंबर के हिसाब से समता पार्टी बड़ी पार्टी हो गई। और उपेंद्र कुशवाहा विपक्ष के नेता बने।
लेकिन इस चुनाव के बाद जनता दल यू में अध्यक्ष पद को लेकर विवाद हुआ और पासवान ने 2000 में 4 सांसदों के साथ अपनी नई पार्टी बना ली । (पासवान रामकृष्ण हेगड़े को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थे, बिहार चुनाव में नीतीश को सीएम प्रोजेक्ट करने से भी नाराज थे ) नई पार्टी का नाम रखा लोक जनशक्ति पार्टी। नई पार्टी के साथ करीब 1 साल तक पासवान वाजपेयी सरकार में संचार से कोयला मंत्री तक रहे। 27 अप्रैल 2002 को रामविलास पासवान ने वाजपेयी सरकार से इस्तीफा दे दिया। पासवान ने इस्तीफे का आधार गुजरात दंगे को बनाया लेकिन हकीकत ये है कि पासवान इस बात से नाराज थे कि बीजेपी यूपी में मायावती से हाथ मिलाने जा रही थी और पासवान का मंत्रालय भी बदल दिया गया था । दलित राजनीति में हाशिये पर जाने का डर की वजह से पासवान ने वाजपेयी सरकार का साथ छोड़ दिया।  लेकिन जनता में ये मैसेज गया कि गुजरात दंगों की वजह से उन्होंने सरकार का साथ छोड़ा है। हालांकि 2002 में गुजरात दंगों के वक्त वाजपेयी सरकार में नीतीश रेल मंत्री बने रहे
अक्टूबर 2003 में फिर से जनता दल यू और समता पार्टी का विलय हो गया। पार्टी का नाम जनता दल यू रहा। जॉर्ज अध्यक्ष, शरद यादव संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बने। 2004 में जेडीयू और बीजेपी ने मिलकर चुनाव लड़ा। बीजेपी को बिहार में 6 और जेडीयू को 5 सीटें मिली।
(2004 में जेडीयू को 1 सीट लक्षद्वीप, 1 यूपी में आंवला भी मिली थी)
नीतीश दो सीटों से लड़ रहे थे जिसमें से बाढ़ की सीट से वो हार गए। जॉर्ज ने मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ा और वो जीते। इस चुनाव में एनडीए ने वाजपेयी को पीएम प्रोजेक्ट किया था।
          इसके बाद 2005 के फऱवरी में जो विधानसभा चुनाव हुआ उसमें किसी दल को बहुमत नहीं मिला। जेडीयू को 55, बीजेपी को 38, आरजेडी को 75, एलजेपी को 29 सीटें मिलीं। लेकिन रामविलास पासवान ने मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने का कार्ड खेला जो कामयाब नहीं हुआ और फिर बिहार एक साल में दूसरी बार चुनाव में गया। इसके बाद 2005 के नवंबर में फिर बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ। नीतीश सीएम प्रोजेक्ट हुए। 
                        बीजेपी और जेडीयू को मिलाकर 143 सीटें मिलीं। 88 जेडीयू और 55 बीजेपी। इस चुनाव में पासवान को सिर्फ 10 सीटें ही मिली। बहुमत के साथ नीतीश मुख्यमंत्री बने और सुशील मोदी उप मुख्यमंत्री।

लेकिन इसी चुनाव के बाद शुरू हुआ नीतीश का जनाधार बढ़ाने का खेल। नीतीश ने अल्पसंख्यक वोटरों में अपनी पैठ बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत शुरू की। मुस्लिमों को अगड़े-पिछड़े में बांट दिया। पसमांदा समाज (पिछड़ा मुसलमान) से अली अनवर को नेता बनाया। लालू को इस बात का डर सताने लगा कि कहीं मुस्लिम वोट उनसे अलग न हो जाए।
             2006 में पार्टी अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर हुए विवाद में जॉर्ज फर्नांडिस को नीतीश ने हाशिये पर डाल दिया। जॉर्ज को नीतीश के सहयोग से शरद यादव ने हरा दिया। अब जॉर्ज अपनी बनाई पार्टी के लिए बेगाने हो गये ।
                     
