Wednesday, September 15, 2010

विकास या जाति कौन पड़ेगा भारी ? PART -4


बिहार में कुर्मी और कोइरी को एक दूसरे का पूरक माना जाता है। नीतीश कुमार कुर्मी बिरादरी से हैं। 1994 में जब जनता दल का विभाजन हुआ था और समता पार्टी बनी तो बिहार में लोग इसे कुर्मी-कोइरी की पार्टी कहते थे। हालांकि बिहार में कोइरी वोटरों की संख्या कुर्मी से ज्यादा है। दोनों मिलाकर करीब 11 फीसदी के आसपास है। कुर्मी 5 और कोइरी 6 फीसदी। नीतीश कुमार के राजनीतिक उदय से पहले कोइरी जाति के नेता बिहार की राजनीति में ज्यादा प्रभावशाली थे। 90 के दशक में
बिहार में कुर्मी के सबसे बड़े नेता हुआ करते थे सतीश कुमार इनके बाद वृषण पटेल(तब सीवान के सांसद) थे। 94 में बिहार में कुर्मी चेतना महारैली में नीतीश कुमार का उदय हुआ और सतीश कुमार की दुकानदारी पर नीतीश ने कब्जा कर लिया। तब से लेकर अब तक बिहार में कुर्मी जाति के सर्वमान्य नेता नीतीश कुमार ही हैं। नीतीश जब मजबूत हुए तो लालू ने अपना नारा बदल दिया...भूराबाल साफ करो कहने वाले लालू ने तब नारा दिया... भूरा बाल माफ करो, कुर्मी-कोइरी साफ करो। लेकिन सच्चाई समझिए जैसे जैसे नीतीश मजबूत होते गये कुर्मी समुदाय से ज्यादा प्रभावशाली कोइरी समुदाय के नेता बैकफुट पर आने लगे। लेकिन सियासत के चाणक्य नीतीश को अपने 'बड़े भाई' की ताकत का अंदाजा था, लिहाजा कभी सीधे सीधे वार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। चेक एंड बैलेंस वाले फॉर्मूले पर चलते हुए कभी भगवान सिंह को आगे किया तो कभी उपेंद्र कुशवाहा को, मौका पड़ने पर नागमणि को भी साथ ले आए। भगवान सिंह कुशवाहा को युवा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। विधानसभा में विधायक दल के उपनेता की भी जिम्मेदारी दी। भगवान सिंह से थोड़ा मोहभंग हुआ तो झारखंड बनने के बाद समता पार्टी के विधायकों की संख्या जब बीजेपी से ज्यादा हो गई तो जन्दाहा से पहली बार विधायक बने उपेंद्र कुशवाहा को विपक्ष का नेता बना दिया। बिहार में नीतीश के बाद तब पार्टी में नंबर दो के पोजीशन पर पहुंच गये थे उपेंद्र कुशवाहा, 2005 के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा दलसिंहसराय से हार गये। हारने के बाद पार्टी में पोजीशन घट गया। उपमुख्यमंत्री की चाहत पाले हुए थे। लेकिन नीतीश से संबंध बिगड़े और पार्टी से बाहर हो गये। जेडीयू से बाहर होने के बाद उपेंद्र कुशवाहा एनसीपी में गये, फिर अपनी पार्टी बना ली। लेकिन राजनीतिक हस्ती घटती चली गई। 2005 में ही विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी-पार्टी घूमते हुए नागमणि भी नीतीश के साथ आ गए। नागमणि की पत्नी सुचित्रा सिन्हा को कुर्था से टिकट मिला और वो जीत गई। नागमणि तब कोइरी के बड़े नेता के रूप में स्थापित हुए जगदेव प्रसाद के सुपुत्र हैं और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिन्हा के दामाद। लोकसभा चुनाव के वक्त नीतीश ने टिकट देने से मना कर दिया तो लालू की पार्टी में चले गए। नागमणि के पार्टी से जाने के बाद नीतीश की पार्टी में कोइरी का दमदार नेता नहीं रह गया था सो एक बार फिर उपेंद्र कुशवाहा से संपर्क साधा गय़ा.. और बिहार की राजनीति में हासिये पर चल रहे उपेंद्र कुशवाहा ने इस ऑफर को सहर्ष स्वीकार कर लिया। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा की वापसी पार्टी के लिए भारी पड़ी और नीतीश के सबसे अजीज ललन सिंह नाराज हो गये। बाद में बिहार का अध्यक्ष पद भी छोड़ दिया। कहने का मतलब ये कि कोइरी वोट पाने के लिए नीतीश कुमार ने हर वो तिकड़म किये जो एक मंझे हुए नेता के लिए जरूरी होता है। नीतीश जिस इलाके से आते हैं वहां कुर्मी सबसे ज्यादा है तो कोइरी भी कम नहीं है। वैसे कोइरी की कई प्रजातियां भी हैं जो बिहार के हर इलाके में किसी न किसी जाति के रूप में अच्छी संख्या में हैं। नागमणि के जाने से जो जगह खाली थी उसको उपेंद्र कुशवाहा से भरने की कोशिश की गई। वैसे नीतीश ने भोजपुर इलाके के लिए भगवान सिंह कुशवाहा(जगदीशपुर विधायक, ग्रामीण विकास मंत्री) और तिरहुत के लिए दिनेश प्रसाद कुशवाहा(मीनापुर विधायक, लघु सिंचाई मंत्री) को भी मंत्री बनाकर अपना आधार मजबूत किया। नौतन वाले वैद्यनाथ महतो को सांसद बनावाय. उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में लाने के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा को बैलेंस करने के लिए दलसिंहसराय से आरजेडी के विधायक रामलखन महतो (कोइरी) को जेडीयू में शामिल कराया। अब खबर ये है कि उपेंद्र कुशवाहा इससे नाराज हैं। खैर कहने का मतलब ये कि कोइरी वोट खिसके न इसके लिए नीतीश लगातार तिकड़म पर तिमड़म लगाने में जुटे हुए हैं। कारण भी है कोइरी के एक वर्ग का नेतृत्व आरजेडी के कोइरी नेताओं के हाथ में है। समस्तीपुर में कोइरी वोटरों की संख्या ज्यादा है। मंजय लाल पहले वहां से सांसद हुआ करते थे , बाद में आलोक मेहता सांसद बने। दोनों कोइरी। मंजय लाल की मामला निपट चुका है लेकिन आलोक मेहता कोइरी के नौजवानों की अगुवाई करते हैं। हालांकि बीते लोकसभा चुनाव में उनकी ही स्वजातीय अश्वमेघ देवी (जेडीयू)ने उन्हें हरा दिया। उपेंद्र वर्मा, शकुनी चौधरी भागलपुर, मुंगेर इलाके में लालू का मोर्चा संभाले हुए हैं। शकुनी चौधरी बहुत पहले कांग्रेस में थे। 