Friday, August 31, 2018

1 अगस्त को मिलिंद सर, 31 अगस्त को निखिल सर......

चैनल में आज तो आखिरी दिन था ये हम लोग जानते ही थे । सुबह जब मैं आया तो ये सोचते हुए दफ्तर में पहुंचा कि सर आएंगे तो उनके आने का वीडियो बनाऊंगा । लेकिन जब मैं पहुंचा तो वो पहुंचे हुए थे ।
हल्के फुल्के अंदाज में मैंने उनसे कहा भी कि मैंने ये सोचा था... उन्होंने जवाब दिया हां कैमरा बाहर लगवा दिया है... जाते वक्त सब होगा ।
सुबह से ही हमलोग कह रहे थे कि माला मंगवाऊंगा, नारेबाजी होगी.. जॉली मूड में सब चल रहा था ।
निखिल सर से बात हुई तो बोले कि शाम को 4 बजे के आसपास चला जाऊंगा । साथ खाना खाने के बाद हम लोग रोज की तरह ऑफिस के पीछे पेड़ के नीचे जमा हुए, कुछ इधर उधर की गॉशिप हुई फिर चले आए काम करने ।
हुआ कि केक मंगा लिया जाए । शर्मा ने पांडे को बुलाया और पैसे दिये.. निखिल सर शायद समझ गये थे । पांडे का हाथ पकड़कर बोले कि पैसा वापस करो... हमसे बोले ये सब ठीक नहीं है । हमने भी मना कर दिया और पैसा वापस करने को कहा ।
कुछ देर बाद निखिल सर जब कार्ड जमा करने की बात करने गये तो मौका मिल गया और शर्मा ने पैसे देकर पांडे को केक लाने भेज दिया । पांडे केक की दुकान पर पहुंचा और फोन करके पूछा कि सर, लिखना क्या है... मैंने कहा लिखवा दो फिर मिलेंगे...पांडे ने कुछ नाम को लेकर ज्ञान देना शुरू किया तो मैंने फोन शर्मा को थमा दिया और बोला बात कर लो....

समय से पांडे केक लेकर आ गया... शाम पांच बजे के आसपास सारी कागजी प्रक्रिया पूरी हो गई और फिर हमलोग केक काटने कैंटीन बुलाकर ले गये । जितने लोग पहुंच सकते थे सब पहुंचे... केक कटाई हुई... चेहरे पर केक की मालिश की गई... लोग गले मिले... पांडे भावुक हो गया... खूब सारी फोटो खींची गई
इसके बाद हुआ कि चला जाए....हिमांशु जाने वाला था इसलिए उसे सारथी बनाया... कैंटीन से निकले तो सर गैलरी से बढ़ने लगे.,. मैंने कहा न्यूज रूम में भी आ जाइए और बाकी लोगों से मिल लीजिए..

सर आए... न्यूजरूम में सबसे मिले.. फिर पीसीआर गये... ग्राफिक्स, वेब, प्रोग्रामिंग सब टीम से मिले...कोई गले मिल रहा था तो कोई हाथ मिला रहा था... कोई शुभकामना दे रहा था और जो नहीं जान रहा था वो आश्चर्य कर रहा था...हिमांशु रोने लगा....सर सब लोगों से मिलकर बाहर निकले.... रजनीस सर, अरुण सर भी थे... रिसेप्शन पर पहुंचने के बाद उन्होंने सब को आने से मना कर दिया.. हाथ हिलाते एबीपी न्यूज से विदा हो गये... दो साल से कुछ ज्यादा दिनों का सफर इस दूसरी पारी में उनके नाम रहा.....
निखिल सर को चैनल में लाने वाले मिलिंद सर इसी महीने की पहली तारीख को विदा हुए थे आखिरी तारीख को निखिल सर ने विदा लिया....
अगस्त का महीना भारी रहा, विवादों से भरा रहा.... 

Monday, August 20, 2018

अटल के अंतिम दिन की कहानी

बुधवार 15 अगस्त की शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एम्स गये । करीब चालीस मिनट रहने के बाद मोदी रात साढ़े आठ बजे के आसपास वहां से निकले । इस दौरान मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक झरने पर दर्जन भर लोगों के बह जाने की खबर आ गई । वीडियो बहुत ही भयानक था लिहाजा अटल जी की तबीयत वाली खबर उस वक्त हल्की पड़ गई । हालांकि लोगों को ये अनुमान लग गया था कि अटल जी बहुत बीमार हैं और अब शायद न बचें । सुबह से ही तमाम चैनलों ने कवरेज शुरू कर दिया । चैनलों के कलर स्कीम बदल दिये गये । मेडिकल बुलेटिनों पर टकटकी लग गई । एम्स के बाहर, अटल जी के घर पर , बीजेपी मुख्यालय पर रिपोर्टर तैनात कर दिये गये ।

रात से ही एम्स में जाकर अटल जी को देखने वालों का तांता लग चुका था । सुबह भीड़ बढ़ती जा रही थी और लोगों की धड़कनें भी बढ़ रही थी । न्यूज रूम और स्टूडियो में सिर्फ यही चर्चा थी कि कितने बजे एलान होगा ।

16 अगस्त की दोपहर को पीएम मोदी भी एम्स गये । अमित शाह, जेपी नड्डा, विजय गोयल सहित बड़े बड़े नेता मंत्री वहां मौजूद थे । मोदी चालीस मिनट रहकर लौट गये । इस दौरान दोपहर का वक्त भी बीत गया था । सास बहू के शो चैनलों पर ड्रॉप हो चुके थे । अमूमन बहुत बड़ी खबर होने पर ही सास बहू का शो कोई भी चैनल ड्रॉप करता है ।

ढाई बजे से पीसीआऱ में रनडाउन में ड्यूटी लग चुकी थी । हर मिनट की हलचल पर नजर थी । कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी धीरे धीरे एम्स पहुंच रहे थे । शायद सरकार और सिस्टम को पता चल गया था कि अटल जी अब एम्स से जिंदा नहीं निकलने वाले । इस बीच अटल जी के घर पर भी तैयारियों की सुगबुगाहट हो रही थी ।

शाम को 4 बजे के आसपास जब स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा मीडिया से बात करने आये तो लगा कि वही एलान करेंगे । हालांकि क्रिटिकल बताकर वो चले गये । खबर आने लगी कि पांच बजे मेडिकल बुलेटिन आएगा । स्टूडियो, पीसीआर, न्यूज रूम और एम्स में बहुत तेज हलचल थी ।

साढ़े पांच बजे के करीब हमारे संपादक पीसीआर में पहुंचे और बताया कि अभी एक मिनट पहले एक अखबार ने नहीं रहने का खबर ट्वीट किया है । तैयारी कर लो । सर ये बताकर न्यूजरूम में आ गये और अगले ही मिनट में मोबाइल पर एक मेडिकल बुलेटिन का पर्चा लेकर फिर से पहुंचे ।

सर बोले कि ये किसी ने ट्वीट किया है । मेडिकल बुलेटिन है तुम तैयार हो जाओ । तभी एम्स के बाहर से रिपोर्टिंग कर रहे अंकित गुप्ता और विकास भदौरिया के पास भी हलचल तेज हुई । लेकिन विकास भदौरिया के मोबाइल पर एम्स के मेडिकल बुलेटिन का पर्चा खुल नहीं रहा था । तभी मेरे पीछे खड़े हमारे संपादक ने कहा चला दो खबर ।

संपादक का आदेश कान में पड़ते ही मैंने अपने कंट्रोल में लिये विज से लाल फुल फ्रेम फायर कर दिया ।

पूरी स्क्रीन पर लिखकर आया
पूर्व पीएम अटल जी नहीं रहे ।

चंद सेकेंड बाद बाकी चैनलों पर भी फुल फ्रेम खबर और ब्रेकिंग की पट्टी चलने लगी । अटल जी के नहीं रहने की पुष्टि हो चुकी थी । तुरंत पीएम मोदी ने ट्वीट करके श्रद्धांजलि दी... इसके बाद नेताओं के ट्वीट पर ट्वीट आने लगे ।

कुछ देर बाद अटल जी के पार्थिव शरीर को उनके घर 6 कृष्ण मेनन मार्ग पर लाया गया । जहां तमाम नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी । रात 10.30 बजे तक चैनल लाइव मोड में रहा । फिर 10.30 बजे अटल जी पर ही स्टोरी चली ।

इस दौरान हमलोगों ने अगले दिन क्या करना है इसकी रणनीति बनाई  क्योंकि अगले दिन अंतिम यात्रा निकाली जानी थी । तय हुआ कि चैनल का चेहरा कल सफेद रहेगा ।
एंकरों के लिए सफेद कपड़े मंगवाए गए । सहयोगी शिखा सिंह रात को जाकर एंकरों के सफेद कपड़े खरीद कर लाई । निखिल सर के आइडिया को अमल में लाने के लिए संपादक रजनीश सर के कहने पर सत्येंद्र सर ने कंस्टीट्यूशन क्लब में श्रद्धांजलि सभा की रातों रात तैयारी करवाई । रात में हमारी पूरी टीम देर तक रुकी और हमने कल सुबह की पूरी तैयारी की । मुकम्मल तैयारी करने के बाद रात करीब 12 बजे घर निकले । 

Tuesday, August 7, 2018

उस दिन राजमहल में मातम पसरा था......

