Friday, August 3, 2012

आसान नहीं अन्ना पार्टी

भारतीय अन्ना पार्टी, अन्ना स्वराज पार्टी...अन्ना क्रांति पार्टी.... नाम चाहे जो हो सवाल ये है कि अन्ना की पार्टी अगर चुनाव मैदान में उम्मीदवार उतारती है तो फिर फायदा किसको होगा...कांग्रेस को या फिर बीजेपी गठबंधन को। अन्ना के आंदोलन के साथ देश का जो वर्ग जुड़ा हुआ है या फिर जुड़ा रहा है वो कहीं ने कहीं कांग्रेस विरोधी तबका है। लोकपाल की मांग को लेकर बाकी पार्टियों खासकर विपक्षी पार्टियों के दोहरे रवैये ने लोगों को जब निराश किया तब अन्ना की ताकत बढ़ी और अब जब चुनावी राजनीति की बात हो रही है तो कहीं न कहीं इसका सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं को होगा। मतलब शुरुआती संकेतों को अगर आसानी से समझा जाए तो कांग्रेस विरोधी वोटों का बंटवारा होना तय लगता है। मतलब सीधे सीधे नुकसान बीजेपी और उसके गठबंधन में शामिल पार्टियों का। शायद यही वजह से है कि अन्ना के पार्टी बनाने के फैसले को लेकर कांग्रेसी सांसद, मंत्री कल से ही कुछ ज्यादा ही खुश दिख रहे हैं। और बीजेपी के नेता लोकतंत्र और सबको अधिकार है टाइप बातें करके दर्द छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।


अब ये तो सच है कि अन्ना का असर जितना शहरी मध्यम वर्ग के वोटरों पर होगा उतना गांव देहात में नहीं । सवाल ये भी है कि जंतर मंतर और रामलीला मैदान में जुटने वाली भीड़ ही सिर्फ वोट नहीं है। हां चुनावी मैदान में उतरने से दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में शहरी वोटरों पर गांव और छोटे शहरों के वोटरों की तुलना में ज्यादा असर हो सकता है। हो सकता है टीम अन्ना के सदस्य भी शुरुआती दिनों में इन्हीं टाइप शहरों पर ज्यादा फोकस करें। अन्ना टीम के सदस्य भी ज्यादातर (जो बड़े चेहरे या नाम हैं) बड़े शहरों से ही ताल्लुक रखते हैं। जानकारों का मानना है कि इन लोगों का अपने अपने क्षेत्र में उतना कोई प्रभाव नहीं है। मतलब शहरी वोटरों को अगर आधार मानकर टीम अन्ना की राजनीति होती है तो पहली नजर में नुकसान बीजेपी का ही दिखता है।

अन्ना और उनकी टीम का नाम देश भर में हो चुका है। लिहाजा पार्टी को पहचान देने में परेशानी नहीं होगी । खुद अन्ना का नाम भी बहुत बड़ा है। लेकिन सवाल ये है कि अन्ना का नाम जितना बड़ा है आज की तारीख में दायरा उनका उतना बड़ा नहीं है। मतलब ये कि अगर देश में अगला चुनाव लड़ने की बात होगी तो फिर उम्मीदवार कहां से लाएंगे । कोई भी पार्टी चुनाव मैदान में उतरती है तो मकसद जीतने का होता है। इसके लिए राजनीतिक पार्टियां हर तरह के दांव आजमाती है। जातिगत समीकरण से लेकर आर्थिक और राजनीतिक पारिवारिक पहचान तक मायने रखते हैं। जिन राज्यों में आज भी जातिगत राजनीति होती है, जातिगत समीकरणों के हिसाब से टिकट बांटे जाते हैं, चुनाव लड़े और जीते जाते हैं। वहां अन्ना का राजनीतिक गणित क्या कहता है? क्या अन्ना और उनकी पार्टी के लोग जातिगत राजनीति की परिभाषा बदल देंगे ? अगर बदल देंगे तो फिर उम्मीदवारों का चुनाव किस आधार पर होगा ? क्या सिर्फ भ्रष्ट नहीं होना ही अच्छे उम्मीदवार की योग्यता होगी....अगर हां तो फिर राजनीति की राह इतनी आसान नहीं रहने वाली...और अगर इसका जवाब ना है तो फिर अन्ना की पार्टी और बाकी जो पार्टियां अभी देश में मौजूद हैं उसमें फर्क क्या रह जाएगा?