94 में समता पार्टी बनी तो नीतीश के साथ हो लिए, बाद में मन नहीं माना और लालू के साथ हो गए। शकुनी चौधरी को खुश करने के लिए उनके बेटे सम्राट चौधरी को ही लालू ने मंत्री बना दिया था जिसको लेकर खूब बवाल हुआ और लालू की किरकिरी हुई क्योंकि सम्राट चौधरी की उम्र ही 25 साल की नहीं थी। हालांकि जब उम्र हुई तो फिर से मंत्री बनाकर कोइरी आधार को जोड़े ऱखने की लालू ने खूब कोशिश की। तुलसीदास मेहता वैशाली, समस्तीपुर के इलाके में लालू का मोर्चा संभालते थे, अब उनके बेटे आलोक मेहता संभाल रहे हैं। कहने का मतलब ये कि कोइरी वोट नीतीश के साथ आज भी पूरी तरह नहीं है। लिहाजा नीतीश को अपने इस आधार वोट को बनाए रखने के लिए जोड़ तोड़ का गणित करना पड़ रहा है। मतलब साफ है कि विकास भी बात इस समुदाय के सामने भी अहम नहीं है...अब नागमणि पत्नी के साथ कांग्रेसी हो गये हैं। बिहार में अभी कोइरी जाति के करीब बीस विधायक हैं, वहीं कुर्मी जाति से 15। अब सवाल ये कि कोइरी के करीब 6 फीसदी वोटर क्या करेंगे.... लालू, नीतीश और कांग्रेस तीनों को बांटेंगे या फिर लव-कुश का फॉर्मूला हिट कराकर अपने भाई नीतीश को मजबूती देंगे। वैसे इतिहास पलटकर देखिये तो पिछली बार भी कोइरी का वोट पूरी तरह नीतीश को नहीं मिल पाया था। उस वक्त उपेंद्र कुशवाहा और नागमणि दोनों इनके साथ थे। इस बार रामलखन महतो क्या नागमणि की भरपाई करेंगे, क्या दसलिंहसराय में उपेंद्र कुशवाहा रामलखन महतो के लिए वोट मांगेंगे...वक्त बताएगा कि कोइरी का ऊंट किस करवट बैठता है। लेकिन एक बात जो अभी साफ है वो ये कि यदि 'विकास पुरुष' को अपने विकास पर भरोसा होता तो इस आधार वोट को जोड़े रखने के लिए इतना जोड़ घटाव नहीं सोचना होता।

Tuesday, September 14, 2010

विकास या जाति, कौन पड़ेगा भारी ? PART 3


बिहार चुनाव से पहले इस बार राजपूतों का समीकरण एकदम से बदलता नजर आ रहा है। वैसे तो आज की तारीख में कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। लेकिन आनंद मोहन, प्रभुनाथ सिंह और दिग्विजय सिंह अब नीतीश कुमार के साथ नहीं हैं। इन तीनों नेताओं का अपने अपने इलाके में बड़ा दबदबा है। राजपूत समाज में इनकी पूछ है। दिग्विजय सिंह तो अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन जाने से पहले उन्होंने नीतीश के खिलाफ राजपूतों का एक बड़ा प्लेटफॉर्म तैयार कर दिया। भागलपुर, बांका, जमुई, मुंगेर के इलाके में दिग्विजय सिंह की बड़ी पकड़ थी। बिहार में जब से नीतीश मुख्यमंत्री बने जॉर्ज खेमे के नेता दिग्विजय सिंह को साइड करके ही चले। सरकार बनने के बाद प्रभुनाथ सिंह की भी कोई पूछ नहीं रह गई थी। इलाका का अफसर इस बाहुबली नेता की बात नहीं सुनता था, लिहाजा समर्थकों में मार्केट खराब होता गया। आनंद मोहन को तो खैर इनके कार्यकाल में कोर्ट ने फांसी की सजा दी है। पिछली बार इन तीनों की ताकत नीतीश के साथ थी। नतीजा देखिये प्रभुनाथ सिंह के प्रभाव वाले छपरा की 10 सीटों में से 5 पर जेडीयू ने कब्जा किया। 2 सीट बीजेपी के खाते में।(छपरा लालू का गढ़ तो था ही), सीवान में भी 8 में से 3 जेडीयू और 2 बीजेपी को मिली थी। 2000 के चुनाव में इन दोनों जिले से सिर्फ एक सीट पर समता पार्टी को कामयाबी मिली थी।
आनंद मोहन की बात करें तो 2005 फरवरी के चुनाव में पत्नी लवली जेडीयू के टिकट पर बाढ़ से चुनाव जीती थी। नवंबर का चुनाव लवली नहीं लड़ी थीं। वैसे आनंद मोहन के प्रभाव वाले कोसी के इलाके में जेडीयू को जबरदस्त सफलता मिली। लालू जिस मधेपुरा से सांसद थे उस जिले की पांच में से 5 सीटें जेडीयू को। सहरसा में कुल 4 सीटों में से 2 जेडीयू को, सुपौल की 5 में से 5 सीटें जेडीयू को मिली थी। इन इलाके में आरजेडी का खाता तक नहीं खुला था। लेकिन परिस्थितियां कैसे बदली वो भी देख लीजिए। सहरसा की जिस सिमरी बख्तियारपुर सीट से दिनेश चंद्र यादव विधायक थे। लोकसभा चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे लेकिन विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को सीट नहीं दिलवा सके। आनंद मोहन की पत्नी लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में चली गई थी। आनंद मोहन के समर्थन से महबूब अली कैसर उपचुनाव में कांग्रेस के टिकट पर इस सीट से जीत गए।