'अवंतिकापुर' में सब लोग शांति से जी रहे थे । जंगल के राजा को चिंता रहती थी लेकिन प्रजा खुश थी । प्रजा को अपने राजा पर पूरा भरोसा था और राजा भी प्रजा पर उतनी ही शिद्दत से यकीन रखता था ।
लेकिन राजा ठहरा राजा । पड़ोसी राजाओं को देखकर इनका भी मन राज्य के विस्तार को मचलता रहता था । और बड़े राजा भी चाहते थे कि पड़ोसियों की तरह हमारा भी राज्य विस्तार हो । हम भी दुनिया के नंबर दो, नंबर तीन मुल्कों की श्रेणी में गिने जाएं ।

समय बीत रहा था । राजा हर मुमकिन कोशिश कर रहा था । मंत्री, साथी सलाहकारों के साथ बैठक करता । चर्चा में जो राय बनती उस पर अमल करता और करवाता । लेकिन कोई नतीजा उस तरीके का नहीं आ रहा था जैसी उम्मीद की जा रही थी । एक दिन राजा को किसी ने सलाह दी कि पड़ोसी राज्य का एक सेनापति इन दिनों बागी हो चला है । उसे साथ लिया जाए तो शायद साम्राज्य के विस्तार पर कुछ मदद मिल सकती है ।

राजा ने उस सेनापति से संपर्क साधा और उसे साथ कर लिया । सेनापति ने राजा को ही नहीं प्रजा को भी भरोसा दिया कि वो आ गये हैं तो सब ठीक कर देंगे । राजा भी खुश, प्रजा भी खुश । लेकिन प्रजा के मन में संशय था । संशय इस बात का कि कहीं ये बाहरी सेनापति राजा के साथ ही राजनीति न कर दे ।

हुआ भी यही । सेनापति खुद को राजा समझने लगा । आया था राज्य के विस्तार के लिए लेकिन उसने राज्य को ही तहस नहस करना शुरू कर दिया । प्रजा परेशान थी । लेकिन राजा पर भरोसा था लिहाजा प्रजा ने कभी मुंह नहीं खोला । और यही पर प्रजा से गलती हो गई ।
राजा को भी लगा कि सब ठीक हो जाएगा । लेकिन हुआ नहीं । और फिर अमावस की उस काली रात को राजा ने राज पाट छोड़कर संन्यास लेने का फैसला कर लिया ।
प्रजा में हाहाकार मच गया । जंगल में आग की तरह खबर फैल गई कि राजा तो जा रहा है । सब कुछ छोड़कर । प्रजा को छोड़कर । राज पाट छोड़कर ।
अमावस के अगले दिन राजमहल में मातम का माहौल था । मंत्री से लेकर संत्री तक सब परेशान थे । प्रजा में रूदन क्रंदन का माहौल था । महल में सब इस बात का इंतजार कर रहे थे कि राजा तो जा रहा है अब राजपाट कौन संभालेगा  ?
तरह तरह की आशंकाओं के बाद अवंतिकापुर पर छा चुका था । अवंतिकापुर के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था । सभासदों की बैठक में नए राजा पर फैसला हो गया । दिन ढल रहा था । पुराने राजा से मिलने के लिए लोग लाइन में लगे थे । कोई रो रहा था, कोई परेशान हो रहा था.. सब उस सेनापति को लेकर गुस्से में थे जिसे राजा राज्य के विस्तार के लिए लाया था ।  गुस्से में दुकानें बंद होने लगी थी, बाजार बंद हो रहे थे.... देखते देखते समय बीत रहा था.... शाम ढली और अवंतिकापुर का चक्रवर्ती सम्राट अपने राज पाट को छोड़कर संन्यास की राह पर निकल पड़ा.....

लेकिन कोई समझ नहीं पाया कि राजा ने ऐसा क्यों किया ? क्या राजा पर कोई दबाव था ? और राजा उस दबाव को झेल नहीं पाया ?
सवाल का सही जवाब प्रजा आज भी तलाश रही है.... राजा के बिना राज्य चल रहा है....

क्रमश....

Tuesday, December 5, 2017

बिहार में अबकी बार, दिग्गज होंगे :बेकार'


बिहार में टिकट का बंटवारा बीजेपी नेताओं की नींद हराम कर देगा। बिहार में लोकसभा की चालीस सीट है। बीजेपी 22 पर जीती थी। इनमें से इस बार कई सांसदों का टिकट कटना तय है। पटना साहिब से शत्रुघन सिन्हा बागी हैं इसलिए उन्हें इस बार टिकट नहीं मिलेगा। दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद पार्टी से बाहर हैं उनकी पत्नी दिल्ली में कांग्रेस की राजनीति कर रहीं हैं । इस बार इनको भी बीजेपी नहीं उतारने वाली। इन दोनों के अलावा बागी तेवर दिख चुके भोला सिंह बुजुर्ग की श्रेणी में हैं इसलिए इनका भी टिकट कट चुका हुआ समझिये । सासाराम के सांसद छेदी पासवान की सदस्यता जा चुकी है इसलिए इनको इस बार घर बैठना होगा।
इनके अलावा पार्टी परफॉर्मेन्स के आधार पर भी कुछ लोगों को बेटिकट करेगी। इनमें सुनी सुनाई बात ये है कि उत्तर बिहार से बेतिया, शिवहर,मुजफ्फरपुर, झंझारपुर के सांसदों का नाम आ सकता है। बेतिया सीट बीजेपी की पुरानी सीट है लेकिन बीजेपी इस सीट को जेडीयू को दे सकती है। अगर बीजेपी ही लड़ी तो पार्टी साबिर अली या देवेश चंद्र ठाकुर को उतार सकती है। वैसे स्थानीय समीकरण संजय जायसवाल को बेटिकट करने की इजाजत नहीं देते। अगर संजय को ही पार्टी बेतिया से लड़वाती है तो फिर शिवहर से रमा देवी का टिकट कट सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पार्टी पूर्व एमएलए रत्नाकर राणा को उतार सकती है। रत्नाकर के अलावा लवली आनंद भी बीजेपी से टिकट की दावेदार बन सकती हैं। राजपूत में ये दोनों ही मजबूत उम्मीदवार होंगे। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा के एनडीए में बने रहने की सूरत में ये सीट लोजपा को जा सकती है और वैशाली के सांसद रामा सिंह यहां से उम्मीदवार बनाये जा सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि चर्चा है कि उपेंद्र कुशवाहा खुद वैशाली से लड़ने का मन बना रहे हैं।
शिवहर से अगर एनडीए ने राजपूत उम्मीदवार नहीं उतारा तो फिर वैश्य समाज से पवन जायसवाल और वैद्यनाथ प्रसाद के नाम पर पार्टी विचार कर सकती है। दरभंगा सीट जदयू को दी जा सकती है। यहां से नीतीश कुमार अपने करीबी संजय झा को उतार सकते हैं। लेकिन दिक्कत ये है कि संजय झा के सामने लालू गठबंधन ने कीर्ति झा को उतार दिया तो फिर जदयू के लिए सीट निकालना मुश्किल हो जाएगा। कीर्ति झा को टिकट देने के बाद लालू के लिए अली अशरफ फातमी सिरदर्द बन सकते हैं। ऐसे में उन्हें दरभंगा से मधुबनी भी लालू नहीं भेजना चाहेंगे। क्योंकि लालू की कोशिश अब्दुल बारी सिद्दीकी को बिहार से दूर करने की होगी। लालू चाहेंगे कि सिद्दीकी मधुबनी से लड़कर जीते ताकि तेजस्वी की राह का रोड़ा हमेशा के लिए बिहार की राजनीति से बाहर हो जाये।
मधुबनी से सिद्दीकी और दरभंगा से फातमी के उम्मीदवार बनने पर फिर से ध्रुवीकरण की संभावना बन सकती है जिसका फायदा संजय झा उठा सकते हैं। अगर संजय, कीर्ति और फातमी तीनों लड़े तब भी फायदे में संजय झा होंगे। संजय झा अभी जेडीयू के महासचिव हैं पहले बीजेपी में थे लेकिन साथ रहने के दौरान ही संजय को नीतीश अपने साथ ले आये थे।

बेगूसराय में टिकट की बाजी कौन मारेगा ?

