Thursday, December 9, 2010

नीतीश का 'न्याय' अभी आधा है...


नीतीश कुमार- मुख्यमंत्री (गृह, सामान्य प्रशासन)
सुशील कुमार मोदी (उप मुख्यमंत्री, वित्त, वाणिज्य, पर्यावरण, वन)

जनता दल यूनाइटेड-
विजय कुमार चौधरी (सरायरंजन)- जल संसाधान
विजेंद्र यादव- (सुपौल) ऊर्जा,संसदीय कार्य, उत्पाद
नरेंद्र सिंह---कृषि मंत्री
वृषण पटेल- (वैशाली) परिवहन और सूचना जनसंपर्क

नरेंद्र नारायण यादव-(आलमनगर) विधि, योजना विकास
रेणु कुमारी-(बिहारीगंज) उद्योग, आपदा प्रबंधन
जीतन राम मांझी(मखदुमपुर)- अनुसूचित जाति, जनजाति
शाहिद अली खान(सुरसंड) अल्पसंख्यक कल्याण, सूचना प्रौद्योगिकी
दामोदर रावत(झाझा)- भवन निर्माण
हरिप्रसाद साह(लौकहा)- पंचायती राज
गौतम सिंह(मांझी)- विज्ञान प्रौद्योगिकी
नीतीश मिश्रा(झंझारपुर)- ग्रामीण विकास
पीके शाही- मानव संसाधन
श्याम रजक (फुलवारी)- खाद्य आपूर्ति
रमई राम-(बोचहां) राजस्व और भूमि सुधार
परवीन अमानुल्लाह- (साहेबपुर कमाल)समाज कल्याण
भीम सिंह- ग्रामीण कार्य विभाग
अवधेश कुशवाहा(पीपरा)- लघु सिंचाई


बीजेपी के मंत्री---
नंद किशोर यादव(पटना साहिब)- पथ निर्माण
अश्विनी कुमार चौबे (भागलपुर)-स्वास्थ्य
प्रेम कुमार (गया टाउन)- शहरी विकास
गिरिराज सिंह- पशु एवं मत्स्य
जनार्दन सिंह सिग्रीवाल(छपरा)- श्रम संसाधन
चंद्र मोहन राय(चनपटिया)- पीएचईडी
सुखदा पांडे (बक्सर)- कला संस्कृति, युवा
एस एन आर्या (राजगीर)- खान एवं भूतत्व
रामाधार सिंह (औरंगाबाद)- सहकारिता
सुनील कुमार पिंटू (सीतामढ़ी)- पर्यटन