सवा सौ करोड़ के हिन्दुस्तान में अन्ना को चुनावी राजनीति करने के लिए संगठन खड़ा करना होगा। सामाजिक संगठन और राजनीतिक संगठन चलाने में फर्क होता है। सवाल ये है कि दिल्ली में बैठकर दस बीस लोग जो टीम अन्ना चलाते हैं क्या वो हर जगह के राजनीतिक समीकरणों से वाकिफ हैं.. अगर नहीं तो उनको वाकिफ कौन कराएगा...? क्या इसमें दागी लोगों का उनके साथ जुड़ने की कोई संभावना नहीं है...अगर दागी लोग जुड़ ही जाएंगे...संगठन में, उम्मीदवारी में, टिकट लेने और देने में.. तो फर्क क्या रहने वाला बाकी दलों में और अन्ना की पार्टी में।

राजनिति के अखाड़े में उतरना, विकल्प की बात करना अच्छी बात है। लेकिन इसमें सावधानी की बहुत ज्यादा जरूरत है। राजनीति करने के लिए हर तरह की नीति अपनाई जाती है...सत्य और अहिंसा आज की तारीख में राजनीति के क्षेत्र में मायने नहीं रखते। और ये तो हिन्दुस्तान की पब्लिक है कब सिर पर चढ़ाए और कब उतार दे कह नहीं सकते।

अगर आप लोगों को याद हो तो 1994 के वैशाली लोकसभा उपचुनाव को याद करिए। आनंद मोहन ने तब नई पार्टी बनाई थी। उस वक्त आनंद मोहन की छवि एकदम रॉबिन हुड टाइप थी। लोकसभा के उपचुनाव में ऐसा समीकरण बना की लवली चुनाव जीत गईं। पूरे बिहार में (तब झारखंड भी साथ थे) आनंद मोहन की लहर सी फैल गई थी। ऐसा लगने लगा कि अब बिहार में लालू राज का खात्मा हो जाएगा। परिवर्तन आने वाला है। आनंद मोहन भी उम्मीदों के झाड़ पर चढ़े थे। 1995 के विधानसभा चुनाव में सभी 324 सीटों पर बिहार पीपुल्स पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतार दिये। खुद आनंद मोहन तीन जगहों से खड़े थे। उनकी सभाओं में भारी भीड़ जुटती थी। लेकिन जब नतीजे आए तो आनंद मोहन तो अपनी तीनों सीट हारे ही बिहार में पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली। वो भी उम्मीदवार को अपने दम पर। बाद में बिहार पीपुल्स पार्टी का जो हाल हुआ उससे सब वाकिफ हैं। इसी 1995 के विधानसभा चुनाव से पहले जॉर्ज-नीतीश ने मिलकर समता पार्टी बनाई थी। 1995 में समता पार्टी भी 324 सीटों पर चुनाव लड़ी थी लेकिन जीत सात सीटों पर मिली। 2000 के चुनाव में आंकड़ा 35 हुआ और फिर दो हजार पांच में तो सरकार ही बन गई।

ये कहानी अन्ना पार्टी के संदर्भ में बता रहा था कि कुछ पाने के लिए सब्र करना होता है। और स्थापित होने के लिए हर वो दांव आजमान होता है जिसकी जरूरत उम्मीदवार महसूस करता है। अन्ना की टीम को छोड़ दीजिए बाकी जो कोई भी उम्मीदवार मैदान में उतरेगा वो तो चुनाव जीतने या फिर खुद को स्थापित करने की नीयत से उतरेगा। ऐसे में वो हर कला लगाएगा । लिहाजा ये कहना कि गंदगी को साफ करने के लिए गंदगी में उतरना पड़ता है ठीक है लेकिन सफाई के दौरान गंदा भी होना पड़ता है। ये भी सच है। काजल की कोठरी से शायद ही कोई-कोई बेदाग निकलता है। लोकतंत्र है चुनाव लड़ना चाहिए। हर किसी को अधिकार है। देखना होगा कि अन्ना की पार्टी बनती है तो कैसे कैसे लोग उनके हिस्से में आते हैं।