चर्चा है कि केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह अपनी सीट बदल सकते हैं। गिरिराज पिछली बार ही बेगूसराय से लड़ना चाहते थे लेकिन उन्हें नवादा भेज दिया। इसके लिए तब रोना धोना भी हुआ था। इस बार बेगूसराय का मैदान साफ है और दिल्ली में उनकी हैसियत भी मजबूत हो चुकी है । ऐसे में संभव है कि पार्टी उनकी सीट बदल दे और उन्हें बेगूसराय लड़ने के लिए भेज दिया जाए । इस स्थिति में नवादा सीट से भूमिहार जाति के हिसुआ से विधायक अनिल सिंह की दावेदारी मजबूत हो सकती है । उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा से बागी होकर अपनी अलग रालोसपा बनाने वाले जहानाबाद के सांसद अरुण कुमार भी नवादा से दावेदार हो सकते हैं । अरुण कुमार इन दिनों अलग पार्टी बनाकर घूम रहे हैं और उनकी मुहिम को बीजेपी का साथ मिल रहा है । ऐसे में उनका बीजेपी में जाना तय लग रहा है और अगर उनकी बात सुनी गई तो वो जहानाबाद की जगह नवादा को चुनना पसंद करेंगे ।
अगर अरुण कुमार जहानाबाद से ही लड़ते हैं तो फिर सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी (एलजेपी) को नवादा भेजा जा सकता है । तब बिहार में मंत्री ललन सिंह मुंगेर से जेडीयू के उम्मीदवार होंगे । अगर इतना सब कुछ संभव नहीं हुआ तो फिर सब कुछ पहले जैसा होगा नवादा से गिरिराज,जहानाबाद से अरुण और मुंगेर से वीणा सिंह । बेगूसराय की सीट जेडीयू के ललन सिंह के लिए छोडी जा सकती है । टीवी पर बराबर दिखने वाले आरएसएस विचारक राकेश सिन्हा के भी बीजेपी के टिकट पर बेगूसराय से लड़ने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में है । ऐसा सुना जा रहा है कि लेफ्ट से टिकट के लिए जेएनयू वाले कन्हैया कुमार भी कोशिश कर रहे हैं ।
पटना साहिब में शत्रुघन सिन्हा की जगह बीजेपी किसी बड़े चेहरे को आउटसोर्स कर सकती है या फिर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद भी दावेदार हो सकते हैं ।

नीतीश - मोदी की दोस्ती की गाड़ी यहां आकर रुक जाएगी क्या ?

बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं । 2014 के चुनाव के वक्त एनडीए में तीन पार्टियां ही थी । लेकिन आज पांच पार्टियां सीधे तौर पर एनडीए में शामिल है । जबकि छठी पार्टी भी चुनाव के वक्त हिस्सा बन सकती है । ऐसे में टिकट का बंटवारा कैसे होगा ये बड़ा सवाल है ?

2014 लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो 40 सीटों में से 22 बीजेपी को,  6एलजेपी को और 3 सीटें आरएलएसपी को मिली थी । यानी 40 में से कुल 31 सीटें । तब बीजेपी 30, एलजेपी  7 और आरएलएसपी 3 सीटों पर लड़ी थी । उस वक्त जेडीयू ने अलग चुनाव लड़ा था और पार्टी को 2 सीटों पर जीत मिली थी । यूपीए में शामिल आरजेडी को 4, कांग्रेस को 2, एनसीपी को 1 सीट मिली थी ।
अब जेडीयू और मांझी की पार्टी हम (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा )एनडीए का हिस्सा है । दोनों साथ रहे तो इनको भी इन्हीं सीटों में से हिस्सा देना होगा । जेडीयू का साथ रहना तो पक्का है मांझी को लेकर अभी कुछ पक्का कहा नहीं जा सकता । वैसे आरएलएसपी के लक्षण भी एनडीए के साथ बने रहने के दिख नहीं रहे हैं ।

आरएलएसपी को हटा दें तो बीजेपी के 22 सांसद और एलजेपी के 6 सांसद मिलाकर 28 होते हैं । यानी जेडीयू के लिए अधिकतम 12 की गुंजाइश बनती है ।
( अब ऐसा भी नहीं कि सभी बारह सीटें जेडीयू को ही दी जाएगी क्योंकि बीजेपी के जो उम्मीदवार कम मतों से हारे हैं वो आसानी से दावा नहीं छोड़ेंगे । हारने वालों में शाहनवाज जैसे दिग्गज भी हैं । )

मांझी अगर राज्यपाल नहीं बने और राज्यसभा भी नहीं गये इस स्थिति में साथ रखने के लिए उनको भी खुद के लिए एक और प्रदेश अध्यक्ष वृषण पटेल के लिए एक यानी दो सीटें देनी होगी । इस लिहाज से अधिकतम 10 सीटें ही जेडीयू के लिए दिख रही है । इसमें भी पप्पू यादव साथ आ गए तो एक सीट उनके खाते में जाएगी । यानी नौ ही बचती है जिस पर जेडीयू दावा कर पाएगा या बीजेपी थोड़ा बहुत सोचेगी भी ।
(इतना भी तब जब उपेंद्र कुशवाहा अलग हो जाएंगे)

य़ानी सीट का बंटवारा सिरदर्दी ही साबित होने वाला है । जमीन पर हैसियत टटोलने और अपना संगठन मजबूत करने के लिए कार्यकर्ता सम्मेलन शुरू कर दिया है । थोड़ी देर के लिए अगर इसी को फॉर्मूला मान लें तो अब सवाल ये है कि क्या जेडीयू सिर्फ 10 सीटों पर ही चुनाव लड़ेगा । मुझे तो ऐसा नहीं लग रहा । लेकिन और रास्ता क्या है ? एक फॉर्मूला ये बन सकता है कि जेडीयू लोकसभा में कम सीटों पर लड़े और विधानसभा में उसे ज्यादा सीट मिले । लेकिन इसकी गुंजाइश इसलिए कम है क्योंकि बाकी पार्टनर भी हैं । उनका क्या होगा ?

नीतीश पैर पीछे करेंगे ?

2015 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू के पास 115 विधायक थे । लेकिन लालू और कांग्रेस से समझौता कर अपनी जमीन बचाने के लिए नीतीश ने 14 सीटों की कुर्बानी दे दी और 101 सीटों पर उम्मीदवार लड़ाया । यानी नीतीश का पैर पीछे खींचने का रिकॉर्ड पुराना है । इसलिए संभव है कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए नीतीश अपने पैर पीछे खींच लें और लोकसभा के लिए दस बारह सीट पर समझौता करके मान जाएं ।
2014 के पहले तक के लोकसभा चुनाव में जेडीयू और बीजेपी का गठबंधन हुआ करता था । तब जेडीयू 25 और बीजेपी 15 सीटों पर चुनाव लड़ती थी । लेकिन2014 से समीकरण उल्टा हो गया है ।

2014 का रिजल्ट दोहराया तो ?