बीजेपी कोटे से मंत्री बनने वाले ज्यादातर विधायक शहरी क्षेत्र से चुने गए हैं। चनपटिया और राजगीर का अपना महत्व है, नहीं तो बाकी सब जिला मुख्यालय वाले ही विधायक जी मंत्री बने हैं।
और उसमें भी जानते चलिए कि बिहार में कुल 38 जिले हैं। 19 जिलों को ही अभी नीतीश के कुनबे में जगह मिली है। बाकी के 19 जिले के एनडीए विधायक फिलहाल 'बेरोजगार'हैं। कब तक रहेंगे ये मुझे नहीं पता।
जिलेवार आंकड़ों पर गौर फरमाए तो
जिला--------कुल सीट------एनडीए-----कितने मंत्री
मधुबनी--------10--------7---------------2
मधेपुरा--------04--------3---------------2
सीतामढ़ी------ 08--------8---------------2
छपरा---------10--------8---------------2
पटना --------14--------11--------------2
गया---------10--------09--------------1
जहानाबाद-----3---------03--------------1
बक्सर ------4---------04--------------1
औरंगाबाद----- 6--------05--------------1
सुपौल ----- -5--------05--------------1
मोतिहारी---- 12--------11-------------1
मुजफ्फरपुर-- 11--------10--------------1
समस्तीपुर--- 10-------08--------------1
बेतिया----- 09-------07---------------1
वैशाली --- -08-------08---------------1
बेगूसराय--- 07-------06---------------1
भागलपुर-- 07-------06---------------1
नालंदा--- 07--------06---------------1
जमुई---- 4--------03----------------1
इसके अलावा बाकी के 19 जिलों का खाता फिलहाल खाली है।
सीमांचल के इलाके में अररिया की कुल 6 में से 5 सीट एनडीए के पास है, पूर्णिया की 7 में से 6 सीट कटिहार में 7 में से 6 सीट लेकिन कोई मंत्री नहीं बना।
दरभंगा 10 में से 8 सीट, गोपालगंज 6 में से 6 सीट, सीवान 8 में से 8 सीट, नवादा की 5 में से 5 सीट, मुंगेर की 3 में से 3 सीट, भोजपुर की 7 में से 5 सीट एनडीए के खाते में है लेकिन कोई मंत्री नहीं है।
बाकी के बचे जिले के हालात भी मिलते जुलते हैं। सिर्फ किशनगंज जिला ऐसा है जहां एनडीए का खाता नहीं खुला 4 की सभी 4 सीट एनडीए हार गई।
कुल मामला ये है कि जिन जिलों से एनडीए के 77 विधायक जीत कर आए हैं वहां से कोई मंत्री नहीं है। कुल 129 जीते विधायकों वाले जिले से 28 मंत्री बनाए गए हैं।

रमेश की नई दुनिया


मृणाल पांडे की खोज नवरत्न में से एक रमेश रंजन सिंह ने हिन्दुस्तान दिल्ली को बाय बोल दिया है। रमेश ने पटना में सीएनईबी के ब्यूरो हेड के रूप में कार्यभार भी संभाल लिया है। रमेश हिन्दुस्तान दिल्ली में सेंट्रल डेस्क पर थे। हिन्दुस्तान के लिए खेल और फिल्म रिपोर्टिंग कर चुके रमेश अगस्त 2008 से हिन्दुस्तान में थे। हिन्दुस्तान में ही लखनऊ, पटना, रांची होते हुए दिल्ली पहुंचे और अब एक बार फिर अखबार छोड़ टीवी की दुनिया में पटना पहुंच गए हैं। रमेश ने करियर की शुरुआत सहारा से की थी। लंबे समय तक सहारा अखबार के लिए रिपोर्टिंग करने वाले रमेश आईआईएमएसी के छात्र रहे हैं। 2004-2005 बैच के छात्र रहे रमेश शांत स्वभाव के गंभीर पत्रकार माने जाते हैं। रमेश के लिए टीवी का ये जिम्मेदारी वाला पहला बड़ा अनुभव है। रमेश बिहार के छपरा के रहने वाले है।

Sunday, December 5, 2010

कांग्रेस का टाइम ही खराब है...