Saturday, February 4, 2012

जन्मदिन का दिन


शाम के 4 बजने वाले हैं...
अमूमन रोज इस वक्त भूख नहीं लगती लेकिन नाइट शिफ्ट होने की वजह से पता नहीं चल रहा कि कब भूख लग रही है और कब खाना है। वैसे कल छुट्टी थी आज रात को जाना है। भूख लगी है तो मैगी के अलावा इस समय घर में कुछ और खाने के लिए नहीं है। क्योंकि खाना जो माननीय राजेश जी (खाना बनाने वाला) ने बनाया था उसे दवाई के साथ सुबह करीब 11.30-12 बजे खा लिया। दवाई का जिक्र इसलिए क्योंकि तबीयत चार पांच दिनों से नासाज है। सर्दी, जुकाम की परेशानी है। आज ये जिक्र अभी इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आज मेरा जन्मदिन था। अब था इसलिए क्योंकि अब है कहने का मतलब होगा समय खराब करना ।
कल मेरे साथ ही सबकी छुट्टी थी जिनकी नहीं थी उनको समय से बुला लिया गया था । तो इस हिसाब से कल शाम से लेकर कल रात तक सारा कार्यक्रम संपन्न हो गया। रात को सब अपने अपने घर चले गए। सुबह हो गई...नहाया धोया...पूजा पाठ करके निश्चिंत हो गया। पार्टनर दफ्तर चला गया। घर में अकेला मैं बच गया। जो अब तक अकेला हूं। 

सोने के लिए बिस्तर पर गया था लेकिन नींद नहीं आई। चिदंबरम वाली खबर भी इसी बीच आ गई थी लेकिन कुछ हुआ नहीं सो वहां भी कोई इंट्रेस्ट रह नहीं गया था। आज हमारे दफ्तर में मिलन समारोह चल रहा है । सो रश्मि का फोन आया..पूछा क्या कर रहे हैं.. मैंने बताया रात को ऑफिस जाना है उसकी तैयारी कर रहा हूं मतलब सोने जा रहा हूं... बातचीत होते होते फोन कट गया । तभी निप्पू का मैसेज आया... भइया.. अभी सो के उठा.. फिर से बधाई हो टाइप। मैंने उसे जवाब भेजा। जवाब में उसने लवयू लिखकर वापस भेजा। सो नहीं पाया सो फिर से कंप्यूटर पर आ गया। अब इस बीच यश का भी मैसेज आया है। ओह...!!!! मैं यहां दिनचर्या सुनाने नहीं बैठा था.. लगता है रास्ता भटक गया...
दरअसल सुना तो रहा था दिनचर्या ही लेकिन तरीका दूसरा सोचा था। पिछले साल आज के दिन दफ्तर में था। वर्ल्ड कप का मैच चल रहा था उस दौरान। बीस ग्राम मिला था सचिन के चार यार रिपीट को लेकर। सुबह 9.30 बजे बिना टीज किए ब्रेक पर गये थे इस वजह से। वैसे ब्रेक के बाद तीन देवियां चलना था। फिर भी मैसेज गिरता रहा। कहने का मतलब पिछले साल दफ्तर में था, दिन कट गया....उसके पिछले साल भी दफ्तर में था..उसके पिछले साल नाइट शिफ्ट थी लेकिन छुट्टी नहीं थी... सो के बीत गया.. लेकिन इस साल ऐसा नहीं हो पाया। आलू-सेम मिलाकर जो भुजिया बना था उसी से सुबह का काम चला... अब मैगी देखने जा रहा हूं और रात को न जाने कहीं सोता रहा तो फिर उसको जो समझ में आएगा सो बनाएगा।
कुल मिलाकर इस प्रकार से इस साल का जन्मदिन भी बीत गया। अब साल भर के लिए छुट्टी । वैसे जन्मदिन..टाइप चीज जो है चार-पांच करीबी टाइप लोगों को छोड़ दीजिए तो किसी को याद तो रहता नहीं है। हां फेसबुक टाइप आइटम के आने से लोगों को जानकारी मिल जाती है।
लीजिए-लिखते लिखते अनुराग का फोन आया...बधाई दी... और जैसे ही उसे मैंने बताया कि रात को जाना है तो सॉरी...बोलने लगा..फिर थैंक्यू भी हो गया। अनुराग को क्या पता था कि अभी मैगी बनाने जाना है। चलिए। देखता हूं मैगी बनाने के फिर खाना भी है.... सोना भी है। मिलन समारोह में जाना इसलिए संभव नहीं हो पाया कि तबीयत ठीक नहीं है। मौसम ठंडा है... लेकिन रात को क्या करेंगे...शिफ्ट करने तो जाना पड़ेगा। देखते हैं.... चलिए साल भर के लिए छुट्टी....सेम और आलू अब अगले साल !!!!!