गुजरात दंगे का पोस्टप
  इसके बाद 2009 के चुनाव से ठीक पहले नीतीश के खिलाफ मुस्लिम वोट भड़काने के लिए लालू के कार्यकर्ताओं ने बिहार में जगह जगह गुजरात दंगों के भड़काऊ पोस्टर लगाए। लोकसभा चुनाव में गुजरात दंगा अगर मुद्दा बनता तो नीतीश को परेशानी होती। लिहाजा नीतीश ने मुस्लिम सहानुभूति के लिए मोदी के खिलाफ बयानबाजी शुरू की। अपनी ओर से संदेश देने की कोशिश की वो मोदी के साथ खड़े नहीं हैं। लेकिन 2009 में बिहार में वोटिंग खत्म होने के बाद लुधियाना में हुई एनडीए की रैली में मंच पर नीतीश और मोदी ने हाथ मिलाए। कहते हैं कि नीतीश की इच्छा नहीं थी लेकिन मोदी ने मजबूर कर दिया।
 (इस चुनाव में जॉर्ज को टिकट नहीं दिया, ज़ॉर्ज मुजफ्फरपुर से निर्दलीय लड़कर हार गए)
2009 में बिहार की 40 में से नीतीश की पार्टी को 20 और बीजेपी को 12 सीटें मिली। नीतीश की पार्टी 25 और बीजेपी 15 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इस चुनाव में जेडीयू को 24.04 और बीजेपी को 13.93 फीसदी वोट मिले थे। यानी कुल वोटों का 37.97 फीसदी वोट। जबकि आरजेडी को 19.30 और कांग्रेस को 10.26 फीसदी वोट मिले।
                                         केंद्र में सरकार यूपीए की बनी। और उधर एनडीए में नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की दूरी बढ़ती गई।
     
लुधियाना रैली- 2009
 इसके बाद 2010 में बिहार में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बड़ा विवाद हुआ। 12-13 जून 2010 को बीजेपी की पटना में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी। नीतीश के घर रात को भोज का निमंत्रण था अगले दिन बीजेपी की साझा रैली को नीतीश संबोधित करने वाले थे। लेकिन 12 जून की सुबह बिहार के अखबारों में नीतीश और मोदी के हाथ मिलाने वाले बड़े बड़े पोस्टर छप गये। नाराज नीतीश ने न सिर्फ रात्रि भोज रद्द किया बल्कि रैली में शामिल होने का कार्यक्रम भी। जिस पीआर कंपनी ने पोस्टर छपवाये थे उसके यहां छापे मारे गए कानून कार्रवाई की बात तक कही गई। इस विवाद ने मोदी और नीतीश के रिश्तों में चल रही खटास की खाई चौड़ी कर दी।
   चुनाव प्रचार में नीतीश ने बिहार में मोदी को नहीं आने दिया। कोसी बाढ पीड़ितों के लिए मोदी ने बिहार सरकार को 5 करोड़ का चेक भेजा था उसे नीतीश ने वापस कर दिया। नीतीश का ये पैतरा काम आया और बिहार के चुनाव में पार्टी को बहुत बड़ी जीत मिली। कुल 243 में से 140 पर लड़कर 115 पर जेडीयू और 103 में से 91 पर बीजेपी को जीत मिली।
         इस चुनाव में एनडीए को 39.1 फीसदी वोट मिले। जो 2005 की तुलना में 2.9 फीसदी ज्यादा थे। आरजेडी-एलजेपी को 25.6 वोट मिले जो 2005 की तुलना में 13.5 फीसदी कम था।
मतलब संदेश साफ हो गया था बिहार में मोदी की जरूरत नहीं है। इस जीत ने नीतीश को ताकत दी और उनकी पार्टी के नेता पीएम की दावेदारी पर मोदी के दावे को खारिज करने में जुट गए। पिछले साल इकनॉमिक टाइम्स को दिये इंटरव्यू में नीतीश ने चुनाव से पहले पीएम पद का नाम घोषित करने की मांग की। उनकी पार्टी के नेता भी चुनाव से पहले जल्द नाम घोषित करने का दबाव बनाते रहे। लेकिन 13-14 अप्रैल 2013 को दिल्ली में हुई पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में जेडीयू ने बीजेपी को दिसंबर तक की मोहलत तो दी लेकिन अपने भाषण में नीतीश ने मोदी पर जबरदस्त हमला किया। नतीजा हुआ कि रिश्ते सुधरने की जगह और बिगड़ते गये। 

Friday, April 12, 2013

..तो सवर्णों का वोट नहीं मिलेगा?