2014 में बिहार में कुल 6 करोड़ 38 लाख वोटर थे । इनमें से 3 करोड़ 53 लाख 4हजार वोट पड़े थे । 22 सीटें जीतने वाली बीजेपी को 1 करोड़ 5 लाख 43 हजार वोट मिले थे । प्रतिशत में कहें तो 29.86 फीसदी । बीजेपी की सहयोगी एलजेपी को22 लाख 95 हजार यानी 6.5 फीसदी । जेडीयू को 56 लाख 62 हजार वोट मिले यानी 16.04 फीसदी । आरजेडी को 72 लाख 24 हजार वोट यानी 20.46 फीसदी । कांग्रेस को 30 लाख 21 हजार यानी 8.56 फीसदी वोट मिले । एनडीए में बीजेपी+एलजेपी+जेडीयू के वोट जोड़ दें तो कुल 52 फीसदी होता है । यानी आधे से भी ज्यादा । यही समीकरण बना रहा तो फिर लालू और कांग्रेस कहीं टक्कर में नहीं दिखेगी ।

अभी अररिया में लोकसभा उपचुनाव होना है । 2014 में यहां आरजेडी के तस्लीमुद्दीन जीते थे । तस्लीमुद्दीन को उस चुनाव में 4 लाख वोट मिले थे । दूसरे नंबर पर बीजेपी थी जिसे 2 लाख 61 हजार वोट और तीसरे नंबर रहे जेडीयू को 2 लाख21 हजार वोट मिले थे । इस लिहाज से सीट पर दावा तो बीजेपी का ज्यादा बनता है । अब देखना होगा कि किशनगंज की सीट के बदले दोनों दलों में सौदा क्या होता है ।

Monday, August 28, 2017

बिहार के लिए नीतीश-मोदी दोनों को एक दूसरे की जरूरत थी

बिहार ही नहीं देश की राजनीति में 26 जुलाई की तारीख को कोई भूल नहीं सकता। शाम करीब साढ़े छह बजे का वक्त था पटना में दो दिन बाद यानी 28 जुलाई से होने वाले विधानसभा सत्र से पहले नीतीश ने अपने घर विधायकों की बैठक बुलाई थी। बैठक चल ही रही थी तभी खबर आ गई कि नीतीश कुमार राजभवन जाकर इस्तीफा देंगे।
इससे पहले तक ये चर्चा थी कि नीतीश कुमार लालू के बेटे और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को बर्खास्त कर सकते हैं। लेकिन बैठक के अंदर से खबर ठीक उलट सामने आ गई। नीतीश कुमार शाम को छह बजकर पैतीस मिनट के आसपास राजभवन पहुंचे और प्रभारी राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी को इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफा देने के बाद करीब 6 बजकर 55 मिनट के आसपास नीतीश बाहर आए और मीडिया को बता दिया कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। नीतीश ने अंतरात्मा की आवाज सुनने की बात कही और बताया कि अब काम करना मुश्किल हो गया था।

इतिहास के पन्नों से बिहार की राजनीति
नीतीश की ये दोस्ती लालू के साथ 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद हुई थी। थोड़ा पीछे आपको ले चलें तो लालू जब बिहार की राजनीति में पूरे शबाब पर थे तब नीतीश कुमार ने उनका साथ छोड़ा था। उस वक्त लालू सीएम थे और जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में जनता दल के चौदह सांसदों ने पार्टी छोड़ी थी। नीतीश भी उनमें से एक थे। इसके बाद साल 1995 के विधानसभा चुनाव में नीतीश अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़े लेकिन उनकी समता पार्टी कोई कमाल नहीं कर सकी। 1996 में बीजेपी से समझौता हुआ और नीतीश का राजनीतिक कद दिन दूना और रात चौगुना बढ़ता गया।
इससे बाद साल 1999 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जनता दल में विभाजन हुआ वाजपेयी के साथ जाने को लेकर। देवगौड़ा ने जनता दल सेक्यूलर बना लिया और शऱद यादव की पार्टी का नाम हुआ जद यू। 1999 के लोकसभा चुनाव से पहले जॉर्ज की समता पार्टी और शरद यादव के नेतृत्व वाले जनता दल यू का विलय हुआ। लोकसभा चुनाव सबसे जदयू के टिकट पर लड़ा। लेकिन साल भर में ही तलाक हो गया और साल 2000 का विधानसभा चुनाव एनडीए के तहत लड़ा तो गया लेकिन तब जद यू और समता पार्टी अलग अलग थी। तब रामविलास पासवान जनता दल यू के स्टार थे। चुनाव हुआ पार्टी नहीं जीती लेकिन नीतीश सात दिन के लिए सीएम बने। इसके बाद 2005 के नवंबर वाले चुनाव में नीतीश और बीजेपी गठबंधन को बहुमत मिला और सरकार बनी। 2010 के चुनाव में प्रचंड जीत मिली। तब तक मोदी की थाली छीनने वाला एपिसोड हो चुका था। नीतीश और बीजेपी ने मिलकर 243 में से 206 सीटें जीत ली थी। लालू 22 पर आ गये थे।

2013 से 2015 तक का सफर 
2010 में बहुमत के साथ दूसरी बार बनी बीजेपी और जेडीयू की सरकार तीन साल चली और मई 2013 में नीतीश ने रास्ते अलग कर लिए। नीतीश ने मोदी के नाम पर 17 साल पुराना रिश्ता बीजेपी से तोड़ लिया। 2014 के चुनाव में नीतीश लेफ्ट के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़े। लेकिन पार्टी को महज दो सीटें मिली।
2014 के चुनाव का आंकड़ा ये था कि 40 में से बीजेपी को 22, एलजेपी को 6 और आरएलएसपी को 3 सीटें मिली। 30 सीट पर बीजेपी लड़ी थी जबकि एलजेपी 7 सीटों पर, आरएलएसपी 3 पर लड़ी थी।
लालू, कांग्रेस और एनसीपी का समझौता था। लालू 27 पर लड़े, कांग्रेस 12 और एनसीपी 1 सीट पर। लालू को 4, कांग्रेस को 2 और एक सीट एनसीपी को मिली। ओवर ऑल ये रहा कि बीजेपी गठबंधन 31 सीटें जीती, लालू गठबंधन 7 और नीतीश को 2 सीटें मिली।
हार के बाद नीतीश ने इस्तीफा दे दिया और मांझी को सीएम बनाया>
इसके बाद 2014 के अगस्त महीने में विधानसभा के उपचुनाव हुए। लालू और नीतीश ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा और बीस साल की दुश्मनी दोस्ती में बदल गई। इसके बाद मांझी के हटने के बाद लालू के बाहरी समर्थन से नीतीश की सरकार साल भर चली और 2015 के चुनाव में लालू, नीतीश कांग्रेस का गठबंधन हो गया। इस गठबंधन में न तो एसपी थी और एनसीपी। लालू, नीतीश, कांग्रेस में 101, 101 और 41 सीटों का बंटवारा हुआ ।  पार्टी जबरदस्त तरीके से जीती। लालू को 80, नीतीश को 71 और कांग्रेस को 27 सीटें मिली । इसमें नुकसान नीतीश को हुआ और सबसे ज्यादा फायदा लालू और कांग्रेस को।

26 जुलाई 2017 को कैसे बदली बिहार की राजनीति
 26 जुलाई 2017 को नीतीश ने इस जनमत के फैसले को खारिज करते हुए बीजेपी से हाथ मिला लिया और रातों रात नई सरकार का रास्ता साफ कर दिया। राजभवन से रात को निकलकर जब नीतीश अपने घर पहुंचे तो बीजेपी ने समर्थन की पेशकश कर दी और नीतीश ने उसे फौरन स्वीकार कर लिया। रात को ही 10 बजे के आसपास दोनों दलों के विधायकों की बैठक हुई और नीतीश को नया नेता चुना गया। रात के अंधेरे में ही नीतीश बीजेपी विधायकों के साथ सरकार बनाने का दावा पेश करने पहुंच गये।
नीतीश के 71 विधायक, एनडीए के 58 और तीन निर्दलीय विधायकों ने समर्थन किया। बहुमत के 122 से दस सीट ज्यादा लेकर नीतीश ने दावा पेश किया। पहले खबर आई कि शाम पांच बजे अगले दिन यानी 27 को शपथ ग्रहण होगा । पटना का राजनीतिक माहौल गर्म था। लालू चारा घोटाले की सुनवाई के लिए रांची गए तो तेजस्वी ने राज्यपाल से मिलने का समय मांग लिया। सुबह 11 बजे का समय मिला तो नीतीश ने शपथ ग्रहण का समय चेंज कर लिया और सुबह 10 बजे ही शपथ का समय फिक्स किया। रात को तेजस्वी मार्च करते राजभवन गए लेकिन तब राज्यपाल से मिल नहीं पाए।
अगले दिन सुबह 10 बजे राजभवन में नीतीश और सुशील मोदी का शपथ ग्रहण हुआ और सोलह घंटे पहले जो  लालू की पार्टी सत्ता में थी वो पैदल हो गई और पैदल पार्टी वाली बीजेपी सत्ता में आ गई

बिहार की राजनीति को जो लोग जानते हैं वो ये भी जानते हैं कि नीतीश के पास अपना वोट बैंक लालू या दूसरे नेताओं की तुलना में कम है। लेकिन ये बात भी है कि नीतीश के कद का कोई नेता नहीं है। लालू का सूरज बिहार में अस्त हो चुका था लेकिन उनके बेटों का भविष्य बनना था इसलिए शायद नीतीश और लालू की दोस्ती हुई। वोट के लिहाज से देखें तो नीतीश जिस कुर्मी जाति से हैं उसकी आबादी 5 फीसदी के आसपास है। नीतीश अति पिछड़े और पिछड़े मुस्लिमों के नेता माने जाते रहे हैं। लेकिन भविष्य में मोदी के नाम की वजह से शायद अब मुस्लिम साथ न दे लेकिन अति पिछड़े और महादलित नीतीश के साथ रहेंगे।