Friday, December 9, 2011

'फिलहाल' छुट्टी वाले दिन की हकीकत!


ये जो हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मिलती है उसके फायदे कम घाटा ज्यादा है। आपके लिए तो मैं बिल्कुल ही नहीं कह रहा ये सिर्फ मैं अपने बारे में कह रहा हूं। महीने में 4-5 साप्ताहिक छुट्टियां मिलती हैं। पहला हफ्ता वाला तो मान लीजिए कभी बैंक तो कभी बिजली बिल या दिस दैट करके बारह एक बजे तक का टाइम निकल जाता है। यहां के बाद अब शुरू होती है समय बीताने के रास्ते खोजने की परीक्षा। अभी फिलहाल तीन-चार दोस्त हैं जिनके साथ होने पर छुट्टी का मतलब छुट्टी हो पाता है। लेकिन ये भी कब महीने की पहली छुट्टी के दिन । वो भी दोपहर बाद। किसी तरह से खा-पीकर, कुछ खरीदारी करके, सिनेमा देखकर टाइम निकाल लिया। लेकिन फिर छे दिन बाद सब कुछ ठीक रहने पर छुट्टी का दिन आ धमकता है। अब क्या... न बिजली बिल बचा...न किराया का...राशन और सब्जी तो समझिए रोज टाइप आइटम है । उसका तो साप्ताहिक मामलों से कोई लेना देना ही नहीं । अब ऐसा भी नहीं कि छुट्टी का दिन है तो ज्यादा देर तक सोते रहिए। नींद तो अपने टाइम पर ही खुलेगी । दफ्तर के दिन हड़बड़ी में सब कुछ करके निकल जाना पड़ता है लेकिन छुट्टी है तो इत्मीनान से करते रहिए...टाइम भी धीरे धीरे बीतता है।
 अब आइए बुनियादी मुद्दे पर। चूंकी दिल्ली में दोस्त हो गए हैं कम। जो थे पुराने साथी-सहपाठी सबकी अपनी टाइमिंग है। सबकी अपनी गृहस्थी है। सो उधर से हाथ निकल गया। बचे अब तीन-चार करीबी वाले। अब छुट्टी असल में यही खलती है । अब चूंकि ज्यादा लोगों के साथ तो उठना-बैठना है नहीं.. जो लोग होते हैं साथ में उनकी भी अपनी दुनिया है। अपनी जान पहचान है तो उसमें दखल देना किसी सूरत में मुनासिब नहीं है। क्योंकि उसके पास भी वही महीने में 4-5 छुट्टी है। उसी में सबको अपनी अपनी प्लानिंग करनी होती है। किसी को शादी में जाना तो किसी को पुराने दोस्त के पास तो किसी को कहीं. किसी को कहीं...कहने का मतलब सीधा और साफ शब्दों में ये है कि आपकी दुनिया छोटी है इसलिए आपको दिक्कत होती है और होती रहेगी। फिलहाल...!!! बहुत कम लोग जानते हैं कि कई बार तो कमरे में अकेले बोर हो जाने पर मार्केट जाकर पान खाकर टाइम बीताना पड़ता है ताकि पान खाने के दौरान उसी में कुछ देर उलझा रहूं...