2009 के चुनाव में नीतीश और बीजेपी को मिलाकर करीब 38 फीसदी वोट मिले थे और 40 में से 32 सीटों पर दोनों को जीत मिली थी। इस चुनाव में लालू और पासवान तो साथ थे लेकिन 10 फीसदी वोट काटने वाली कांग्रेस अलग होकर चुनाव लड़ रही थी। 2004 के चुनाव के नतीजे इससे अलग थे। तब बीजेपी और जेडीयू को मिलाकर 11 सीटों पर जीत मिली थी और लालू-पासवान-कांग्रेस की झोली में 29 सीटें गई थी।
अब 2014 में क्या होगा ये तो कोई नहीं जानता। लेकिन जिस तरीके से नीतीश बीजेपी पर दबाव बना रहे हैं उससे बिहार में नुकसान बीजेपी-जेडीयू को ज्यादा होगा या फिर लालू गठबंधन को ज्यादा फायदा। इस पर जानकारों की अभी अलग- अलग राय हो सकती है।
बिहार की राजनीति को समझने वाले इस बात को जानते हैं कि 15-16 फीसदी जो सवर्णों का वोट है उसपर ज्यादा पकड़ बीजेपी की है। विधानसभा के चुनाव में सवर्णों का थोक वोट नीतीश को मिलता रहा है। 11 फीसदी कुर्मी-कोयरी के अलावा पिछड़े मुलसमान और दलितों का एक तबका विधानसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी का शुद्ध वोटर है। वैश्य वोटबैंक बिहार में बंटा हुआ है। वो इसलिए क्योंकि बिहार में बैकवार्ड-फॉरवार्ड का विवाद सालों से चल रहा है। और वैश्यों का शहरी तबका जहां बीजेपी का वोटर है वहीं गांवों में वैश्य वोटरों का बड़ा तबका आरजेडी को परंपरागत तरीके से वोट करता है।  
लेकिन सवाल इस बार विधानसभा चुनाव का नहीं। सवाल लोकसभा चुनाव का है। बात नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने की नहीं है। चुनाव दिल्ली में पीएम किसको बनाना है इसको लेकर है। अगर बिहार में जेडीयू-बीजेपी का गठबंधन टूटता है तो फिर नीतीश फायदे में रहेंगे, इस तरह की भविष्यवाणी कोई जानकार शायद नहीं कर सकता। लेकिन एक बात ये भी है कि बीजेपी को नुकसान ही होगा ये भी नहीं कहा जा सकता। बिहार में नरेंद्र मोदी को लेकर लोगों में खास क्रेज है। यही वजह है कि बिहार के गांवों में नरेंद्र मोदी के नाम को लेकर चर्चा हो रही है।
नीतीश को चिंता पिछड़े मुस्लिम वोटरों की है जो विधानसभा चुनाव में नीतीश का साथ देते रहे हैं। नीतीश को डर है कि मोदी के नाम पर पिछड़ा मुस्लिम वोट छिटक सकता है। लेकिन डर इस बात का भी है कि अगर बाजेपी का साथ छूटता है तो फिर सवर्ण और वैश्य वोट भी थोक के भाव में बीजेपी को मिल जाएगा। इस हालत में पिछड़ों और दलितों का थोक वोट लालू और पासवान की झोली में भी जा सकता है।
नीतीश के रणनीतिकार इसी से डर रहे हैं। और अभी से ही पीएम को लेकर पत्ते खोलने का दबाव बीजेपी पर बना रहे हैं। ताकि अगर मोदी के नाम पर बीजेपी नहीं मानती तो फिर क्षेत्र में एक साल का समय अपनी जमीन बनाने के लिए मिल जाए। लेकिन बीजेपी की रणनीति नीतीश को उलझा कर रखने की है।