नीतीश की राजनीतिक मजबूरी अभी कहिए या आगे भी कहिए कि बिना सहारे के नहीं चलने वाली। नीतीश को या तो बीजेपी का साथ चाहिए या फिर लालू का। आज बीजेपी और नीतीश एक दूसरे की जरूरत इसलिए भी हो गए हैं क्योंकि दोनों का एक दूसरे के बिना काम नहीं चल सकता । उसमें भी लालू इस वक्त सबसे मजबूत स्थिति में दिख रहे हैं। 

क्या कहता है वोटों का गणित

2014 और 2015 के पैटर्न को देखें तो नीतीश की पार्टी करीब 16 फीसदी वोट लाने में कामयाब रही है। 2015 में बीजेपी अकेले सबसे ज्यादा 157 पर लड़ी थी तो उसे 24.42 फीसदी वोट मिले। लालू की पार्टी को 18.35 और नीतीश की पार्टी को 16.8 फीसदी वोट मिले थे। कांग्रेस को 7 फीसदी वोट मिले।
बीजेपी के साथ लड़ी एलजेपी 42 पर लड़ी तो 5 और मांझी की पार्टी 21 पर लड़ी तो 2.27 फीसदी वोट मिले। आरएलएसपी 23 पर लड़कर 2.56 फीसदी वोट । यानी एनडीए को करीब 35 और महागठबंधन को 42 फीसदी वोट मिले। 

अब सामने 2019 का लोकसभा चुनाव है। माना जा रहा है कि लोकसभा के साथ ही नीतीश विधानसभा का चुनाव भी करवा सकते हैं। जहां तक सीटों के बंटवारे का सवाल है तो राजनीतिक भविष्य की बेहतर संभावना पासवान भी बीजेपी के साथ ही देख रहे हैं। क्योंकि उनका बिहार में सीएम बनने का सपना अब पूरा होने से रहा। इसलिए वो बीजेपी के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ना चाहेंगे।
लोकसभा की चालीस में से बीजेपी तो 20 सीटों पर कम से कम जरूर लड़ेगी। पासवान के 6 सांसद हैं लेकिन उन्हें शायद 5 सीट से ज्यादा न मिले। कुशवाहा की पार्टी को भी इस बार तीन की जगह दो या फिर एक से काम चलाना पड़ सकता है। रही बात मांझी की तो बीजेपी की कोशिश उन्हें राजभवन में शिफ्ट कर पार्टी को बीजेपी या जेडीयू के साथ मर्ज करने की होगी। क्योंकि मांझी की पार्टी का कोई वैसा बेस नहीं है और पार्टी निकली भी तो नीतीश की पार्टी से ही है। ऐसा करने से ये होगा कि सीटों के बंटवारे में पेंच कम रहेगा।
रही बात नीतीश की पार्टी की तो आज भले उनके दो सांसद हैं लेकिन 15 से कम शायद नहीं मिलेगी लड़ने के लिए। कहा जा रहा है कि फॉर्मूला फिट हो चुका है। पहले जब बीजेपी जेडीयू का गठबंधन था तो बीजेपी 15 और जेडीयू 25 सीटों पर लड़ती थी। लेकिन 2014 के बंटवारे ने बीजेपी को हाई जंप का मौका दे दिया।
नए समीकरण में उपेंद्र कुशवाहा खुद काराकाट से नहीं लड़ना चाहेंगे। क्योंकि वहां उनकी छवि बहुत खराब हो चुकी है। वो खुद वैशाली से लड़ने की तैयारी में हैं। रामा सिंह का संबंध पासवान से ठीक नहीं है तो हो सकता है कि कुशवाहा को वैशाली सीट मिल जाए । लेकिन उनकी हार वहां से भी तय है। सीतामढ़ी में भी उनका सांसद फेल है। इसलिए वहां भी उनको सीट मिले गुंजाइश कम है। जहानाबाद में अरुण कुमार पार्टी से नाराज हैं अलग पार्टी बनाकर खेल रहे हैं। पता नहीं बीजेपी में जाएंगे या जेडीयू में। जहां भी जाएंगे उनका टिकट पक्का है।
पासवान की पार्टी को वैशाली के साथ ही नालंदा की कुर्बानी देनी पड़ेगी। इस हिसाब से उनके पास पांच सीट बचेगी। शायद डील भी यही है और इसी डील के हिसाब से पासवान के भाई बिना किसी सदन के सदस्य होते हुए मंत्री बने हैं। विधान परिषद भी वो नीतीश और बीजेपी के सहयोग से ही जाएंगे।
उपेंद्र कुशवाहा अगर मंत्रिमंडल से हटते हैं तो फिर उनकी दोस्ती लालू और शरद यादव से हो सकती है। ऐसे में वो ज्यादा कुछ असर तो नहीं डाल पाएंगे क्योंकि चुनाव आते आते उनकी पार्टी भी टूट जाएगी। लेकिन ऐन चुनाव से पहले वो क्या करते हैं देखने वाली बात होगी। उपेंद्र कुशवाहा भी अंतिम समय में गेम करने वाले नेता हैं। केंद्र में कुर्सी खतरे में दिखी तो उन्होंने फौरन पुरानी अदावत भूलाकर नीतीश कुमार को शॉल ओढाकर कुर्सी बचाने में जुट गए।