और फिर उसके बाद उसके असर में कुछ देर। कई बार यूं ही गाड़ी लेकर निकल जाना पड़ता है ताकि शरीर में थोड़ा बहुत धूप वगैरह भी लग जाए और कुछ समय भी...वैसे टीवी पर साउथ इंडियन फिल्में देखना और किताब पढ़ना भी रूटीन में शामिल होता है लेकिन कुछ देर बाद इससे भी मन उचट जाता है। चार-पांच छुट्टियों में से एक-दो तो ऐसी भी होती है जब पुराने पंद्रह बीस अखबारों को पलट पलट कर कुछ खास लेख, खबरें खोजने और फिर उसको पढ़ने का भी सहारा लेना पड़ता है। लेकिन इसमें भी उतना समय नहीं लगता। जिस वक्त ये लिख रहा हूं उस वक्त मैं घर में गैस सिलेंडर वाले का इंतजार कर रहा हूं। पान खाने के लिए बाहर जाने का मन था लेकिन गैस सिलेंडर वाले को फोन किया तो बोला कि मैं आ रहा हूं। तो इसी दौरान इसे छाप रहा हूं।
एक दिन की छुट्टी होने की वजह से भी शायद ऐसा है अगर दफ्तर में दो दिन की छुट्टी होती.. तो कहीं घूमने-फिरने भी निकल जाया जाता तो उसमें भी मन लगता...हो सकता है दो दिन की छुट्रटी का कुछ ज्यादा ही घाटा होता। वैसे परिचित लोग तो छुट्टी लेकर घूम फिर भी आते हैं यहां कहां मौका मिलता है। छे साल के दौरान इसी साल दो दो दिन के लिए शिमला और नैनीताल जाने का मौका मिला। वो भी तब जब साल में एक बार सिर्फ घर जाने की छुट्टी ली। इस महीने तो पार्टनर भी घर गया है। उसका भी टाइम टेबल अपना है। दूसरे मूड का है सो उसका समय ज्यादातर तो निकल जाता है। कभी कभी उसको भी उलझन होती है। जब 2006-2007 के दौरान दो दिन की छुट्टी मिलती थी उस वक्त मेरे बड़े भाई भी नॉर्थ में रहते थे... उस दौरान हर छुट्टियों में वहीं चला जाया करता था। लेकिन अब वो बिहार में ही हैं सो नॉर्थ कनेक्शन भी कट गया । एक रायजी मित्र हैं तो वो बिहार में ही हैं । बालक भी परिवार वाला आदमी है। धीरे-धीरे लोग कम होते गए न...जैसे जैसे नए लोग जुड़ना शुरू होते हैं तो पुराने अपने आप कम होने लगते हैं...लेकिन यहां नया पुराना सब माइनस में ही है। अब आज का रूटीन पता ही नहीं है करना क्या है....गैस वाला अब भी नहीं आया । आता तो इसको रोकता...अब कल तो ठीक रहा...मैच भी था... सब थे भी...लेकिन कल तो छुट्टी नहीं थी न... छुट्टी तो आज है...चलिए देखिए....क्या कर सकते हैं....कोई बात नहीं !!!  थोड़ा यूपी चुनाव पर टाइम देना है। अब वही देखने जा रहा हूं। चलिए। आपको छुट्टी मिले तो फोन कीजिएगा। मैसेज कीजिएगा। हो सके तो बताकर मिलने भी आ सकते हैं। बुला भी सकते हैं। 