बिहार में अगर नीतीश और बीजेपी अलग होकर चुनाव लड़ते हैं और लालू-पासवान के साथ कांग्रेस भी चुनाव लड़ती है। तो लड़ाई बड़ी दिलचस्प हो सकती है। बिहार में बैकवार्ड क्लास में बड़ा तबका इस बात से नाराज है कि नीतीश के राज में सवर्णों (कुछ खास लोगों) को ज्यादा तरजीह दी जा रही है। यादव वोटर इस बात से नाराज है कि उनका सबसे बड़ा नेता लालू 5 साल से दिल्ली और 10 साल से बिहार की सत्ता से दूर है। पासवान की हार को दलित वोटरों का एक बड़ा खेमा अब तक पचा नहीं पाया है क्योंकि पासवान के कद का कोई बड़ा नेता बिहार में है नहीं। और नीतीश दलित-महादलित के विवाद से बाहर निकले नहीं है। 
भूमिहार, ब्राह्ण और कायस्थ के थोक वोट बीजेपी के खाते में जाएंगे इसको लेकर जानकारों में एकमत है। राजपूत वोट को लेकर कहीं-कहीं दुविधा की स्थिति हो सकती है। क्योंकि राजपूत का थोक वोट तो बीजेपी को मिल सकता है लेकिन लालू की पार्टी को भी राजपूत वोट करते रहे हैं। लेकिन नीतीश के पास वैसा कोई चेहरा नहीं है जिससे वो इस वोट को लुभा सके। ऐसे में नीतीश को सवर्णों के बहुमत से हाथ धोना पड़ सकता है। फिर बचे कुर्मी-कोइरी वोटर। इनके 11 फीसदी वोट में ज्यादा वोट नीतीश को मिलेंगे। लेकिन मुसलमान का वोट सिर्फ इसलिए नीतीश को मिल जाएगा कि बीजेपी से अलग हो रहे हैं ये कहना गलत होगा। क्योंकि मुसलमानों का वोट कुछ हद तक लालू और कांग्रेस को भी मिलेगा ही।
नीतीश के लिए परेशानी इसी बात की है। बिहार की राजनीति के लिए नीतीश चाहे कितने भी बड़े नेता हो जाए लेकिन बीजेपी की बैसाखी उनके लिए जरूरी है। नीतीश का उदय ही बीजेपी के साथ हुआ है। 1995 में नीतीश कुर्मी-कोइरी के नाम पर वोट मांगने बिहार में उतरे थे तो 325 में 7 सीटों पर जीत मिली थी। इसके बाद 1996 से बीजेपी और उनका तालमेल हुआ। बीच में पासवान साथ जुड़े गए...आनंद मोहन आए गए...लेकिन बीजेपी और नीतीश का संबंध बना रहा। सिर्फ मुसलमान वोट के लिए नीतीश इतना बड़ा जुआ खेल लेंगे। ये कहा नहीं जा सकता।
एक बात और क्या बिहार को स्पेशल स्टेट की बात कह कहके नीतीश सवर्ण वोटरों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे है? कोई बड़ी बात नहीं है। क्योंकि मोदी को बैलेंस करने के लिए नीतीश स्पेशल स्टेट की बात कहके हवा बनाने में लग जाते हैं। कांग्रेस भी लॉलीपॉप दिखाने लगती है। कुछ खास अखबारों में खबरें छपने होने लगती है। ऐसा नहीं है कि बिहार में जो कुछ हो रहा है उसपर बिहार के अंदर या बाहर के लोगों की नजर नहीं है।
वैसे भी लोगों को पता है कि बिहार के वोट से नीतीश को पीएम तो बनना नहीं है। और चुनाव सीएम का है। लिहाजा नया सियासी समीकरण दिल्ली की सियासत को लेकर नीतीश पर भारी पड़ जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