वैसे एक सच्चाई ये भी है आनंद मोहन के जेल में होने की वजह से उनका पुराना वाला जलवा कायम नहीं रह गया है। इसी का नतीजा हुआ कि पत्नी को शिवहर से लोकसभा चुनाव में हार मिली। नीतीश कुमार एक शादी समारोह में जब सहरसा गये थे तो आनंद मोहन की मां से मिले थे। चर्चा हो चली थी कि आनंद मोहन नीतीश का साथ देंगे। खुद पूर्व सांसद अरुण कुमार सिंह भी संपर्क में थे। लेकिन आनंद मोहन ने कांग्रेस का हाथ नहीं छोड़ने का फैसला किया है। तभी तो राहुल गांधी की सहरसा वाली रैली में लवली ने मंच पर आकर धुंधली तस्वीर साफ कर दी। आनंद मोहन को आरजेडी में भी लाने की कोशिश हो रही थी
विधानसभा चुनाव में तालमेल के तहत सहरसा की सोनबरसा सीट पासवान किशोर कुमार मुन्ना के लिए एलजेपी के खाते से चाहते थे लेकिन लालू ने मना कर दिया। अटकलें थी कि लवली शायद इस सीट पर आरजेडी से लड़े। कहने का मतलब अगर आनंद मोहन-लवली आनंद का खूंटा उखड़ गया(ऐसा कुछ लोगों का मानना है) तो ये लोग उनके पीछे क्यों लगे थे। अब चूंकीं तस्वीर साफ हो चुकी है तो हो सकता है किशोर कुमार मुन्ना ही आरजेडी के टिकट पर यहां से लड़ जाए। मुन्ना भी राजपूत बिरादरी के हैं। आनंद मोहन की जब बीपीपा बनी थी तो मुन्ना स्टूडेंट पीपुल्स के अध्यक्ष थे। बाद में आनंद मोहन से संपर्क खराब हुआ तो अलग राजनीति करने लगे। दिग्विजय सिंह ने भी नीतीश कुमार को लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत का इजहार करा दिया। नीतीश ने नजरअंदाज किया तो लोकसभा चुनाव में निर्दलीय लड़े और जीत गये। अब वो नहीं हैं तो उनकी पत्नी पुतुल सिंह को लोकसभा टिकट देने की पेशकश की जा रही है, जेडीयू की ओर से ऐसा सुना जा रहा है। मतलब कहने का ये है कि राजपूतों के 5 फीसदी वोट को लेकर विकास पुरुष चिंतित तो हैं ही। वैसे भी उनके पास इस वक्त राजपूतों का कोई बड़ा नाम उनके साथ नहीं है। पूर्व विदेश राज्य मंत्री हरिकिशोर सिंह को खोज खाजकर नीतीश बाहर निकाल तो लाएं हैं.. लेकिन अब हरिकिशोर सिंह बहुत पुराने नेता हो गये। राजपूत वोटरों पर डोरा डालने के लिए ही पार्टी की बैठकों में इन दिनों पहली पंक्ति में उनको जगह दी जा रही है। राजगीर सम्मेलन जो 17-18 अगस्त के आसपास हुआ था उसमें देख लीजिए। मैनेज करने के लिए इनको योजना आयोग का बिहार में उपाध्यक्ष बनाया गया है। एक पीढ़ी को हरिकिशोर सिंह का नाम याद नहीं होगा, दूसरी पीढ़ी चेहरा देखने के बाद नाम पूछेगी.. इनको पहचानते हैं क्या नाम हैं इनका... टाइप से.... । और सांसद सुशील कुमार, मीना सिंह टाइप सांसद राजपूत के नाम पर नहीं वोट बैंक के नाम पर सांसद हैं। आरजेडी छोड़ जेडीयू में आए विजय कृष्ण जेल में ही हैं। लालू के पास चार सांसद हैं। चार में से तीन राजपूत हैं। रघुवंश सिंह पुराने सांसद हैं। वैशाली, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी के राजपूतों में इनका प्रभाव है। आरा, बक्सर के राजपूतों में जगतानंद सिंह का प्रभाव है। उधर छपरा सीवान में उमाशंकर सिंह पहले से थे अब तो प्रभुनाथ सिंह भी साथ हो लिए हैं लालू के। बीजेपी के पास राजपूत के नाम पर मोतिहारी के सांसद राधामोहन सिंह(पूर्व अध्यक्ष), उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह, राजीव प्रताप रूडी हैं ये लोग भी प्रभावी नेता हैं । कांग्रेस में तो मान लीजिए आनंद मोहन जेल में हैं, तो लवली है। निखिल कुमार की पत्नी श्यामा सिंह हैं। लोजपा में हरसिद्धि वाले महेश्वर सिंह हैं लेकिन उनका सीट सुरक्षित हो गया है केसरिया से लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन तालमेल वाला कंट्रोवर्सी कहीं समीकरण का माचो न कर दे। कुल मिलाकर साफ मामला ये है कि राजपूत वोटों के लिए चिंतित हर पार्टी है। बिहार में 5 फीसदी वोट लेकिन दबंग वोट। वैसे इतिहास देख लीजिए राजपूतों के वोट का बड़ा हिस्सा 2005 के चुनाव से पहले तक लालू को मिलता रहा। 2005 में लालू विरोधी लहर में एग्रेसिव होकर नीतीश को साथ दिया था लोगों ने।
वैसे राजनीतिक जानकार कहते हैं कि राजपूत वोटर पार्टी को नहीं जाति के उम्मीदवार को प्राथमिकता देते हैं.. चाहे पार्टी कोई हो। सच्चाई भी है इसमें। लेकिन प्रचार और हवा बनाने के लिए बड़ा नाम तो चाहिए ही नहीं तो विरोधियों को कहने के लिए हो जाता है कि ये पार्टी में फलनवां जाति के कोई नेता न हई, बाहरो से कोई प्रचारे करे न अलई...