Thursday, September 29, 2011

यात्राओं के दौर में देश


एक बार फिर से देश में यात्राओं का दौर शुरू हो गया है। बाबा रामदेव स्वाभिमान यात्रा पर निकल चुके हैं। अगले महीने से आडवाणी अपने राजनीतिक जीवन की एक और यात्रा शुरू कर रहे हैं। उसके बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सेवा यात्रा शुरू करने वाले हैं। इन यात्राओं से फायदा लेने की होड़ में हर नेता लगा हुआ है। बाबा रामदेव का मुद्दा काला धन है तो आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा करने वाले हैं। नीतीश की यात्रा सुशासन का सच जानने के लिए हो रही है। सवाल ये है कि क्या इन यात्राओं से देश की जनता का भी कोई भला होने वाला है?
जो भी शख्स राजनीतिक रूप से थोड़ा भी जागरूक है उनको इन यात्राओं के फायदे और नुकसान की समझ है। लेकिन इसमें समझने वाली बात ये है कि आखिर कांग्रेस नेतृत्व के गठबंधन वाली सरकार को इसका कोई नुकसान भी होगा। लोकसभा चुनाव वैसे तो दो हजार चौदह में होने हैं। लेकिन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ देश में जो माहौल बना है उसने कहीं न कहीं मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की सूरत को बिगाड़ जरूर दिया है। कुछ लोग आज के हालात की तुलना चौहत्तर-पचहत्तर के हालात से कर रहे हैं। उस वक्त इंदिरा गांधी के नेतृत्व की सत्ता को जेपी के आंदोलन ने चुनौती दी थी। नतीजा दुनिया ने देखा था जब कांग्रेस का देश से सफाया हो गया था। सच्चाई के चश्मे से आज के हालात को देखे तो कमोबेश सूरत तो वैसी नहीं है लेकिन हालात उसी ओर के इशारे जरूर कर रहे हैं।
इन दिनों देश में अनायास ही जेपी चर्चा के विषय बन चुके हैं। जेपी की चर्चा हर ओर हो रही है। चाहे बाबा रामदेव के समर्थकों की पिटाई का मुद्दा हो या फिर अन्ना के आंदोलन का। किसी ने रामदेव पर लाठीचार्ज की तुलना जेपी मूवमेंट के वक्त के हालात से की है तो कोई अन्ना के आंदोलन में जेपी की तस्वीर देखता है। शायद इसी का फायदा उठाने के लिए आडवाणी भी जेपी जयंती के मौके पर रथयात्रा की शुरुआत कर रहे हैं। 11 अक्टूबर को जेपी की जयंती है और जेपी की जन्मस्थली बिहार के सिताब दियारा से आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा शुरू कर रहे हैं। कहीं न कहीं जेपी एक बार फिर से नेताओं के लिए प्रेरणा बन गये हैं। बीच के दिनों को याद करें तो जेपी के शिष्य कहे जाने वाले नेता जेपी के अरमानों को अपने हाथों से कुचल चुके हैं। लेकिन जेपी इन सबके बीच जीवंत हैं।
बिहार से यात्रा को लेकर आडवाणी की सोच चाहे जो कुछ भी हो लेकिन एक सच ये भी है कि आडवाणी ने उस बिहार को अपनी यात्रा के लिए चुना है जिस बिहार में कभी लालू ने उनकी रथयात्रा रोक दी थी। 1990 का वो साल था जब समस्तीपुर में आडवाणी की यात्रा को लालू ने ये कहकर रोक दिया था कि देश में इस यात्रा से माहौल बिगड़ रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि आडवाणी उस टीस को भूल नहीं पाए हैं। और उसी को पाटने के लिए बिहार के छपरा से यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं। जेपी छपरा से निकलकर बिहार के कुछ जिलों का सफर तय करने के बाद झारखंड और फिर यूपी में दाखिल होंगे। उस यूपी में जहां अगले साल चुनाव होने हैं। और यूपी की लड़ाई में दम दिखाने के लिए बीजेपी को पसीना बहाना ही पड़ेगा क्योंकि बीजेपी आज यूपी में प्रासंगिक नहीं है। आडवाणी इस चीज को समझते हैं और इसिलिए मौके की नजाकत का फायदा उठाने की फिराक में हैं। इस बीच एक नया विवाद उठा है कि नरेंद्र मोदी को मोदी की ये यात्रा पसंद नहीं है। कारण जो भी हो लेकिन पीएम पद की दावेदारी को लेकर बीजेपी में उठे विवाद को जानकार इसकी वजह मान रहे हैं। 11 अक्टूबर को शायद ये भी साफ हो जाए। संघ के सूत्रों ने संकेत दिये हैं कि आडवाणी उस दिन शायद पीएम पद की दावेदारी छोड़ने का एलान कर दें। यहां ये बताना जरूरी है कि आडवाणी पहले गुजरात के सोमनाथ से यात्रा शुरू करने वाले थे लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें बिहार से शुरू करने का फैसला करना पड़ा। अब ये कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के विरोध के चलते उन्हें बिहार जाना पड़ा है। वैसे एक बात और दिलचस्प है कि मोदी की काट के लिए आडवाणी ने उस बिहार की धरती से यात्रा शुरू करने का फैसला किया जहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी का सार्वजनिक मंचों पर साथ दिखने का विरोधी माना जाता है। 18 राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की यात्रा करने के बाद आडवाणी 20 नवंबर को दिल्ली पहुंचेंगे जहां एक रैली होगी। अब इस रैली में मोदी रहेंगे या नहीं ये नहीं मालूम। नीतीश रहेंगे या नहीं ये भी नहीं मालूम। इंतजार बीस नवंबर का करना होगा जब आडवाणी अपनी यात्रा खत्म करेंगे तो उस दिन दिल्ली के मंच की क्या तस्वीर होगी। क्या नीतीश और मोदी आडवाणी के इस समापन समारोह के साक्षी बनेंगे या फिर कोई एक आएगा और दूसरा दूर से ही ताली बजाएगा?
यात्रा पर इन दिनों यूपी में मायावती भी ही हैं जो नए जिले बनाने में जुटी हैं। समाजवादी पार्टी के युवराज अखिलेश यादव भी यूपी में क्रांति का अलख जगाते फिर रहे हैं। गुजरात में कांग्रेस के वाघेला भी चुनावी यात्रा पर मोदी के खिलाफ मोर्चा बनाकर निकल चुके हैं। कुल मिलाकर सच्चाई ये है कि सब कोई अपने फायदे की यात्रा में जुटा है।