राहुल गांधी ने कहा है कि बिहार के चुनाव नतीजों से वो हताश नहीं हैं। हालांकि ये भी नहीं कहा कि वो खुश हैं। वैसे कहने लायक बिहार ने छोड़ा ही कहां हैं । खैर बिहार चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए प्रत्याशित तो कतई ही नहीं थे। जिस तामझाम के साथ फिर से खुद के दम पर खड़े होने की तैयारी हुई थी उसमें पलीता लग गया। टिकट का बंटवारा कहिए या फिर बड़े नेताओं का घालमेल, उम्मीदों पर नहीं उतरे खड़े तो नहीं उतरे। वैसे कांग्रेस के लिए समय ही शुभ नहीं चल रहा है। अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर का जो महीना है वो कांग्रेस के लिए ठीक नहीं है। आदर्श सोसायटी घोटाला, स्पेक्ट्रम घोटाला, बिहार में
बर्बादी, जगन मोहन का विद्रोह, सुप्रीम कोर्ट से रोज डांट । भाई इतने मुश्किल दौर से मनमोहन सिंह का तो पहला कार्यकाल भी नहीं गुजरा था। यूपीए वन में तो परमाणु करार पर लेफ्ट ने हाथ खींचा तो हाथ बढ़ाने कई लोग आगे आ गए। लेकिन
इस बार सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह बड़े बुरे दौर से गुजर रहे हैं। जिसको देखिए वही उनके खिलाफ बोल कर कट ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट हो या फिर सुब्रमण्यम स्वामी, परसों ये भी सुनने में मिला कि ए राजा की तरफ से भी पीएम की चिट्ठी को लेकर अनाप शनाप कहा गया था। वैसे कहने वाले सब कहते भी हैं कि पीएम साहब की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है। लेकिन खाली कहने भर से क्या होता है। अक्टूबर लास्ट में आदर्श सोसायटी फ्लैट घोटाला वाला मामला लाइट में आया। अब समय खराब ही कहिएगा न कि जिस अशोक चव्हाण को मुंबई हमले जैसे विकट हालात में सीएम बनाया वो इतने पुराने मामले में नप गए। जमी जमाई दुकानदारी उखड़ गई। अशोक चव्हाण के बारे में एक और मजेदार बात पढ़ते हुए बढ़िए,
अशोक चव्हाण का नाम अक्टूबर से पहले तक अशोक चव्हाण ही हुआ करता था लेकिन अक्टूबर शुरू में ही उन्होंने अपने नाव को वजन देने के लिए राव जोड़वा लिया और हो गए अशोक राव चव्हाण। अंकज्योतिषियों ने साफ कहा कि ये शुभ नहीं है, भारी विपत्ति आने वाली है, बीस दिन भी नहीं बीता कि कहां से फ्लैट का भूत निकला और ले गया।
अब कांग्रेस के लिए एक टेंशन हो तब तो, जगन मोहन रेड्डी, आंध्र प्रदेश के कडप्पा से कांग्रेस के सांसद हुआ करते थे। पूर्व मुख्यमंत्री और आंध्र प्रदेश के कांग्रेस छत्रप रहे वाईएसआर के बेटे हैं। इनका बड़ा लंबा चौड़ा कारोबार है। टीवी चैनल से लेकर अखबार तक। अभी पंद्रह दिन पहले इनके चैनल पर सोनिया गांधी, राहुल और मनमोहन सिंह के खिलाफ स्टोरी चल गई। खूब किरकिरी हुई। अब जगन संकट से निपटने के लिए कांग्रेस को वहां के रोसैया को सीएम की कुर्सी से हटाना पड़ा, किरण कुमार सीएम बने। किसी राज्य