Friday, August 3, 2012

आसान नहीं अन्ना पार्टी

भारतीय अन्ना पार्टी, अन्ना स्वराज पार्टी...अन्ना क्रांति पार्टी.... नाम चाहे जो हो सवाल ये है कि अन्ना की पार्टी अगर चुनाव मैदान में उम्मीदवार उतारती है तो फिर फायदा किसको होगा...कांग्रेस को या फिर बीजेपी गठबंधन को। अन्ना के आंदोलन के साथ देश का जो वर्ग जुड़ा हुआ है या फिर जुड़ा रहा है वो कहीं ने कहीं कांग्रेस विरोधी तबका है। लोकपाल की मांग को लेकर बाकी पार्टियों खासकर विपक्षी पार्टियों के दोहरे रवैये ने लोगों को जब निराश किया तब अन्ना की ताकत बढ़ी और अब जब चुनावी राजनीति की बात हो रही है तो कहीं न कहीं इसका सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं को होगा। मतलब शुरुआती संकेतों को अगर आसानी से समझा जाए तो कांग्रेस विरोधी वोटों का बंटवारा होना तय लगता है। मतलब सीधे सीधे नुकसान बीजेपी और उसके गठबंधन में शामिल पार्टियों का। शायद यही वजह से है कि अन्ना के पार्टी बनाने के फैसले को लेकर कांग्रेसी सांसद, मंत्री कल से ही कुछ ज्यादा ही खुश दिख रहे हैं। और बीजेपी के नेता लोकतंत्र और सबको अधिकार है टाइप बातें करके दर्द छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।


अब ये तो सच है कि अन्ना का असर जितना शहरी मध्यम वर्ग के वोटरों पर होगा उतना गांव देहात में नहीं । सवाल ये भी है कि जंतर मंतर और रामलीला मैदान में जुटने वाली भीड़ ही सिर्फ वोट नहीं है। हां चुनावी मैदान में उतरने से दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में शहरी वोटरों पर गांव और छोटे शहरों के वोटरों की तुलना में ज्यादा असर हो सकता है। हो सकता है टीम अन्ना के सदस्य भी शुरुआती दिनों में इन्हीं टाइप शहरों पर ज्यादा फोकस करें। अन्ना टीम के सदस्य भी ज्यादातर (जो बड़े चेहरे या नाम हैं) बड़े शहरों से ही ताल्लुक रखते हैं। जानकारों का मानना है कि इन लोगों का अपने अपने क्षेत्र में उतना कोई प्रभाव नहीं है। मतलब शहरी वोटरों को अगर आधार मानकर टीम अन्ना की राजनीति होती है तो पहली नजर में नुकसान बीजेपी का ही दिखता है।

अन्ना और उनकी टीम का नाम देश भर में हो चुका है। लिहाजा पार्टी को पहचान देने में परेशानी नहीं होगी । खुद अन्ना का नाम भी बहुत बड़ा है। लेकिन सवाल ये है कि अन्ना का नाम जितना बड़ा है आज की तारीख में दायरा उनका उतना बड़ा नहीं है। मतलब ये कि अगर देश में अगला चुनाव लड़ने की बात होगी तो फिर उम्मीदवार कहां से लाएंगे । कोई भी पार्टी चुनाव मैदान में उतरती है तो मकसद जीतने का होता है। इसके लिए राजनीतिक पार्टियां हर तरह के दांव आजमाती है। जातिगत समीकरण से लेकर आर्थिक और राजनीतिक पारिवारिक पहचान तक मायने रखते हैं। जिन राज्यों में आज भी जातिगत राजनीति होती है, जातिगत समीकरणों के हिसाब से टिकट बांटे जाते हैं, चुनाव लड़े और जीते जाते हैं। वहां अन्ना का राजनीतिक गणित क्या कहता है? क्या अन्ना और उनकी पार्टी के लोग जातिगत राजनीति की परिभाषा बदल देंगे ? अगर बदल देंगे तो फिर उम्मीदवारों का चुनाव किस आधार पर होगा ? क्या सिर्फ भ्रष्ट नहीं होना ही अच्छे उम्मीदवार की योग्यता होगी....अगर हां तो फिर राजनीति की राह इतनी आसान नहीं रहने वाली...और अगर इसका जवाब ना है तो फिर अन्ना की पार्टी और बाकी जो पार्टियां अभी देश में मौजूद हैं उसमें फर्क क्या रह जाएगा?