Wednesday, September 14, 2016

इसे कहते हैं सियासत में असली गृह युद्ध

चाचा भतीजे की ये लड़ाई कोई नई नहीं है। समय समय पर दोनों अपनी ताकत का इजहार करते रहे हैं। चाचा को इस बात का गुमान है कि वो मुलायम के छोटे भाई हैं। तो भतीजे को इस बात का गुमान है कि वो मुख्यमंत्री हैं और नेताजी के बड़े बेटे। अखिलेश को दूर तक राजनीति करनी है इसलिए वो कड़े और बड़े फैसले लेने में अब नहीं हिचकिचाते। नहीं तो याद होगा आपको यही अखिलेश यादव थे जिनके फैसले 24 घंटे में ही पलट जाते थे।
2012 में जब सरकार बनी थी तो हर कोई कहता था कि चार मुख्यमंत्री है, साढ़े चार मुख्यमंत्री है टाइप। तब कभी आजम खान टोचन मारते तो कभी चाचा शिवपाल। 2012 में जब पार्टी यूपी में जीती थी तब बीएसपी की सरकार थी। अखिलेश पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष थे। चुनाव नेताजी के नाम पर लड़ा गया था लेकिन लड़ाई अखिलेश ने लड़ी थी।
अब एक बार फिर चुनावी समर शुरू होने वाला है। मुलायम ने यूपी के महाभारत में अपने रथ का सारथी बदल दिया है। अब पार्टी के फैसले प्रदेश में शिवपाल यादव करेंगे। अखिलेश सिर्फ मुख्यमंत्री भर हैं। चर्चा तो ये भी हो रही है कि मुख्यमंत्री ही कहीं चुनाव तक न बदल दिया जाए। समाजवादी पार्टी परिवार की पार्टी है, लिहाजा संभव यहां कुछ भी हो सकता है। लेकिन अभी अखिलेश इतने कमजोर नहीं हुए हैं कि मुलायम उन्हें बदलने की हिम्मत दिखा पाएंगे। जहां तक चाचा भतीजे की लड़ाई का सवाल है तो ये परंपरागत तरीके से हर घर में होता आया है और यहां भी होता रहेगा।
नेताजी के जाने के बाद पार्टी बनी रहेगी, बची रहेगी, एकजुट रहेगी कहा नहीं जा सकता। लेकिन जब तक नेताजी हैं तब तक सबको साथ रहना पड़ेगा। 2012 में जब नेताजी मुख्यमंत्री नहीं बन रहे थे तब हवा में शिवपाल का नाम भी उड़ने लगा था। शिवपाल खुद को मानने भी लगे थे। लेकिन बाजी भतीजे ने मार ली। बाद में दोनों अपने अपने समर्थकों को जगह पर सेट करने में लग गए। अंदर खाने सब चल रहा था लेकिन 21 जून को अखिलेश की मर्जी के खिलाफ जाकर शिवपाल ने बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का विलय करा दिया। कहा गया कि नेताजी की सहमति से हुआ है। लेकिन अखिलेश को छवि की चिंता थी सो उन्होंने चाचा के फैसले पर बड़ा प्रहार किया। विलय वाली रात विलय में भूमिका निभाने वाले बलराम यादव को बर्खास्त कर दिया। फिर मान मनव्वौल और सब कुछहोने के बाद अखिलेश की बात मानी गई और मुख्तार की पार्टी को बेआबरू होकर बाहर निकलना पड़ा।
शिवपाल को मन मसोस कर रह जाना पड़ा। इससे पहले शिवपाल अमर सिंह को शामिल कराने में कामयाब रहे थे सो उनका मन बढ़ा हुआ था जबकि अखिलेश की मर्जी नहीं थी अमर सिंह को लाने के लिए। तब अखिलेश खून का घूंट पीकर रह गए और इस बार शिवपाल को रहना पड़ा।
फिर 7 जुलाई को शिवपाल के करीबी अफसर को प्रमुख सचिव बना दिया गया। इस अफसर पर कई दाग पहले से रहे हैं। लेकिन शिवपाल को दागी ही पसंद आता है। जबकि अखिलेश इसके घोर विरोधी है। इस नियुक्ति को शिवपाल की जीत के तौर पर देखा गया और कहा गया कि मुख्तार वाले डैमेज को कंट्रोल करने के लिए इस दागी को अहम पद पर बिठाया गया है। लेकिन दागी को भी दो महीने से ज्यादा अखिलेश बर्दाश्त नहीं कर पाए। परसों 12 सितंबर को उनको भी बाहर कर दिया। उसी दिन दो मंत्री गायत्री प्रजापति और राज किशोर सिंह को भी अखिलेश ने भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया।
गायत्री प्रजापति पहले से बदनाम रहे हैं लेकिन नेताजी के चहेते माने जाते हैं। नेताजी से कल होकर पूछा गया कि अखिलेश ने बर्खास्त कर दिया है आपके चहेते को तो उनका जवाब था कि मीडिया यानी आपसे ही मालूम हो रहा है। बड़े ही दुख भरे अंदाज में मुलायम का ये बयान था। इस बातचीत में उन्होंने कई बार ये कहा कि मुख्यमंत्री तो उनको बनना था लेकिन बना दिया अखिलेश को। मुलायम यहां मीडिया को टीस के साथ बताते दिखे कि चुनाव उन्हीं के नाम पर लड़ा गया लेकिन हम सब देख चुके थे सो उन्हीं को बना दिया। अब मुख्यमंत्री हैं सो हर फैसला पूछ कर थोड़े लेंगे। इस बयान में एक पिता या पार्टी का अध्यक्ष नहीं बल्कि एक बेबस नेता ज्यादा दिख रहे थे मुलायम।
इस फैसले के अगले ही दिन यानी कल 13 सितंबर को मुलायम ने अखिलेश को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटा दिया। बताया जा रहा है कि इस बारे में अखिलेश से राय नहीं ली गई। अखिलेश को हटाया तो हटाया बनाया किसे तो शिवपाल यादव को। अब भला इस मात को मुख्यमंत्री कैसे बर्दाश्त कर पाते। दिन को शिवपाल अध्यक्ष बने और रात को ही अखिलेश ने शिवपाल से नौ में से 7 मंत्रालय वापस ले लिए। 2 पुराना छोड़ा और एक नया दे दिया। खबर मिली तो सैफई में शिवपाल कोप भवन में जा बैठे। रात 8 बजे के बाद कमरे से नहीं निकले। चर्चा होने लगी कि इस्तीफा देंगे। सरकार छोड़ेंगे और न जाने क्या क्या करेंगे।
रात को ही मुलायम ने शिवपाल की पत्नी सरला और बेटे को लखनऊ से सैफई रवाना किया। मुलायम से फोन पर बात कराई गई। सुबह होते होते शिवपाल ने सुर बदल दिये। कार्यकर्ताओं से कहा कि इस्तीफा नहीं दूंगा और मीडिया के सामने आए तो कहा कि जो नेताजी कहेंगे वो करूंगा। प्रेस क़न्फ्रेंस में 27 बार नेताजी नेताजी नेताजी कहा। लेकिन अखिलेश का नाम जुबान पर नहीं लाए। कार्यकर्ताओं को जब सैफई में घर के बाहर भाषण दे रहे थे तब भी उन्होंने अखिलेश का नाम नहीं लिया। या कहिए उचित नहीं समझा। इससे पहले भी तल्खी वाले मौके पर वो ऐसा करते रहे हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि शिवपाल और अखिलेश के रिश्ते किस कदर बिगड़े हुए हैं।

प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद नाराजगी को लेकर की गई इस पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिवपाल में जो सबसे बड़ी बात कही वो ये कि चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ेंगे साफ नहीं है। अमूमन जो मुख्यमंत्री होता है वही चेहरा होता है। लेकिन ये कहकर प्रदेश अध्यक्ष की हैसियत से शिवपाल ने अखिलेश के आगे बड़ा सा पूर्ण विराम लगा दिया है। हो सकता है कि ये चुनाव पार्टी मुलायम के नाम पर भी लड़े।
ऐसा इसलिए क्योंकि अखिलेश और उनके सौतेले भाई प्रतीक में पटती नहीं है। मुलायम प्रतीक को भी राजनीति में सेट करना चाहते हैं। परिवार का प्रेशर भी है। और तो और प्रतीक और उनकी पत्नी ही पूरे परिवार में ऐसे हैं जो शिवपाल खेमे के माने जाते हैं। बाकी पार्टी के पांच सांसद (रामगोपाल सहित) अखिलेश के खेमे से हैं।    

अखिलेश काजल की कोठली में रहने वाले बेदाग छवि के नेता हैं। लेकिन परिवार का छाप छूटेगा तो नहीं ही। सो बाहुबलियों से दूरी बनाकर, करप्शन के आरोपियों से पीछा छुड़ाकर अखिलेश संदेश तो सख्त छवि की देना चाहते हैं । लेकिन चाचा मौके बेमौके पर रूठ कर सब पर पानी फेर देते हैं। अब शिवपाल अध्यक्ष बन गये हैं तो टिकट बंटवारे में उनकी ज्यादा चलेगी। ऐसे में कैसे अखिलेश खुद को फिट कर पाएंगे इस विंडो में देखने वाली बात होगी। 

Thursday, July 14, 2016

विवादित चेहरों के दम पर कांग्रेस जीतेगी यूपी की जंग ?

शीला दीक्षित को कांग्रेस यूपी में मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने जा रही है । कांग्रेस चाहे तो किसी को भी चेहरा बनाए ये पार्टी का मामला है । लेकिन जो नेता बीस पच्चीस साल से यूपी की राजनीति से दूर हो । जिसका यूपी की सियासत से अभी कोई वास्ता न हो उस पर दांव लगाकर कांग्रेस कौन सा तीर मार लेगी ? शीला दीक्षित दिल्ली में विकास का चेहरा मानी जाती थी लेकिन वो बात तब की थी अब तो उन्हें भ्रष्टाचार के प्रतीक के तौर पर पेश कर रहे हैं विरोधी । दिल्ली में टैंकर घोटाले को लेकर आज ही खबर आई है कि पुलिस उनसे पूछताछ करने वाली है । हफ्ते भर पहले ही वाटर मीटर घोटाला भी सामने आया है । कहने का मतलब ये कि सिर्फ 
 ब्राह्मणों के वोट के लिए ही शीला को चेहरा बनाया जा रहा है तब तो कांग्रेस की नाव भगवान के भरोसे है ।
शीला पर घोटाले का दाग लगा है तो पार्टी के उपाध्यक्ष बनाये गये इमरान मसूद हेट स्पीच के लिए मशहूर हैं। मसूद सहारनपुर से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तब उन्होंने नरेंद्र मोदी को लेकर बोटी बोटी काटने वाला विवादित बयान दिया था । बाद में माफी मांगी लेकिन इस बयान ने उन्हें फायदा भी दिलाया था । सहारनपुर में समाजवादी पार्टी का मुस्लिम उम्मीदवार चौथे नंबर चला गया और मसूद 4 लाख वोट पाकर दूसरे नंबर रहे । थोड़ा और जोड़ लगाते तो शायद जीत भी जाते । लेकिन इसका साइड इफेक्ट ये है कि मसूद सक्रिय हुए तो ब्राह्मण ही नहीं हिंदू वोटों का विरोध में ध्रुवीकरण हो सकता है । इसका नुकसान कांग्रेस को ही होगा । वैसे भी कांग्रेस के नेताओं पर भड़काऊ बातें बोलने का आरोप कम ही लगता है लेकिन मसूद जैसों का महत्व बढ़ना कांग्रेस की रणनीति में बदलाव के संकेत हैं ।