में नेतृत्व बदलना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान काम नहीं होता। लेकिन मजबूरी में करना पड़ा। इससे क्या हुआ सो जानिए, जगन मोहन पर दबाव बना और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पांच पन्नों की चिट्ठी लिखी सोनिया को बहुत बुरा भला कहा। हालांकि उनके चाचा उनके साथ नहीं गए लेकिन किरण कुमार मंत्रिमंडल में जो मंत्री बने हैं ज्यादा उसमें नाखुश ही हैं। मतलब कि यहां भी कांग्रेस के लिए समय ठीक नहीं चल रहा है। अब उन्हीं की पार्टी का सांसद रहा शख्स पार्टी तोड़ चुका है। सोनिया की अध्यक्षता में पार्टी टूटने की पहली बड़ी घटना है। अभी भले चुनाव नहीं है लेकिन अगला चुनाव आसान नहीं होगा। जगन मोहन के पिता वाईएसआर की हेलिकॉप्टर हादसे में मौत हुई और इसके बाद जब सत्ता संभालने की बारी आई तो जगन की महत्वकांक्षाओं को नजरअंदाज करते हुए रोसैया को गद्दी दी गई उस वक्त जगन ने तो साथ दिया। लेकिन बाद में जगन ने अपनी पिता की मौत के बाद जिन समर्थकों ने खुदकुशी की थी उनके घरों का दौरा शुरु किया, कांग्रेस को ये मंजूर नहीं था जानते हैं क्यों... क्योंकि कांग्रेस के लोग नहीं चाहते कि पार्टी में कोई दूसरे परिवार का नेता क्षत्रप बनकर उभरे। वाईएसाआर अपवाद थे जिन्हें खुली छूट देना मजबूरी थी कांग्रेस की।
बिहार और दो मुख्यमंत्रियों को नाप कर आगे बढ़ते हैं। स्पेक्ट्रम घोटाले का भूत कब तक पीछा करेगा भगवान जाने। पंद्रह दिन तो हो चुका है कहीं महीना न हो जाए संसद के ठप हुए। जेपीसी जांच के दबाव के आगे सरकार का गणित काम नहीं कर रहा है। ऊपर से सुप्रीम कोर्ट से रोज फटकार मिल रही है। सीवीसी को लेकर मामला भी सरकार के खिलाफ जा चुका है। थॉमस की बहाली हो रही थी तो नेता विपक्ष सुषमा स्वराज ने विरोध किया था। लेकिन दो-एक के बहुमत से मनमोहन सिंह ने बना दिया । अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार से लेकर सीवीसी तक सफाई दिए फिर रहे हैं।
अभी इतना ही थोड़े है सुरेश कलमाडी का खेल भी तो है। कॉमनवेल्थ वाले मामले में सीबीआई कलमाडी के मातहत काम करने वाले अफसरों को जेल में डाल चुकी है। किसी दिन कलमाडी साहब से भी पूछताछ होगी। कलमाडी भी पुणे से कांग्रेस के ही सांसद हैं, और बड़े पुराने नेता भी हैं। उधर हिमाचल वाले नेताजी, केंद्र में इस्पात मंत्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ भी तो भ्रष्टाचार वाले मामले में शायद चार्जशीट दायर हो ही चुका है। और हां ये भी जान लीजिए कि रोज जो है कोई न कोई बड़े अफसरों के त्रिया चरित्र का खुलासा भी इसी में हो रहा है। सो बड़ा मुश्किल भरा टाइम चल रहा है कांग्रेस का। एतना टफ टाइम पार्टी के लिए कभी नहीं रहा होगा, नए जेनरेशन में। इंदिरा जी वाले टाइम का अंदाजा नहीं है इसलिए कह रहा हूं ।