Monday, September 13, 2010

विकास या जाति? कौन पड़ेगा भारी! PART- 1

बिहार में चुनावी बिगुल बजे एक हफ्ता से ज्यादा का वक्त बीच चुका है। टिकट का गुणाभाग शुरू है। सवाल ये कि क्या इस बार का चुनाव बिहार में बिना जातीय आधार पर लोग वोट करेंगे। क्या जमाने बाद बिहार जातीय बंधनों से मुक्त होकर सिर्फ विकास बनाक जंगलराज के नाम पर वोट करेगा। कुछ लोग भले ही माहौल बनाने की कोशिश में जुटे हो. लेकिन मेरा मानना है कि बिहार में बिना जातीय आधार के चुनाव नहीं कराए जा सकते। अगर बिहार में राज कर रहे नीतीश कुमार को विकास पर इतना ही भरोसा होता तो ललन सिंह को अध्यक्ष पद से हटाने के बाद विजय चौधरी को बक्से से निकालकर नहीं लाते। ललन सिंह के विद्रोह के बाद नीतीश कुमार के पास भूमिहार का कोई कद वाला नेता नहीं रह गया था। ललन सिंह की कमेटी में चूंकी विजय चौधरी अहम ओहदे पर थे लिहाजा उनके किस्मत से उनको ये गद्दी नसीब हो गई। संतुष्टि नहीं मिली थी जिस जगदीश शर्मा ने नीतीश के खिलाफ विद्रोह करके अपनी पत्नी को उपचुनाव में निर्दलीय विधायक बनवाया। उन्हें पार्टी से निलंबित करने के बाद तुरंत वापस नहीं बुलाते। लेकिन भरपाई संपूर्ण नहीं हो पाई लिहाजा जहानाबाद वाले अरुण कुमार सिंह को भी वापस बुला लिया। ललन सिंह वाला ड्रामा इस कदर फैल गया कि लगा कि सरकार से पूरा समाज ही नाराज है। इसिलिए नीतीश कुमार ने फूंक फूंक कर कदम रखना शुरू किया। और किसी भूमिहार नेता को नाराज होने का कोई मौका नहीं दिया। मुन्ना शुक्ला, अनंत सिंह, सुनील पांडे सब अपना माहौल बनाने में जुट गए लेकिन नीतीश ने कुछ नहीं कहा। अब सवाल ये कि क्या बिहार का भूमिहार इस बार पिछली बार की तरह ही नीतीश की फिर से ताजपोशी के लिए ताकत लगाएगा। या फिर भूमिहारों का वोट प्रसाद की तरह कांग्रेस और एनडीए में बंटेगा? कुछ राजनीतिक पंडित इस आकलन में होंगे कि भूमिहार का वोट आरजेडी गठबंधन को नहीं मिलेगा तो मुझे लगता है कि ये उनका भ्रम है। अब तक ये होता आया है कि समाज के नाम पर समाज एकजुट नहीं होता रहा। लेकिन नीतीश राज के बाद जो हालात बदले हैं.. उसमें समाज को एक बार फिर से अपनी ताकत का एहसास होने लगा है। लालू राज में समाज ने दिशा बदल दी थी। लोगों का झुकाव गलत कामों की ओर ज्यादा हो गया था। बदली परिस्थितियों में समाज ने एक बार फिर गेयर चेंज किया है। राजनीति में फुल एंट्री की झांकी छोटे छोटे चुनावों में दिखा है। लिहाजा आरजेडी का नहीं पता लेकिन एलजेपी के खाते की 75 सीटों में से जिस पर भी समाज का उम्मीदवार होगा वहां समाज कुछ भी कर सकता है इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सूरजभान सिंह यहां पासवान के सारथी बने हैं। रही कांग्रेस की बात तो बिहार में आज की तारीख में कांग्रेस में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसका भूमिहार वोट पर प्रभाव है। रामजतन सिन्हा, अनिल शर्मा अब बीते जमाने की कहानी है। कोई नया बड़ा चेहरा एंट्री मारता है तो फिर समय के साथ उस क्षेत्र की कहानी बदल सकती है। वैसे भूमिहारों को अब भी सबसे ज्यादा नीतीश पर ही भरोसा है। नीतीश भी अपने इस तथाकथित दबंग वोट बैंक को आसानी से छिटकने नहीं देना चाहते। पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश सिंह को मनाने की कोशिश में लगे लालू भी नहीं चाहते कि जो एक्सट्रा फायदा है उसको दूर किया जाए। उत्तर बिहार में भूमिहार नेताओं के आधार की बात करें, तो मुजफ्फरपुर, वैशाली की बात करें तो। मुजफ्फरपुर में सुरेश शर्मा पेशे से व्यापारी है लेकिन बीजेपी के नेता भी है। वोट पार्टी के बैनर का है अपना कुछ है ऐसा नहीं लगता। जेडीयू में मुन्ना शुक्ला चूंकि बाहुबली हैं इसलिए इनका मानदान होता है। लेकिन इनके चलते घाटा भी है। अजीत कुमार कांटी से विधायक हैं, विधानसभा में अच्छी पकड़ का फायदा दो बार मिल चुका है। हरेंद्र कुमार के अभी नीतीश से संबंध बेहतर नहीं हैं। कांग्रेस में पांडे और शाही परिवार के लोग हैं लेकिन सिर्फ चुनावों के समय ही इन लोगों का नाम सामने आता है। विनोद चौधरी, समीर कुमार टाइप के लोग भी नेता हैं यहां जिनकी हर पार्टी में ऊपर तक पहचान है, कब किसी पार्टी में है ये चुनाव के वक्त मालूम पड़ता है। सीतामढ़ी में विमल शुक्ला कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं। ढाका वाले बीजेपी विधायक अवनीश कुमार, मधुबन वाले आरजेडी विधायक बबलू देव का भी प्रभाव है। जेडीयू विधायक के पति सैदपुर वाले राजेश चौधरी नए चेहरे हैं। कुछ और नए नाम हैं जो उभरने की कोशिश में हैं। मोतिहारी में अवनीश कुमार, बबलू देव, राय सुंदर देव शर्मा(एलजेपी),गप्पू