Monday, August 22, 2011

अन्ना की 'शांतिपूर्ण क्रांति'



अन्ना एक आंदोलन
 हिन्दुस्तान में हवा का रुख इस वक्त रामलीला मैदान से शुरू होकर देश भर में फैल रहा है। इस वक्त मैं जब लिख रहा हूं मेरे पीछे जिन्दाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं। रोड पर छोटे छोटे बच्चों से लेकर बड़े तक सब हाथों में मोमबत्ती लिए भारत माता की जय के नारे बुलंद कर रहे हैं। देश भर की गलियों में पिछले पांच-छे दिनों से ये आवाज गूंज रही है। आज की इस पीढ़ी ने इतना बड़ा जनआंदोलन जो बिना किसी बवाल के सात दिनों से हिन्दुस्तान की सड़कों पर चल रहा है नहीं देखा। अतीत के पन्ने को पलटे तो इस पीढ़ी को याद है तो मंदिर आंदोलन और वीपी सिंह की लगाई आरक्षण की आग वाला हिंसक आंदोलन। बीते पच्चीस तीस सालों में कई तरह के आंदोलन भले ही देश में हुए लेकिन आज का ये आंदोलन कई मामलों में अलग है। पुराने आंदलोनों में मीडिया का ये हुजूम नहीं था। आज देश के कोने कोने की तस्वीरें इस कोने से लेकर उस कोने तक जा रही है। देश का एक बड़ा तबका जो देश की तकदीर और तस्वीर को बदलने में अहम भूमिका निभाता है वो आज सड़कों पर है। अपनी आगे की पीढ़ी को संस्कार और शिक्षा देने के लिए। जिन लोगों ने बदलते हिन्दुस्कान की तस्वीरें नहीं देखी वो एक बार रामलीला मैदान जरूर हो आएं। क्योंकि आंदोलन जब अतीत बन जाएगा तो खुद को गुनहगार मानने के अलावा कुछ न कर सकेंगे। आज के इस आंदोलन में हर वो रंग है हर वो तस्वीर है हर वो लोग है जिसे देखना सुनना और समझना चाहता है सवा सौ करोड़ का हिन्दुस्तान। मंच से जब अन्ना हजारे की आवाज नहीं सुनाई देती तो लगता है देश में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है। 74 साल का नौजवान तीस साल के नौजवानों के लिए प्रेरण बनकर सात दिनों से भूखा है। सात घंटे में इन लोगों को पसीना आ जाए। आखिर रामलीला मैदान के मंच पर बैठा शख्स भी आपके और हमारे बीच का इंसान ही है। उसे भी खाना पसंद है शौक से कोई सात दिनों तक भूखा नहीं रहता। आप और हम सात घंटे भूखे रह जाएं तो पूरे खानदान को पता चल जाता है। लेकिन सात दिनों से एक शख्स भूखा है और आपके लिए लड़ रहा है। सिर्फ आपके लिए। सब कुछ ठीक भी रहा तो पांच साल से दस साल और इससे ज्यादा उनकी उम्र नहीं होगी। लेकिन आज हिन्दुस्तान उनके दीर्घायु होने की कामना कर रहा है। देश भर में जन्माष्टमी का उत्सव आज इस आंदोलन के आगे फीका पड़ गया। मुंबई में दही हांडी फोड़ने की तस्वीरें आज के दिन स्कीन से हटती नहीं थी लेकिन शायद ही आज देश ने मुंबई के उत्सव को देखा होगा। सिर्फ इसलिए कि आंदोलन के रंग के आगे उत्सव का रंग फीका पड़ गया, सेना का सिपाही जनता का जनरल बनकर दिलों पर राज कर रहा है।
मैं भी अन्ना हजारे
आज भी इस देश में मध्यमवर्गीय परिवार राजनीति को गंदी नजरों से देखता है। परिवार का कोई बच्चा राजनीति में चला जाए। झंडा बैनर और भाषण की बात करने लगे तो घरवालों से उसे न जाने क्या क्या सुनना पड़ता है। लेकिन आज तस्वीर बदली हुई है। रामलीला मैदान में एक साथ तीन तीन पीढ़ी के लोग पहुंच रहे हैं। ताकत को बढ़ाने के लिए। मुझे नहीं लगता कि जिसे लोग गली मोहल्ले में नेता कहते हैं, या फिर जो राजनीतिक दलों का कार्यकर्ता है वो किसी आंदोलन, धरना, प्रदर्शन, बंदी में अपने बच्चों, बीवी और बेटा-बेटियों को लेकर सड़क पर जिन्दाबाद मुर्दाबाद के नारे लगाने के लिए उतरता है। लेकिन इस आंदोलन में नेता नहीं हर कोई नायक बनकर सड़क पर उतरा है। तीन महीने की बच्ची से लेकर तिहत्तर साल के बुर्जग तक में वही जोश है जो मंच से दिखता है।