Thursday, December 2, 2010

अब तेरा क्या होगा 'कालिया'...


बिहार चुनाव के नतीजों को लेकर नीतीश कुमार के विरोधी तो कभी भी ऐसी उम्मीद लगाकर नहीं बैठे रहे होंगे।चुनावी साल में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और नीतीश के हमकदम माने जाने वाले ललन सिंह ने अपना हिसाब किताब अलग कर लिया। नीतीश तानाशाह है,पार्टी में लोकतंत्र खत्म हो गया और न जाने दुनिया भर के क्या क्या बोलते बोलते पटना से डोलते डोलते दिल्ली में आसन जमा लिए। बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस को सेट किया और अपना राजनीतिक प्लेटफॉर्म तैयार कर लिया। कांग्रेस को भी लगा कि भैया बड़ा नाम है,पुराना सहयोगी है नीतीश का हमारा भी फायदा कराएगा। सो सटा लिए बेचारे।अब सांसद बने जेडीयू के टिकट पर और चुनाव में प्रचार के लिए गाड़ी में कांग्रेस का झंडा लगाकर खूब घूमे, लेकिन लोगों ने लाइन पर ला दिया। अब तो कांग्रेस के लिए भी बेचारे किसी काम के नहीं रहे उपर से झंडा लगाके घूमने और कांग्रेस के मंच से भाषण देने को लेकर सदस्यता खतरे में है। नीतीश कुमार के लोग चाहते हैं कि इनको पार्टी से निकालकर शहीद बनाने के बजाए बेहतर होगा इनकी संसद सदस्यता के खिलाफ पहले शिकायत की जाए। लिहाजा चुनाव आयोग और लोकसभाध्यक्ष से शिकायत की तैयारी है। पूरा सबूत के साथ। अगर वहां से कुछ फायदे वाला जवाब पार्टी को नहीं मिला तो किसी भी दिन इनको चलता कर दिया जाएगा। काहे कि जिस बंटाईदारी बिल को लेकर बिहार में हाय तौबा मचाए थे उसको लेकर तो बंटाइदारी बिल वाले समाज के लोग सरकार के खिलाफ गए नहीं, तो भला अब समाज का विश्वास खो दिए, नेता का भरोसा खो दिया, जिसके साथ गए उसको कोई फायदा नहीं कराए तो ऐसे खोटे सिक्के का काम क्या ? जानते चलिए कि ललन सिंह अभी मुंगेर से जेडीयू के सांसद हैं।
औरंगाबाद के जेडीयू सांसद हैं सुशील कुमार सिंह।पहले विधायक हुआ करते थे.एक बार सांसद भी रहे। इस बार औरंगाबाद से चाहते थे कि भाई को टिकट मिले जेडीयू का।लेकिन सीट था बीजेपी के खाते का। चुनाव भर औरंगाबाद में नीतीश कुमार को
परेशान करते रहे। अंत में न कुछ समझ में आया को भाई को लड़ा दिए लालू की पार्टी के टिकट पर। पार्टी और गठबंधन के उ्म्मीदवार को हराने के लिए पूरा ताकत झोंक दिए, भाई तो इनके हारे ही, लेकिन जहां इनका घर पड़ता है वहां से भी नीतीश के उम्मीदवार की जीत हो गई। बीजेपी वाले जोर लगाए बैठे हैं, कि भइया इनको कल्टी कराओ। और तो और औरंगाबाद में इनको बैलेंस करने के लिए इन्हीं के समाज के नेता को जिन्होंने इनके भाई को हराया उनको मंत्री बना दिया गया है। इन पर अनुशासन का डंडा चलाने के लिए स्क्रिप्ट टाइप हो रहा है।