राय(आरजेडी) जैसे नाम हैं जिनका अपने अपने क्षेत्र में अच्छा प्रभाव है। बेतिया में बीजेपी के चंद्रमोहन राय,कांग्रेस के रणविजय शाही जैसे लोगों का प्रभाव है। छपरा, सीवान में धूमल सिंह(जेडीयू),सत्यदेव सिंह(बीजेपी),सुरेंद्र शर्मा,जैसे लोग प्रभावशाली और दबंग कहे जाते हैं। मतलब हर इलाके में हर नेता का हिसाब किताब है। कोई मास लीडर नहीं जिसका वोट बैंक पर प्रभाव हो। पटना में कोई अनंत सिंह को नेता मानता है. कोई सूरजभान को कोई दीलिप सिंह को श्याम सुंदर सिंह धीरज को,कही संजय सिंह नेता हैं,तो कहीं गणेश शंकर विद्य़ार्थी,बेगूसराय में राजो सिंह के बेटा बहू नेता हैं कांग्रेस के,तो बीजेपी वाले भोला सिंह को भी मानते हैं लोग नेता। कृष्णा शाही, रामजीवन सिंह और सीपीएम सीपीआई वाले समाज के लोग अब पुराने हो चुके हैं। नालंदा में गया सिंह, कुमार पुष्पंजय की नेतागीरी है। जहानाबाद में अरुण कुमार, जगदीश शर्मा, अखिलेश सिंह ,किंग महेंद्र नेता हैं। नवादा में आदित्य सिंह, अनिल सिंह, अखिलेश सिंह पत्नी सहित नेता हैं।(रामाश्रय सिंह अब मामला खत्म है )तो आरा बक्सर में सुखदा पांडे, सुनील पांडे नेता हैं। कटिहार,खगड़िया में निखिल चौधरी और चौधरी बिरादरी नेता हैं। सीपी ठाकुर,ललन सिंह टाइप के लोग आज नेता भले ही बड़े हैं लेकिन प्रभाव को फिलहाल चुनाव तक गोली मारिए। कुल मिलाकर भूमिहारों का मास नेता कोई नहीं है। भूमिहारों के नाम पर इनकी नेतागीरी है। कुछ पुराने नेता भी है जो अब बिल्कुल ही पुराने पड़ चुके हैं।

Sunday, September 12, 2010

विकास या जाति, कौन पड़ेगा भारी PART- 2


1931 की जनगणना के मुताबिक बिहार में 4.7 प्रतिशत ब्राह्मण, 4.2 प्रतिशत राजपूत एवं 2.9 प्रतिशत भूमिहार है। अगड़ों में 1.2 प्रतिशत ही कायस्थ है। इस तरह राज्य में चारों अगड़ी जातियों की संख्या 13 प्रतिशत के आसपास है। अब सवाल उठता है कि लालू के जंगल राज वाले शासन काल में तो भूमिहार वोटर लालू के साथ नहीं थे उस वक्त भी ये वोट बैंक लालू के खिलाफ था फिर लालू को क्यों नहीं हरा सके। इसके लिए समझना पड़ेगा बिहार का सियासी समीकरण। लालू राज के खात्मे की कहानी भले ही नीतीश रूपी कलम से सवर्ण वोटरों ने लिखी लेकिन इसके लिए पिछड़ों को स्याही बनाया गया। मतलब पिछड़ों का एक बड़ा वोट बैंक( कुर्मी, कोयरी के अलावा) जिसमें यादव का भी एक हिस्सा शामिल है उसने लालू के सिंहासन को हिलाया, और सालों से खार खाए सवर्ण वोटरों ने इसे धक्का दिया। जंमाने बाद दो दर्जन से ज्यादा भूमिहार विधायक बने, इतने ही राजपूत भी। लेकिन इस साल नया खेल है। नीतीश ने पिछड़ा, दलित वाला आधार भले ही मजबूत किया है लेकिन उस आधार को बूथ तक पहुंचाने वाला समाज इस बार अब तक खुल के साथ नहीं आया है। मतलब बात यहां भूमिहार, राजपूतों की कर रहे है। बंटाईदारी बिल का बवंडर, ललन सिंह की रुखसती, लालू के जंगलराज के सिपाहियों को गले लगाना, सवर्ण जाति के बाहुबलियों को जेल में डलवाना, ये वो मुद्दे हैं जिनकी वजह से नीतीश की डगर को आसान नहीं माना जा रहा। बंटाईदारी बिल को तो गलत बताने में जुट गये हैं नीतीश कुमार। ललन सिंह की भरपाई के लिए अरुण कुमार सिंह को वापस लाए, विजय चौधरी को अध्यक्ष बनाया, जगदीश शर्मा को फिर से गले लगाया, बाहुबलियों के खिलाफ शांत हो गये। लेकिन तस्लीमु्ददीन, रमई राम, श्याम रजक, विजय कृष्ण, रामदेव महतो, अवधेश मंडल की पत्नी बीमा भारती जैसे जंगल राज के सिपाहियों को अपने साथ लाकर सुशासन के नाम पर बट्टा लगाने का काम किया है उसका जवाब अभी उनके पास कुछ नहीं है। राजपूत समाज पिछली बार खुलकर उनके साथ खड़ा था। राजपूतों के दिग्गज दिग्विजय सिंह, प्रभुनाथ सिंह, आनंद मोहन सपरिवार नीतीश के लिए ललकार रहे थे। आज की तारीख में साथ कोई नहीं है। बांका वाले दिग्विजय सिंह अब दुनिया में नहीं रहे। प्रभुनाथ सिंह नाराज होकर लालू के साथ हो लिए, जेल में बंद आनंद मोहन ने पत्नी लवली को कांग्रेस में भेज दिया। सवाल ये कि भूमिहार अग्रेसिव होकर साथ दे भी दे तो राजपूत बहुल इलाकों में क्या होगा। वैसे भी लालू के पास लोकसभा में चार सांसद हैं खुद लालू और बाकी तीन राजपूत जाति से। नीतीश के पास जो लोग हैं औरंगाबाद वाले सुशील सिंह, आरा में मीना सिंह तो ये लोग सांसद हैं लेकिन ज्यादा आधार वाले नेता नहीं है। राजपूत वोट लेने में नीतीश को परेशानी होगी। कहीं ललन सिंह कांग्रेस में चले गए चुनाव से पहले तो भूमिहारों का बेगूसराय, लखीसराय, शेखपुरा, नवादा, पटना का समीकरण बदल सकता है। इंतजार कीजिए धीरे धीरे तस्वीर सब साफ हो जाएगी।

Tuesday, August 31, 2010

भोजपुरी तब से लेकर अब तक...