माननीय राज बब्बर भी दूध के धुले नहीं हैं । 2013 में 12 रुपये में भऱपेट खाना दिलवा रहे थे । बाद में लगा कि गलत बात मुंह से निकल गई तो माफी मांग लिए । लेकिन दामन में गरीब विरोधी होने का दाग लग गया जो कि बाद में कांग्रेस के वोट बैंक के नुकसान का बड़ा कारण साबित हुआ। राजब्बर पार्टी के प्रवक्ता रहते हुए कभी मोदी की तुलना हिटलर से कर चुके हैं । बाद में तो हिटलर से तुलना परिपाटी बन गई  । मीडिया में कहा जा रहा है कि प्रियंका गांधी की जिद की वजह से राजबब्बर को अध्यक्ष बनाया गया । जबकि पार्टी का कोई बड़ा नेता ऐसा नहीं चाहता था । यहां तक की राहुल गांधी भी । राज बब्बर जिस यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं उसी यूपी की गाजियाबाद लोकसभा सीट से 5 लाख 67 हजार वोटों से 2014 का लोकसभा चुनाव हारे हैं । इतने वाटों से हारना अपने आप में एक रिकॉर्ड है । 2014 के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट से हारने वाले देश में दूसरे उम्मीदवार हैं राजब्बर ।
पार्टी राज्य में जिन संजय सिंह को प्रचार की जिम्मेदारी दे रही है वो संजय सिंह भी कम विवादित नहीं हैं । बेटे से महल को लेकर झगड़ा हो रहा है । महल को लेकर खून तक बह चुका है ।  संजय सिंह गांधी परिवार के लॉय़ल रहे हैं। संजय सिंह की दो शादियां हैं और पहली पत्नी और उनके बेटे से उनका विवाद हो रहा है । संजय सिंह का विवाद कभी अंतर्राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी सैय्यद मोदी की हत्या से भी जुड़ा था । इसमें उन्हें कई तरह की जांच से गुजरना पड़ा था । लेकिन राजपूत वोटों को लुभाने के लिए संजय सिंह को आगे लाया गया है । राजपूतों का नेता यूपी में कौन होगा । राजनाथ सिंह, अमर सिंह, संजय सिंह या कोई और सिंह । 2012 में 13 फीसदी राजपूतों के वोट कांग्रेस को मिले थे। सपा को 26 और बीजेपी को 29 फीसदी राजपूतों के वोट मिले थे तब ।
संजय सिंह को राजपूतों की गोलबंदी के लिए तो शीला को ब्राह्मणों की गोलबंदी के लिए लाया गया है । यूपी में कांग्रेस को 2012 में महज 13 फीसदी ब्राह्मणों के वोट मिले थे । तब दिल्ली में भी कांग्रेस का क्रेज था और सोनिया से लेकर राहुल गांधी तक खासे सक्रिय थे । इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस वक्त ब्राह्मण बीजेपी के साथ है । शीला के आने के बाद बीजेपी के ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगना तय है ।

Monday, July 11, 2016

ब्राह्मण वोट के लिए क्यों व्याकुल हैं पार्टियां ?

ब्राह्मणों ने हर चुनाव में एक नया प्रयोग किया है। इस बार भी ब्राह्मण वोट क्या करेंगे इसको लेकर तमाम पार्टियों के अपने अपने दावे हैं। कोई भी हिम्मत के साथ ये कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा कि ब्राह्मणों का वोट उन्हीं की झोली में जाने वाला है।
यूपी में ब्राह्मण वोटरों की संख्या करीब 10 से 12 फीसदी के आसपास है। 80 में से 20 संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं जहां ब्राह्मण वोटर जीत और हार की तस्वीर तय करते हैं। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में तमाम पार्टियां ब्राहमणों को लुभाने में जुटी है। कोई ब्राह्मण सीएम की बात कर रहा है तो कोई ज्यादा टिकट देने की। कोई सोशल इंजीनियरिंग के भरोसे है तो किसी को सम्मेलनों का सहारा है। कुल मिलाकर ब्राह्मणों के लिए यूपी के नेता व्याकुल हुए पड़े हैं।
कांग्रेस से होते हुए बीजेपी, बीएसपी और एसपी तक का सफर ब्राह्मण वोटर तय कर चुके हैं। कांग्रेस की राज्य में स्थिति वैसी नहीं है कि ये समाज उनपर भरोसा करके आगे बढ़ सके। बीजेपी को लोकसभा चुनाव में खुलकर इस जाति का समर्थन मिला था। लक्ष्मीकांत वाजपेयी पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे। जब से वाजयेपी जी की छुट्टी हुई है पार्टी हिली हुई है। वाजपेयी जी भी ‘कोप भवन’ में चले गये हैं। वोट के तौर पर कहीं ब्रह्मणों का श्राप न लग जाए इसी डर से पहले बीजेपी ने राज्यसभा की एकमात्र सीट से इस जाति के नेता शिव प्रताप शुक्ल को दिल्ली भेजा। फिर तमाम कायदे कानून और नियम फॉर्मूले कलराज मिश्र के सामने फेल हो गये। 75 पार वालों को मंत्रिमंडल से बाहर करने का विचार था लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाई पार्टी। कलराज मिश्र तो बने ही रहे। चंदौली से सांसद महेंद्र पांडे को भी मंत्री बनाया गया। इतना ही नहीं मुरली मनोहर जोशी के नाम को राष्ट्रपति की रेस में लाया गया और अब खबर है कि लक्ष्मीकांत वाजपेयी को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जाएगा। कहने का मतलब ये कि बीजेपी हिली हुई है। पार्टी के सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला फेल हो जाएगा अगर ब्राह्मणों ने खेल कर दिया तो।
कांग्रेस है तो कही नहीं लेकिन उसे भी ब्राह्मणों से ही उम्मीद है। कभी प्रियंका गांधी का नाम तो कभी शीला दीक्षित का नाम। पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर के हवाले से खबरें रोज आती हैं कि ब्राह्मण चेहरा लाओ। प्रियंका लाओ, राहुल लाओ, वरुण लाओ और अगर इनमें से कोई नहीं तो फिर शीला दीक्षित ही लाओ। अभी पिछले दिनों खबर आई कि गुलाम नबी ने शीला को नेतृत्व करने का ऑफर दिया है। शीला दीक्षित इसके लिए तैयार भी है।
15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री, केरल की राज्यपाल और केंद्र में मंत्री रह चुकी शीला दीक्षित पच्चीस तीस साल से यूपी की सियासत से दूर हैं। लेकिन पार्टी को लगता है कि ब्राह्मण इनके नाम पर भी मान जाएंगे। शीला दीक्षित कन्नौज से सांसद रही हैं। शीला की ससुराल यूपी में है और इसी के दम पर कांग्रेस उनको आगे करने की तैयारी में है। इतना ही नहीं पार्टी ने जितिन प्रसाद जैसे युवा ब्राह्मण चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की तैयारी कर रखी है। जितिन पहले सांसद और केंद्र में मंत्री रहे हैं और राहुल की टीम का हिस्सा हैं। प्रमोद तिवारी जैसे ब्राह्मण नेता को पिछली बार राज्यसभा भेजने की रणनीति भी इसी का हिस्सा था।
बीएसपी को उम्मीद है कि ब्राह्मण सम्मेलन कराकर 2007 वाला सोशल इंजीनियरिंग का फ़र्मूला फिर से चल जाएगा। हाल के दिनों तक हाशिये पर चल रहे सतीश चंद्र मिश्र की पूछ फिर से बढ़ गई है। 2007 की जीत के हीरो मायावती से ज्यादा मिश्रा जी ही माने जाते हैं। अभी मिश्रा जी का कार्यकाल राज्यसभा में पूरा हुआ तो तुरंत उनको रिपीट किया। टिकट देने में भी खास ख्याल रखा जा रहा है। हाल ही में एक नेता ने सोशल मीडिया पर ब्राह्मणों के बारे में टिप्पणी कर दी तो उसे तुरंत पार्टी से बाहर कर दिया गया। ये वही बीएसपी है जिसका उदय ही तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार नारे के साथ हुआ था। लेकिन आज पार्टी कहां खड़ी है सबके सामने है।
समाजवादी पार्टी की पिछली जीत में इस समाज का अहम योगदान था। कागज पर सपा की जीत में ब्राह्मणों की चर्चा नहीं होती लेकिन आंकड़े बताते हैं कि ब्राह्मणों ने मायावती के साथ खेल करके साइकिल की सवारी कर दी और हाथी की हवा निकल गई। स्वर्गीय जनेश्वर मिश्रा के बहाने पार्टी ब्राह्मणों को याद दिला रही है कि सत्ता में सबसे ज्यादा सम्मान इसी समाज को मिला है। समाजवादी पार्टी के राज में ही परशुराम जयंती के मौके पर सरकारी छुटटी का एलान हुआ था। 2012 में जब फिर सरकार बनी तो अखिलेश इस जाति के 13 लोगों को मंत्री बनाया था। आगरा में हाल ही में कई घोषित नेताओं का टिकट काटकर ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट दिया गया् है। आगरा के एक ब्राह्मण नेता को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है।
आंकड़ों के मुताबिक 2012 के चुनाव में 19 फीसदी ब्राह्मणों ने सपा और 19 फीसदी ने ही बसपा को वोट दिया था। जबकि 2010 में सपा को सिर्फ 10 फीसदी वोट मिले थे इस समाज के। 2007 के मुकाबले 2012 में बीएसपी को 3 फीसदी ज्यादा ब्राह्मणों का वोट तो मिला लेकिन जीत में बदल नहीं पाया। जबकि 2002 में 50 फीसदी ब्राह्मणों ने बीजेपी को वोट किया था। 2007 में घटकर 44 और 2012 में 38 रह गया। 2014 में ये ग्राफ जरूर बेहतर हुआ। कांग्रेस को 2007 में 19 फीसदी और 2012 में महज 13 फीसदी वोट ब्राह्मणों के मिले थे।
2012 के चुनाव में सबसे ज्यादा बीएसपी ने 74 ब्राह्मण उतारे थे। बीजेपी ने 73, सपा ने 50 और कांग्रेस ने 42 उम्मीदवारों को टिकट दिया। सपा के 50 में से 21 ब्राह्मण उम्मीदवार जीत गए। जबकि 2007 में बीएसपी ने 86 ब्राह्मणों को उतारा था और 43 जीते थे। 2012 में इनमें से 20 को टिकट नहीं देने का खामियाजा भी मायावती को भुगतना पड़ा था। 