सवा सौ करोड़ के हिन्दुस्तान में अन्ना को चुनावी राजनीति करने के लिए संगठन खड़ा करना होगा। सामाजिक संगठन और राजनीतिक संगठन चलाने में फर्क होता है। सवाल ये है कि दिल्ली में बैठकर दस बीस लोग जो टीम अन्ना चलाते हैं क्या वो हर जगह के राजनीतिक समीकरणों से वाकिफ हैं.. अगर नहीं तो उनको वाकिफ कौन कराएगा...? क्या इसमें दागी लोगों का उनके साथ जुड़ने की कोई संभावना नहीं है...अगर दागी लोग जुड़ ही जाएंगे...संगठन में, उम्मीदवारी में, टिकट लेने और देने में.. तो फर्क क्या रहने वाला बाकी दलों में और अन्ना की पार्टी में।

राजनिति के अखाड़े में उतरना, विकल्प की बात करना अच्छी बात है। लेकिन इसमें सावधानी की बहुत ज्यादा जरूरत है। राजनीति करने के लिए हर तरह की नीति अपनाई जाती है...सत्य और अहिंसा आज की तारीख में राजनीति के क्षेत्र में मायने नहीं रखते। और ये तो हिन्दुस्तान की पब्लिक है कब सिर पर चढ़ाए और कब उतार दे कह नहीं सकते।

अगर आप लोगों को याद हो तो 1994 के वैशाली लोकसभा उपचुनाव को याद करिए। आनंद मोहन ने तब नई पार्टी बनाई थी। उस वक्त आनंद मोहन की छवि एकदम रॉबिन हुड टाइप थी। लोकसभा के उपचुनाव में ऐसा समीकरण बना की लवली चुनाव जीत गईं। पूरे बिहार में (तब झारखंड भी साथ थे) आनंद मोहन की लहर सी फैल गई थी। ऐसा लगने लगा कि अब बिहार में लालू राज का खात्मा हो जाएगा। परिवर्तन आने वाला है। आनंद मोहन भी उम्मीदों के झाड़ पर चढ़े थे। 1995 के विधानसभा चुनाव में सभी 324 सीटों पर बिहार पीपुल्स पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतार दिये। खुद आनंद मोहन तीन जगहों से खड़े थे। उनकी सभाओं में भारी भीड़ जुटती थी। लेकिन जब नतीजे आए तो आनंद मोहन तो अपनी तीनों सीट हारे ही बिहार में पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली। वो भी उम्मीदवार को अपने दम पर। बाद में बिहार पीपुल्स पार्टी का जो हाल हुआ उससे सब वाकिफ हैं। इसी 1995 के विधानसभा चुनाव से पहले जॉर्ज-नीतीश ने मिलकर समता पार्टी बनाई थी। 1995 में समता पार्टी भी 324 सीटों पर चुनाव लड़ी थी लेकिन जीत सात सीटों पर मिली। 2000 के चुनाव में आंकड़ा 35 हुआ और फिर दो हजार पांच में तो सरकार ही बन गई।

ये कहानी अन्ना पार्टी के संदर्भ में बता रहा था कि कुछ पाने के लिए सब्र करना होता है। और स्थापित होने के लिए हर वो दांव आजमान होता है जिसकी जरूरत उम्मीदवार महसूस करता है। अन्ना की टीम को छोड़ दीजिए बाकी जो कोई भी उम्मीदवार मैदान में उतरेगा वो तो चुनाव जीतने या फिर खुद को स्थापित करने की नीयत से उतरेगा। ऐसे में वो हर कला लगाएगा । लिहाजा ये कहना कि गंदगी को साफ करने के लिए गंदगी में उतरना पड़ता है ठीक है लेकिन सफाई के दौरान गंदा भी होना पड़ता है। ये भी सच है। काजल की कोठरी से शायद ही कोई-कोई बेदाग निकलता है। लोकतंत्र है चुनाव लड़ना चाहिए। हर किसी को अधिकार है। देखना होगा कि अन्ना की पार्टी बनती है तो कैसे कैसे लोग उनके हिस्से में आते हैं।