भोजपुरी एक ऐसी भाषा जिसमें मिठास है, रस है और अपनापन भी। दुनिया भर में भोजपुरी बोलने वालों की आबादी अठारह करोड़ से ज्यादा है। बिहार, पूर्वांचल और झारखंड ही नहीं बंगाल, असम, महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली पंजाब और हरियाणा में भी लाखों लोग बोलचाल में अपनी इस मिठास वाली भाषा का प्रयोग करते हैं। दिल्ली, कोलकाता, और मुंबई जैसे महानगरों में भले ही नौकरी पेशा लोग दफ्तर में हिंदी, अंग्रेजी में बात करते हैं.. लेकिन यहां भी जब अपने इलाके के लोगों से मिलते हैं तो अपनी भोजपुरी को ही अहमियत देते हैं। अगर इतिहास की बात करें तो भोजपुरी का अपना इतिहास एक हजार साल से भी पुराना है। कहते हैं कि बिहार के पुराने आरा जिले(बंटकर अब बक्सर अलग हो चुका है) में नया भोजपुर और पुराना भोजपुर नाम से दो गांव है..जिसको बसाया था मध्य काल में। कहते हैं कि मध्य प्रदेश के उज्जैन से आए भोजवंशी परमार राजाओं ने इस जगह को बसाया था। अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर इस जगह का नाम भोजपुर रखा। तब से यहां के आसपास बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी कहलाने लगी। भौगोलिक हिसाब किताब को देखे तो इस जगह के आसपास ही इस भाषा का गढ़ है। बिहार के भोजपुर, बक्सर, सासाराम, कैमूर, छपरा, सीवान, गोपालगंज, मोतिहारी, बेतिया के साथ ही यूपी का बलिया, वाराणसी, गोरखपुर, बस्ती, बाराबंकी, देवरिया, प्रतापगढ़, गाजीपुर के साथ इन इलाकों से सटा नेपाल का इलाका और झारखंड के इलाके की ये अपनी भाषा है। अंग्रेजों के जमाने में इसका विस्तार दुनिया भर में हो गया। मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद तो सिर्फ नक्शे में अलग है बाकी सब कुछ इसी इलाके जैसा। आजादी के आंदोलन में संपूर्ण भोजपुर का अपना अहम योगदान है। मंगल पांडे से लेकर, चंद्रशेखर आजाद और वीरकुंवर सिंह इसी मिट्टी पर जन्मे थे। देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, चंद्रशेखर भी भोजपुरी माटी में ही जन्मे थे। हालांकि इस इलाके से इतने बड़े लोगों के जुड़े होने के बावजूद भी भोजपुरी का जो सपना था वो सपना भी बना है। भोजपुरी के प्रचार प्रसार और विकास में सबसे ज्यादा किसी का योगदान है तो वो है कला संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े कलाकारों का। भिखारी ठाकुर के बगैर भोजपुरी की बात तो की ही नहीं जा सकती। बॉलीवुड में भोजपुरी को पहली पहचान मिली फिल्म गंगा मैया तोहे पियरी चढैबो से। 1962 में आई इस फिल्म ने भोजपुरी समाज को देश भर में एक साथ तो जोड़ा ही, भोजपुरी की एक अलग पहचान पेश की। इस फिल्म के जो गीत थे वो खुद मो. रफी, लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर ने गये थे। कलाकार भी अच्छे और अनुभवी थे। इसके बाद फिर बिदेसिया, बलम परदेसिया, धरती मैया जैसी फिल्मों ने भोजपुरी को बॉलीवुड में अलग पहचान दिलाई। 60 का दशक भोजपुरी सिनेमा के लिए उदय का दशक था। धीरे धीरे कई कलाकार भोजपुरी गीत संगीत अभिनय के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाने पहुंचे... । शत्रुघ्न सिन्हा की इस वक्त बॉलीवुड में एंट्री हो चुकी थी। बाद में शेखर सुमन और मनोज वाजपेयी जैसे कलाकारों ने भी अपने अभिनय का लोहा मनवाकर भोजपुरिया झंडा बुलंद किया। लेकिन 70 का दशक भोजपुरी सिनेमा के लिए उतना शानदार नहीं रहा। अस्सी के दशक भोजपुरी इंडस्ट्री के लिए स्वर्णिम समय था। एक से बढ़कर एक गायक कलाकार और एक से बढ़कर एक गीत। अस्सी के दशक में ही बिहार की लता मंगेशकर शारदा सिन्हा ने भोजपुरी का वो रंग जमाया जो कभी भी फीका नहीं पड़ सकता। आज भी बिहार, यूपी में शादी तो बिना शारदा सिन्हा के गीत बजे संपूर्ण हो ही नहीं सकती। बेटी की शादी में हरियर बांस कटइह हो बाबा.. ऊंचे उंच मड़ौवा छबइह हो..., और चाची चुमाबहू मंगल गावहू दिअहू अशीष रघुनंदन के....