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 15 ब्राह्मणों को टिकट दिया और सभी जीते। जबकि कांग्रेस के 11 में से सिर्फ 2 को जीत मिली। बीएसपी ने 21 को टिकट दिया और कोई नहीं जीता।  

Saturday, July 9, 2016

सम्राट सुहेलदेव पार कराएंगे पूर्वांचल में बीजेपी की नाव ?


राजा सुहेलदेव की प्रतिकात्म तस्वीर
वैसे देश की राजनीति में इस पार्टी का न तो नाम चर्चा में रहा है औ ना ही इस पार्टी के किसी नेता को ज्यादा लोग जानते हैं। सीमित दायरे में रहकर राजनीति करने वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की स्थापना साल 2002 में हुई थी। मायावती का साथ छोड़कर ओम प्रकाश राजभर ने अपनी पार्टी बनाई । मकसद था राजभर जाति को सत्ता में भागीदार बनाना।
12 साल बाद राजभर जाति की राजनीति करने वाली इस पार्टी की अहमियत को उभार देने का आइ़डिया बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को आया है। पूर्वांचल के मऊ में आयोजित रैली में ये तय हो गया है कि बीजेपी पूर्वांचल में राजभर की पार्टी के साथ तालमेल करके चुनाव लड़ेगी। वैसे इतिहास के पन्नों को पलटे तो ओम प्रकाश राजभर की पार्टी बीते दो विधानसभा चुनावों में कोई गुल नहीं खिला सकी है। पार्टी का प्रदर्शन बेहद ही सीमित रहा है। 2012 के चुनाव में मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के साथ तालमेल करके भी ओम प्रकाश राजभर विधानसभा नहीं पहुंच पाए थे।
राजभर को एक ऐसे साथी की तलाश थी जो उनकी इच्छाओं को पंख लगा सके। लखनऊ की लड़ाई जीतने के लिए बीजेपी को भी दलित और पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगाने वाले नेताओं की जरूरत है। लोकसभा चुनाव के वक्त इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई थी लेकिन विधानसभा चुनाव में हजार पांच सौ वोटों से हार जीत की कहानी लिखी जाती है। लिहाजा बीजेपी पूर्वांचल की कम से कम पचास सीटों पर हजार पांच सौ वोटों से हार नहीं चाहती। यही वजह है कि यूपी की राजनीति में हाशिये पर खड़ी एक पार्टी को बीजेपी ने 20 से 22 सीटें देने का फैसला किया है। बीजेपी राजभर की पार्टी को उन सीटों पर चुनाव लड़ाएगी जहां मुख्तार अंसारी की पार्टी का दबदबा है। 
राजभर की राजनीति 
बहराइच, मऊ, गाजीपुर, श्रावस्ती के इलाकों में ओम प्रकाश राजभर के उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे। राजभर वोटों की संख्या राज्यभर में तो 3 फीसदी के आसपास ही है लेकिन इन इलाकों में 8 फीसदी के आसपास। पार्टी के दावे को माने तो करीब सौ सीटों पर 20 हजार से लेकर 1 लाख तक वोट हैं।
2007 के विधानसभा चुनाव में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 97 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से 94 पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई । कुल वोट 4 लाख 91 हजार मिले। यानी कुल वोटों का एक फीसदी से भी कम। 2012 में राजभर नें 52 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। 48 की जमानत जब्त हुई। कुल वोट मिले 4 लाख 77 हजार 330। 
गाजीपुर की जहूराबाद सीट से लड़ने वाले ओम प्रकाश राजभर 2012 के चुनाव में तीसरे नंबर पर रहे थे। जीतने वाले को 67 हजार, दूसरे नंबर पर बीएसपी को 56 हजार और राजभर को 48 हजार वोट मिले थे। यहां बीजेपी के उम्मीदवार को 5600 वोट मिले थे।
हिंदू राजा के नाम पर राजनीति 
राजभर की पार्टी से नाता जोड़ने के पीछे बीजेपी का मकसद सिर्फ इस वर्ग के वोट पाना नहीं नहीं है। बल्कि राजा सुहेलदेव के जरिये बीजेपी हिंदू वोटों की गोलबंदी की राजनीति भी करना चाहती है। श्रावस्ती सम्राट राजा सुहेलदेव को हिंदुओं का राजा कहा जाता है। महज 18 साल में ही सुहेलदेव राजा बने थे। 17 बार भारत को लूटने के बाद महमूद गजनवी का भांजा सालार मसूद गाजी 1034 में भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने की नीयत से हमला करते हुए आगे बढ़ रहा था। हजारों हिंदुओं की हत्या के बाद बहराइच की सीमा में उसका सामना सुहेलदेव से हुआ। सुहेलदेव की सेना इस स्थिति में नहीं थी कि अकेले गाजी का मुकाबला किया जा सके। इसलिए राजा सुहेलदेव नें 21 हिंदू राजाओं को अपने साथ मिलाया और उनका नेतृत्व करते हुए गाजी पर टूट पड़े।
कहा जाता है कि गाजी बहुत की शातिर था । सुहेलदेव को मात देने के लिए वो अपनी सेना के आगे गायों को बांध कर खड़ा कर देता था। क्योंकि सुहेलदेव गायों पर आक्रमण नहीं करते। पहली बार में ही सुहेलदेव को इसकी भनक लगी और रात को ही उन्होंने गायों की रस्सियां कटवा दी। बाद में लड़ाई में सुहेलदेव के हाथों गाजी मारा गया। और उसकी मंशा पूरी नहीं हुई। 

उन्ही राजा सुहेलदेव के नाम पर ओमप्रकाश राजभर नें अपनी पार्टी बनाई है। वैसे इतिहास में राजा की जाति को लेकर स्पष्ट मत नहीं मिलने की बात कही जाति है। लेकिन राजभर समाज सुहेलदेव को अपनी जाति का मानते हैं। सुहेलदेव के बहाने राजभर वोटों को साधने के लिए ही फरवरी महीने में गाजीपुर से दिल्ली के बीच सुहेलदेव एक्सप्रेस ट्रेन शुरू की गई। राजा सुहेलदेव की आज की सेना ने बीजेपी का साथ दिया तो पूर्वांचल के आधा दर्जन जिलों का राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकता है। क्योंकि इस जाति के वोटरों को अभी तक कोई स्पष्ट भविष्य नहीं दिख रहा था। राजभर के मायावती का साथ छोड़ने के बाद समाज बिखर सा गया था। लेकिन गठबंधन दोनों के लिए संजीवनी का काम कर सकता है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि तमाम राजभर समाज इन्हीं के साथ है। राजभर की अहमियत को समझते हुए ही मायावती ने अपनी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर को बना रखा है।