Saturday, February 4, 2012

जन्मदिन का दिन


शाम के 4 बजने वाले हैं...
अमूमन रोज इस वक्त भूख नहीं लगती लेकिन नाइट शिफ्ट होने की वजह से पता नहीं चल रहा कि कब भूख लग रही है और कब खाना है। वैसे कल छुट्टी थी आज रात को जाना है। भूख लगी है तो मैगी के अलावा इस समय घर में कुछ और खाने के लिए नहीं है। क्योंकि खाना जो माननीय राजेश जी (खाना बनाने वाला) ने बनाया था उसे दवाई के साथ सुबह करीब 11.30-12 बजे खा लिया। दवाई का जिक्र इसलिए क्योंकि तबीयत चार पांच दिनों से नासाज है। सर्दी, जुकाम की परेशानी है। आज ये जिक्र अभी इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आज मेरा जन्मदिन था। अब था इसलिए क्योंकि अब है कहने का मतलब होगा समय खराब करना ।
कल मेरे साथ ही सबकी छुट्टी थी जिनकी नहीं थी उनको समय से बुला लिया गया था । तो इस हिसाब से कल शाम से लेकर कल रात तक सारा कार्यक्रम संपन्न हो गया। रात को सब अपने अपने घर चले गए। सुबह हो गई...नहाया धोया...पूजा पाठ करके निश्चिंत हो गया। पार्टनर दफ्तर चला गया। घर में अकेला मैं बच गया। जो अब तक अकेला हूं। 

सोने के लिए बिस्तर पर गया था लेकिन नींद नहीं आई। चिदंबरम वाली खबर भी इसी बीच आ गई थी लेकिन कुछ हुआ नहीं सो वहां भी कोई इंट्रेस्ट रह नहीं गया था। आज हमारे दफ्तर में मिलन समारोह चल रहा है । सो रश्मि का फोन आया..पूछा क्या कर रहे हैं.. मैंने बताया रात को ऑफिस जाना है उसकी तैयारी कर रहा हूं मतलब सोने जा रहा हूं... बातचीत होते होते फोन कट गया । तभी निप्पू का मैसेज आया... भइया.. अभी सो के उठा.. फिर से बधाई हो टाइप। मैंने उसे जवाब भेजा। जवाब में उसने लवयू लिखकर वापस भेजा। सो नहीं पाया सो फिर से कंप्यूटर पर आ गया। अब इस बीच यश का भी मैसेज आया है। ओह...!!!! मैं यहां दिनचर्या सुनाने नहीं बैठा था.. लगता है रास्ता भटक गया...
दरअसल सुना तो रहा था दिनचर्या ही लेकिन तरीका दूसरा सोचा था। पिछले साल आज के दिन दफ्तर में था। वर्ल्ड कप का मैच चल रहा था उस दौरान। बीस ग्राम मिला था सचिन के चार यार रिपीट को लेकर। सुबह 9.30 बजे बिना टीज किए ब्रेक पर गये थे इस वजह से। वैसे ब्रेक के बाद तीन देवियां चलना था। फिर भी मैसेज गिरता रहा। कहने का मतलब पिछले साल दफ्तर में था, दिन कट गया....उसके पिछले साल भी दफ्तर में था..उसके पिछले साल नाइट शिफ्ट थी लेकिन छुट्टी नहीं थी... सो के बीत गया.. लेकिन इस साल ऐसा नहीं हो पाया। आलू-सेम मिलाकर जो भुजिया बना था उसी से सुबह का काम चला... अब मैगी देखने जा रहा हूं और रात को न जाने कहीं सोता रहा तो फिर उसको जो समझ में आएगा सो बनाएगा।
कुल मिलाकर इस प्रकार से इस साल का जन्मदिन भी बीत गया। अब साल भर के लिए छुट्टी । वैसे जन्मदिन..टाइप चीज जो है चार-पांच करीबी टाइप लोगों को छोड़ दीजिए तो किसी को याद तो रहता नहीं है। हां फेसबुक टाइप आइटम के आने से लोगों को जानकारी मिल जाती है।
लीजिए-लिखते लिखते अनुराग का फोन आया...बधाई दी... और जैसे ही उसे मैंने बताया कि रात को जाना है तो सॉरी...बोलने लगा..फिर थैंक्यू भी हो गया। अनुराग को क्या पता था कि अभी मैगी बनाने जाना है। चलिए। देखता हूं मैगी बनाने के फिर खाना भी है.... सोना भी है। मिलन समारोह में जाना इसलिए संभव नहीं हो पाया कि तबीयत ठीक नहीं है। मौसम ठंडा है... लेकिन रात को क्या करेंगे...शिफ्ट करने तो जाना पड़ेगा। देखते हैं.... चलिए साल भर के लिए छुट्टी....सेम और आलू अब अगले साल !!!!!