बगैर तो शादियां अधूरी सी लगती है। यही वो वक्त था जब राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म नदिया के पार रिलीज हुई थी। जिसने भी नदिया के पार देखी है चंदन और गूंजा के चरित्र को वो जिंदगी भर नहीं भूल सकता। शायद ही कोई दर्शक रहा हो जो सिनेमा के दृ्श्यों को देखकर रोया न हो। उस समय के लोग बताते हैं महिलाएं तो घर लौटकर चर्चा करती थी कि कौन कितना रोया। जिस वक्त नदिया के पार रिलीज हुई बॉम्बे में भारी बारिश हो रही थी, बड़े बैनर का बड़ा भोजपुरी प्रयोग था लेकिन बिहार और यूपी ने पहले ही हफ्ते में वो कमाई दे दी कि मुंबई में सिनेमा रिलीज को निर्माता-निर्देशक भूल गये.. हालांकि दो तीन हफ्ते बाद मुंबई में फिल्म रिलीज हो गई और खूब चली। इस फिल्म का एक एक गीत चाहे कौने दिशा में लेके चला रे....हो या फिर गूंजा रे.. चंदन...आज भी सुनने के बाद लोग गुनगुनाने लगते हैं। इसी फिल्म में शारदा सिन्हा ने शादी के मौके पर जब तक फेरे न हो पूरे सात तब तक दुल्हिन नहीं दुल्हा के....गीत गाये हैं.. आज भी शादियों में दबाकर इस गीत को बजाया जाता है। 1982 में रिलीज हुई नदिया के पार में हीरो सचिन थे जबकि हीरोइन थी वाराणसी में जन्मी साधना सिंह। साधना ने बाद में फिल्मों में काम नहीं किया.. लेकिन उनकी एक ही फिल्म दर्शकों के दिलो-दिमाग पर छा गई। साधना सिंह उसी विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी की बहू हैं जिन्होंने पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मैया तोहे पियरी चढैबो बनाई थी। अस्सी के दशक की शुरुआत भोजपुरी सिनेमा के लिए धमाकेदार हुई थी। उत्तर भारत के घर घर में भोजपुरी का क्रेज बढ रहा था। तभी भोजपुरी गीत संगीत के क्षेत्र में एंट्री मारी कंचन और बवला की जोड़ी ने। फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी....पच्चीस साल बाद भी कंचन के गाये गीत आप सुनेंगे तो वही खनक और वही मिठास, कहीं से कोई द्विअर्थी संवाद नहीं। इसके बाद हाथ में मेहंदी मांग सेनुरवा वाला गाना जब मार्केट में आया तो लोग इस आवाज के दीवाने हो गये। गली-गली चौक चौराहे, शादी समारोहों में कंचन के गीत पर लोग नाचते और झूमते। कंचन उत्तर प्रदेश और बिहार की स्टार हो गई थी। उस जमाने में कंचन और बावला की जोड़ी इतनी हिट हो चुकी थी कि रोज दोनों कभी बिहार, कभी यूपी तो कभी मॉरीशस, सूरीनाम और न जाने कहां कहां स्टेज शो करने निकल जाते थे। इस दौर के गीत हम न जइबे ससुर घर में बाबा, आरा हिले छपरा हिला... और साढ़े तीन बजे मुन्नी जरूर मिलना लोगों के लिए पुराने नहीं पड़े हैं। अस्सी के दशक में ही 1989 में आई राजश्री प्रोडक्शन की एक और फिल्म, मैंने प्यार किया। मैंने प्यार किया पर्दे पर बड़ी ब्लॉक बास्टर साबित हुई। इस फिल्म में कहे तोहसे सजना ये तोहरी सजनिया... शारदा सिन्हा ने गाये थे..वैसे तो फिल्म के सब गाने हिट थे लेकिन शारदा सिन्हा के इस भोजपुरी गीत ने तड़का डालने का काम किया। पेशे से प्रोफेसर शारदा सिन्हा इस वक्त भोजपुरी की आवाज बन चुकी थी। भोजपुरी सिनेमा का ये वो सुनहरा दौर था जब शारदा सिन्हा की आवाज में गाए गए लोक आस्था के महापर्व छठ के पारंपरिक गीतों को इस समय लोगों ने हाथों हाथ लेना शुरू कर दिया। नतीजा हुआ कि जो भोजपुरी घर और मुहल्ले की भाषा थी, अब तीज त्योहारों में देश के बड़े शहरों की फिजां में शारदा सिन्हा की आवाज के रूप में तैरने लगी थी। शारदा सिन्हा ने सुपरहिट हिंदी फिल्म हम आपके है कौन के गानों में भी अपनी आवाज दी है। गायक बालेश्वर भी इस दौरान हिट हो गये थे। लेकिन जैसे जैसे राजनीतिक रूप से देश में भोजपुरी मजबूत हो रहा था। सिनेमा, संस्कृति के क्षेत्र में कमजोर पड़ रहा था। वीपी सिंह, चंद्रशेखर, लालू यादव जैसे नेता देश के शिखर पर थे। लेकिन भोजपुरी का मामला गड़बड़ा रहा था। शारदा सिन्हा की आवाज में खनक तो थी लेकिन उन्होंने गाना कम कर दिया था। बॉलीवुड में कोई भोजपुरी फिल्मों पर दांव नहीं लगा रहा था। लेकिन इस दौरान भी अपने आवाज की जादू से लोगों को लुभाने के लिए भोजपुरिया माटी के कलाकार जुटे हुए थे। भोजपुरियां जुबान पर इस वक्त भरत शर्मा की आवाज थी। विरह गीतों को गाकर भरत शर्मा ने भोजपुरी इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन 1993-1994 से भोजपुरी गीतों के लिए बेहद ही बुरा दौर शुरू हुआ। ये वो वक्त था भोजपुरी की मिठास पर द्विअर्थी संवाद भारी पड़ने लगा था। मुन्ना तिवारी के नथुनिये पर गोली मारे या फिर बथता बथता वाला गीत...