एक आदमी की आवाज के पीछे लोग भाग रहे हैं। फिर भी अंधे और बहरे लोगों को न तो दिखाई दे रहा है और ना ही कुछ सुनाई दे रहा है। वक्त हमेशा एक जैसा नहीं होता। लीबिया, सीरिया, ट्यूनिशिया और मिस्र जैसा आइटम गवाह है जहां तीस साल-चालीस साल तक पके पकाए जमींदारों को जमीन में लिटा दिया गया। यहां तो फिर भी सब कुछ सामान्य है। खामोश है हिन्दुस्तान। मन में चिंगारी है लेकिन दबी हुई। लोग उसे हवा नहीं दे रहे। लेकिन सन्नाटा तो कभी भी मजबूर कर सकता है।
19 अगस्त, दिल्ली की सड़कों पर जनसैलाब

चालीस साल
बाद टीम इंडिया की ऐसी शर्मनाक हार हुई है । वो भी उस कप्तान की कप्तानी में जिसने इस टीम को नंबर वन बनाया था। उसी कप्तान की कप्तानी में टीम की नैया डूब गई। टीवी पर कुछ देर के लिए माहौल बनाने की कोशिश भी हुई लेकिन रामलीला मैदान के मंच पर छाए सन्नाटे ने इन्हें आज बख्श दिया। जिस कप्तान की तारीफ में कसीदे पढ़ पढ़ करके थकते नहीं थे उसे भी हार का सामना करना पड़ा है। संयोग है कि आज कल में वापस नहीं लौटना है नहीं तो उनको भी माफी मांगने के लिए रामलीला मैदान जाना होता। कहने के मतलब ये कि आज हिन्दुस्तान रामलीला मैदान की ओर देख रहा है। आज की ये पीढ़ी पहली बार दिल्ली की सड़कों पर लाखों की भीड़ देख रही है। छुट्टी लेकर लोग रामलीला मैदान का रुख कर रहे हैं। लड़ाई है। जो लड़ी जा रही है। अन्ना इस लड़ाई में जनता के जनरल हैं और सड़क पर उतरी ये सेना इस लड़ाई में उनका साथ दे रही है। और इतिहास गवाह है कि शासन को झुकना ही पड़ा है। शांति अहिंसा और सदाचार के नारे के साथ जो शांतिपूर्ण क्रांति की शुरुआत हुई है उसका असर सिर्फ इस पीढ़ी को नहीं कई पीढ़ियों पर पड़ने वाला है। बात सिर्फ अब कानून बनने और न बनने को लेकर नहीं हो रही । बात अब सच और झूठ की है। धोखे में रखने की है। सच को छिपाने की है।