आगे बढ़िए महाबली सिंह बेचारे बीएसपी, आरजेडी और कहां कहां घूमते फिरते नीतीश की शरण में आए। चुनाव हुआ लोकसभा का तो इनको काराकाट से टिकट दे दिया। अब इनका खेल देखिए जिस चैनपुर सीट से विधायक थे वहां अपने सुपुत्र धर्मेंद्र को टिकट दिलवाकर विरासत बरकरार रखवाने के फेर में थे। लेकिन पार्टी ने मना कर दिया । और सुनिए इ तो विधायक बनने के बाद पार्टी बदलते रहे लेकिन इनके सुपुत्र इनसे भी फास्ट निकले, विधायकी के चुनाव लड़ने के लिए ही पार्टी बदल दिए। आरजेडी के टिकट पर लड़ गए। धर्मसंकट में फंसे बाबूजी ने पार्टी के नीति, सिद्धांत को ताखा पर रखके बेटा के लिए मोर्चा संभाल लिया, लेकिन बेटा बेचारा बाबूजी की विरासत को संभाल नहीं पाया।
पूर्णमासी राम लालू-राबड़ी के जमाने में खाद्य-आपूर्ति मंत्री होते थे, दूरदर्शी थे तभी मौका देखकर 2005 में ही पलटी मार गए और लोकसभा चुनाव के वक्त किस्मत ने साथ दिया तो गोपालगंज से जेडीयू के टिकट पर जीतकर दिल्ली का मुंह भी देख लिए। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद उनकी विधानसभा सीट पर जो उपचुनाव हुआ उसमें उन्होंने खेल कर दिया। बेटा के लिए टिकट चाहते थे, नहीं मिला तो खिलाफ में प्रचार किए और बगहा में पार्टी हार गई। सजा मिली तो इनको पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया। लेकिन इस बार चुनाव से पहले फिर से उनको पार्टी ने सटा लिया। अबकी बार फिर बेटा का टिकट चाहते थे, अड़ गए, पार्टी ने फाइनली टिकट नहीं दिया। आदत से लाचार पूर्णमासी राम ने फिर मुंह खोला, बेटे को हरसिद्धि से लड़वा दिया वो भी कांग्रेस के टिकट पर। अब कहां बगहा और कहां हरसिद्धि। गोपालगंज के किसी सीट से लड़ते तो लोग शायद सोचते भी कि सांसद का बेटा है। इनको लगा कि पूरा बिहार का महादलित इन्हीं के इशारे पर चलता है। बेटा को कुल जमा छे हजार वोट मिले हैं। यहां भी बीजेपी के उम्मीदवार का खेल बिगड़ने चले थे जेडीयू के सांसद महोदय। अब इनका अपना खेल बिगड़ने वाला है।
मोनिजर हसन। लालू के साथ रहे तो लालू को तेल लगाया। पांच साल पहले नीतीश के साथ हुए तो नीतीश को तेल लगाया। नीतीश को लगा की मास लीडर है सो फायदा भी कराया। मंत्री बनाया। लोकसभा चुनाव के वक्त टिकट देकर सांसद बनवा दिया। वो भी उस बेगूसराय सीट से जहां इनको कोई पूछे न, लेकिन इनको तो लग रहा है कि पूरा बिहार के मुसलमानों के यही इकलौते नेता हैं। खैर विधानसभा का जब उपचुनाव हुआ तो उम्मीदवारी को लेकर ललन सिंह से भिड़ गए। नतीजा हुआ कि