हालात ऐसे हो गये कि भोजपुरी गीतों को लोगों ने घर से बाहर निकाल दिया। अब ये गीत सिर्फ चाय और पान की दुकानों पर बजने लगे थे। जो भोजपुरी गीत चंद दिन पहले तक बिहार और यूपी की शान मानी जाती थी. अब उसका मतलब अश्लील और गंदा हो गया था। धीरे धीरे अश्लीलता का ये विष भोजपुरी गानों में फैलता गया और अब होड़ इस बात की होने लगी थी कि कौन कितना अश्लील गा सकता है। खा लू तिंरगा गोरिया हो फाड़ के जा झाड़ के.....1998 में जब ये गीत बिहार की गलियों में बजता था कहीं न कहीं से मारपीट और गाली गलौज की खबरें जरूर अखबार में पढ़ने को मिलती थी। गुड्डा रंगीला के इस गीत पर कई जिलों में प्रशासन ने बजाने पर प्रतिबंध तक लगा दिया। लेकिन इसके बाद भी अश्लीलता के इस काले अध्याय पर अंकुश नहीं लगाया जा सका। हालात ऐसे हो गये कि लोग इस तरह के गीतों के आदि होते चले गए। गुड्डा रंगीला के साथ राधे श्याम रसिया, छोटू छलिया और न जाने कौन कौन से गायक हुए कुछ चर्चा में आए कुछ गुमनामी के अंधेरे में खो गये। लेकिन इस दौरान बिहार में एक गायक ऐसा भी था जो बिहार, यूपी और भोजपुरिया समाज की नब्ज को पकडने की कोशिश में लगा था। बगल वाली जान मारे ली जब बाजार में बजना शुरू हुआ तो फिर कभी मनोज तिवारी मृदुल ने पीछे पलटकर नहीं देखा। भोजपुरी संगीत के क्षेत्र में जो कमी हुई थी उस कमी को मनोज तिवारी ने भरना शुरू कर दिया। बिहार और यूपी ने मनोज तिवारी को हाथों हाथ लिया। एक के बाद एक एलबम हिट होते चले गए। गीत संगीत के क्षेत्र से मनोज तिवारी ने अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा। दो हजार के दशक में मनोज तिवारी हिट हो गये। फिल्मों में अभिनय करने लगे। भोजपुरी फिल्में फिर से बनने लगी। रवि किशन और मनोज तिवारी जैसे कलाकारों की भोजपुरी फिल्में हिट होने लगी। लेकिन पिछले दो तीन सालों से मनोज तिवारी ने गाना बंद कर दिया। अब उनका नया एलबम भी नहीं आता। इस दौरान भोजपुरी को विस्तार देने के अभियान में कई गायक शामिल हुए लेकिन इनमें से कई अश्लीलता की भेंट चढ़ गए। इस बीच बिहार को एक नई बड़ी आवाज जो मिली वो कल्पना, देवी, मालिनी अवस्थी,पवन सिंह की आवाज। कल्पना वैसे तो असम की रहने वाली हैं लेकिन आवाज की खनक को सुनकर आपको नहीं लगेगा कि उनका भोजपुरी से कोई रिश्ता नहीं रहा होगा। गा तो सब लेती हैं लेकिन शुद्द द्विअर्थी गीत इनकी पहचान है। 2003 में जब देवी की एंट्री हुई तो लोग उन्हें दूसरी शारदा सिन्हा तक कहने लगे। विशुद्द पारंपरिक गीत गाने वाली देवी अपने प्रशंसकों को ज्यादा दिन तक संभाल नहीं सकी। हालांकि अब भी कभी कभी गा लेती हैं। मालिन अवस्थी टीवी की गायिका है। एलबम वैसे मैंने तो नहीं देखा और ना सुना है लेकिन अच्छा गा लेती हैं। पवन सिंह के गीत सिंगल अर्थी कभी नहीं होते... लेकिन फिलहाल कोई ऑप्शन नहीं है तो पवन सिंह का बाजार गर्म है। गायकी के साथ अभिनय भी कर रहे हैं। लॉलीपॉप लागेलू...इनका बड़ा हिट रहा। वैसे दिनशे लाल यादव निरहुआ, छैला बिहारी, तृप्ति शाक्या जैसे कलाकार भी है जो अपनी जगह पर बने हुए है। रिंकू घोस, रानी चटर्जी, पाखी, सरीखे गैर भोजपुरिया हीरोइनों की बदौलत भोजपुरी सिनेमा का बाजार हिट है तो इसकी वजह भोजपुरी की मिठास ही है। बंगाली लड़की रिंकू घोस और रानी भोजपुरी निर्माता निर्देशकों की पहली पसंद है। वैसे अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, अजय देवगन, राजबब्बर, नगमा, भाग्यश्री जैसे बड़े कलाकार भी इन दिनों बॉलीवुड के भोजपुरी संस्करण में शामिल है। लेकिन साल दो साल से भोजपुरी इंडस्ट्री में एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है। छोटे छोटे बच्चे जिनके दूध के दांत भी नहीं टूटे वो गीत गा रहे हैं.... बात तो अच्छी है लेकिन उनसे अच्छे गीत गवाए नहीं जा रहे। अब अरविंद अकेला उर्फ कलुआ को ही ले लीजिए, है तो अभी हॉट प्रॉपर्टी लेकिन उसके गीतों को आप घर में नहीं सुन सकते। फिलहाल इन उतार चढ़ावों के बीच बॉलीवुड में भोजपुरी अपनी जगह बनाने में कामयाब है। और इन कलाकारों की कोशिशों से भोजपुरी का प्रचार और प्रसार भी हो दुनिया भर में हो रहा है।