उस समय लालू के उम्मीदवार की जीत हो गई। इस बार मोनाजिर भाई को लगा कि अपनी घरवाली को भी विधायक बना लेंगे। लेकिन शायद नीतीश को उपचुनाव वाला खेल याद था सो टिकट नहीं मिला। लेकिन खेलल-खालल नेता मानने वाला थोड़ा था, लालू से हाथ-गोर जोड़के अपनी बीवी को आरजेडी के टिकट पर खड़ा करवा दिए। बेचारा लालू की पार्टी के जो विधायक थे, साल भर में ही उनको मोनाजिर ने सेट कर दिया। लेकिन लोग तो भाई खेल समझ गया लगता है। तभी तो मोनाजिर की बीवी को सेट कर दिया। हार गई बेचारी। अब मोनाजिर किसी को मुंह नहीं दिखा रहे। पटना में रुकने की बात छोड़ दिजीए। नया घर तलाश रहे हैं। लेकिन लालू के लिए भी फूंके कारतूस हैं बेचारे।
उपेंद्र कुशवाहा से बहुत कम लोग परिचित होंगे। नीतीश के बाद पार्टी में किसी जमाने में नंबर दो हुआ करते थे। एक बार जन्दाहा से विधायक थे। झारखंड बंटा और सुशील मोदी के लिए जब नेता विपक्ष का नंबर घट गया तो समता पार्टी ने इन्हें विरोधी दल का नेता बनाया। 2005 के चुनाव में हार गए। इन्हीं के समाज के नागमणि की पूछ बढ़ गई और इनको कोई पूछने वाला नहीं रहा तो लगे नीतीश के खिलाफ अनाप-शनाप बोलने। पार्टी छोड़े, एनसीपी में चले गए। घूमघूम के कोइरी के नेता के रूप में अपनी दुकानदारी चमकाने की नाकाम कोशिश में जुटे। कोई फायदा नहीं दिखा तो लोकसभा चुनाव के बाद फिर से नीतीश से सेटिंग कर पार्टी में लौट आए। तब तक बेचारे नागमणी से नीतीश का संपर्क ठीक नहीं रह गया था। इनको लगा कि कोइरी के सबसे बड़े नेता तो हमही रह गए हैं। नीतीश की भी मजबूरी थी नागमणी भाग जो गए थे सो इनको राज्यसभा भेजा गया। अब देखिए राज्यसभा सांसद बनने के बाद लगे रंग दिखाने। लगा कि हमसे बड़़ा कोइरी का तो कोई नेता नहीं है, लेकिन टिकट बंटवारे में कोई पूछा नहीं इनको। उल्टे नीतीश ने इनसे भी बड़ा एक कोइरी के नेता को शामिल करा लिया। लेकिन इनका गणित काम कर गया, बेचारे कोइरी के बड़े नेता जो नीतीश के बौरो प्लेयर थे, हार गए हैं। अब कुशवाहा जी इसे अपनी जीत मान रहे हैं लेकिन नीतीश के लोग अपनी हार। अब इनका क्या होगा.. नीतीश जाने।
ये बात तो सिर्फ जेडीयू की है। आरजेडी में भी महाराजगंज वाले सांसद उमाशंकर सिंह परेशान हैं। चुनाव में उनको लालू ने पूछा नहीं। प्रभुनाथ सिंह की कर्ता धर्ता बने रहे। अब जिस प्रभुनाथ सिंह को हराकर वो सांसद बने थे उनकी बढ़ती हैसियत ने इनको नाराज कर दिया। चुनाव भर खाली आरजेडी और प्रभुनाथ सिंह के समर्थकों को घूम घूमकर हराने में लगे रहे। कामयाब भी रहे। अब नीतीश के विकास की माला जप रहे हैं। वैसे भी नीतीश के साथ काम कर चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा को जब विपक्ष के नेता बनाया गया था बिहार में। उस वक्त बिहार में समता पार्टी विधायक दल के नेता उमाशंकर सिंह ही थे। बाद में लालू से सट गए। अब इ क्या करेंगे या इनके साथ लालू क्या करेंगे ये तो ये जाने या फिर लालू।
ऐसे नेताओं के खिलाफ संगठन के लोग नाराज हैं। वैसे भी परंपरा तो गलत ही है, अनुशासन में लोग न रहे तो हर कोई ऐसा करेगा। तब तो भगवान मालिक है राजनीतिक दलों का।

Sunday, November 28, 2010

असली परीक्षा तो अब होगी



विकास, विकास और विकास। बिहार की नई पीढ़ी विकास का नाम भूल चुकी थी। लेकिन पिछले पांच सालों के दौरान उसने जो कुछ देखा, सुना उसका नतीजा है कि आज देश में विकास की बात हो रही है और बिहार का नाम लोग ले रहे हैं। नीतीश की जीत के कई मायने है। लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती है लोगों के लिए रोजगार के अवसर को पैदा करना। बिहार में बंद हो चुके उद्योग धंधे को फिर से पटरी पर लाना। बिहार से बाहर गए लोगों को बिहार वापस लाना। अब नीतीश के पास इसके बारे में क्या मॉडल है इसका खुलासा अभी न तो बिहार के सामने हुआ है और ना ही देश के सामने। बिहार की सियासत को बिरादरी की वजह से लोग ज्यादा जानते थे। इस बार भी बिरादरी को कम करके किसी ने नहीं आंका था लेकिन नीतीश से आस लगाए हर धर्म, जाति के लोगों ने बिरादरी को बाय बाय कर विकास को गले लगाया। कारण था उम्मीद। लोगों ने नीतीश कुमार में अपनी खुशहाली की तस्वीर देखी। लिहाजा नीतीश को दिल खोलकर करने का मौका दिया है। पिछले पांच साल की तुलना लालू-राबड़ी के पंद्रह साल से होती रही, लिहाजा नीतीश का पांच साल भारी पड़ा। अब जब नीतीश की तुलना उनके अपने पांच साल से होनी है लिहाजा चुनौती बड़ी है। बिहार में रहने वाले लोग अब चमचमाती सड़कों के आदि हो चुके हैं। उनके लिए चमचमाती सड़कें, स्कूल में समय पर शिक्षकों का आना, अस्पताल में डॉक्टरों का समय से पहुंचना धीरे धीरे पुरानी बातें होती चली जाएंगी। बिहार से बाहर रहने वाले लोग साल में पर्व त्योहार, शादी ब्याह के मौके पर एक आध बार बिहार जाते हैं लिहाजा उनके लिए चमचमाती सड़कें और वहां का बदला माहौल जरूर नया होता है लेकिन जो लोग वहीं रहते हैं उनके लिए ये बातें नई नहीं होंगी। लिहाजा अब उनकी नई अपेक्षाओं पर खुद को साबित करना नीतीश के लिए चुनौती का काम होगा।
बिहार की पुरानी सड़कें चमचमा जरूर रही है, लेकिन ट्रैफिक की समस्या बड़ी समस्या बनती जा रही है। चाहे पटना हो या मुजफ्फरपुर। छपरा, दरभंगा और जहानाबाद हर शहर और शहर के बाहर व्यस्त सड़कों पर ट्रैफिक का बोझ बढ़ता जा रहा है। कारण भी है बिहार के लोगों की परचेंजिंग कैपेसिटी जिस अनुपात में बढ़ रही उस अनुपात में कोई ग्रेटर पटना या ग्रेटर दरभंगा टाइप नया कुछ नहीं हो रहा है। और फोर लेन या सिक्स लेन का मामला हर जगह के लिए है भी नहीं। इस टाइप की समस्या से निपटने के लिए भी कुछ जल्दी ही करना होगा।
सेंट्रल यूनिवर्सिटी, आईआईटी, आईआईएम टाइप आइटम भी 9 करोड़ वाले बिहार को चाहिए। कब तक यहां के लड़के टपला खाते फिरेंगे। जात पात के बंधन से ऊपर उठकर लोगों ने मौका दिया है तो हर लेवल पर मुस्तैदी से खड़ा होना होगा।
विरोधी तो विरोधी समर्थक भी कहते हैं कि नीतीश के कार्यकाल में अफसरशाही को मजबूती मिली है, और घूसखोरी, भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। सच्चाई भी है। लूटने की आदत पहले से पड़ी हुई है जिसका ठीक करना होगा। ट्रांसफर, पोस्टिंग और छोटी मोटी बहालियों में भी लाखों का खेल रुका नहीं है। अंतर इतना हुआ कि पहले टेबल के ऊपर से होता था अभी टेबल के नीचे से हो रहा है, इस चीज को सुधारने का मौका बिहार के लोगों ने दिया है।
अपराध पूरी तरह काबू में नहीं आ सकता इसको हर कोई मानता है लेकिन अपराधियों को जिनका आशीर्वाद मिला है वैसे लोगों पर कंट्रोल कीजिए ताकि समाज खुशी से कमा सके, खा सके। लोग खुश रहेंगे, आप खुश रहेंगे। लोगों को कष्ट हुआ तो आप भी चैन से सो नहीं पाएंगे, उन लोगों की तरह।
फिलहाल चुनौतियां पहले से ज्यादा है।साबित को साबित करना है जो कर दिया उसको भी ले चलना है। करने के लिए पूरा वक्त भी है। सत्ता के अहंकार का वक्त नहीं है। अभी वक्त माहौल को और ठीक करने का है। और हां किसी और के लिए बिहार में फिलहाल कोई स्कोप नहीं है। ऊपर से इतिहास गवाह है बिहार की धरती पर उठकर जो गिर गया दोबारा कभी नहीं उठा है। मौका बेहतर है सेवा करके साबित कीजिए । इस बार सत्ता के शिखर पर पहुंचाने वाला वोटर न तो कुर्मी था न कोइरी, न कोई राजपूत,भूमिहार, वैश्य, मुसलमान या फिर यादव, पूरे बिहार ने चुना है अब बिहार को यकीन दिलाइए।